..पर लक्ष्मी बाई की पहचान से आज भी दूर है झांसी (बलिदान दिवस पर विशेष)

झांसी, 17 जून (आईएएनएस)। रानी लक्ष्मी बाई और झांसी एक दूसरे के पर्याय हैं क्योंकि एक के बिना दूसरा अधूरा है। लेकिन जंग- ए -आजादी में अपना जान न्यौछावर कर देने वाली झांसी की रानी की अंतिम पहचान तलवार, राजदंड और ध्वज अब भी झांसी से दूर है। रानी की इन निशानियों को झांसी लाने की चर्चाएं तो बहुत हुईं, मगर बात कोशिशों की हद को अब तक पार नहीं कर पाई है।

आजादी की पहली लड़ाई की नायिका रानी लक्ष्मी बाई अंग्रेजों से मुकाबला करते हुए 18 जून 1857 को ग्वालियर में वीरगति को प्राप्त हुई थी। देश को आजाद हुए छह दशक गुजर चुके हैं मगर रानी से जुड़ी सामग्री अब तक झांसी नहीं आ पाई है। कहने के लिए तो झांसी में रानी का किला है, महल है और वह गणेश मंदिर भी है जहां रानी परिणय सूत्र में बंधी थी। परन्तु रानी ने जिस तलवार से अंग्रेजों का मुकाबला किया था वह झांसी में नहीं है।

राजकीय संग्रहालय के निदेशक ए़ क़े पान्डे बताते हैं कि रानी की तलवार और बख्तरबंद ग्वालियर में हैं। इसे झांसी लाने के कई बार प्रयास हुए परन्तु सफलता नहीं मिल पाई है। पान्डे के अनुसार ये सारी चीजें सरकार के फैसलों से जुडी हुई हैं।

कभी सेना में मेजर रहे राम मोहन बताते हैं कि रानी का राजदन्ड अब भी कुमाऊं रेजीमेन्ट के पास है। अंग्रेजों ने रानी से युद्ध के दौरान यह हासिल कर लिया था जो बाद में कुमाऊं रेजीमेन्ट के पास पहुंच गया था। राम मोहन के पास उस राजदन्ड की तस्वीर भी है। राज मोहन के अनुसार रानी का ध्वज लंदन में है।

बुन्देलखंड के इतिहास विद हरगोविन्द कुशवाह रानी को लेकर हो रही राजनीति से व्यथित हैं। उनका कहना है कि राजनैतिक दल हों अथवा प्रशासनिक अमला सभी के लिए रानी की विरासत दुकान बनकर रह गई है। जैसे ही बलिदान दिवस करीब आता है रानी पर बहस छिड़ जाती है। इतना ही नहीं चुनाव के दौरान तो रानी की विरासत को मुद्दा बना दिया जाता है। वक्त गुजरते ही सब भूल जाते है। वे सवाल करते हैं कि वाकई में कभी तलवार, राजदन्ड और ध्वज झांसी आ पाएगा? अथवा राजनीति का वही खेल चलता रहेगा जो अब तक होता आया है।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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