आप्रवासन हमारे समय की सच्चाई है: अमिताव घोष
नई दिल्ली, 16 जून (आईएएनएस)। इनके पात्र और कलेवर अलग हो सकते हैं, पर उनकी यह हालिया पुस्तक 'सी ऑफ पॉपीज' भी उनकी पूर्ववर्ती रचनाओं की तरह आप्रवासन के मुद्दे पर केंद्रित है। इसके लेखक अमिताव घोष का मानना है कि आप्रवासन एशियाइयों के लिए एक सच्चाई बन गया है।
नई दिल्ली, 16 जून (आईएएनएस)। इनके पात्र और कलेवर अलग हो सकते हैं, पर उनकी यह हालिया पुस्तक 'सी ऑफ पॉपीज' भी उनकी पूर्ववर्ती रचनाओं की तरह आप्रवासन के मुद्दे पर केंद्रित है। इसके लेखक अमिताव घोष का मानना है कि आप्रवासन एशियाइयों के लिए एक सच्चाई बन गया है।
सोमवार को लांच की गई 'सी ऑफ पॉपीज', जो इस महीने के प्रथम सप्ताह में भारत में स्टालों पर नजर आएगी, अफीम युद्घ से पहले के काल खंड पर केंद्रित है। यह गुलामों को ढोने वाले एक जहाज इबिस के बारे में है जो कुलियों, अपराधियों, गुलामों आदि को हिंद महासागर के पार ले जाता है।
विविध पात्रों वाले इस उपन्यास के केंद्र में एक दिवालिया राजा, एक विधवा, एक अफीम कारोबारी और एक अमेरिकी है। ऐसे में जब इनके पुराने पारिवारिक रिश्ते बिखर गए हैं, नस्ल, क्षेत्र और महादेश के सीमित दायरे से आजाद होकर नियति का निर्धारण ही उनके सामने विकल्प बन गया है।
द ग्लास पैलेस, द हंग टाइड, द सर्कल ऑफ रीजन और शैडो ऑफ लाइन्स जैसी प्रसिद्ध कृतियों के रचयिता घोष ने कहा, "हां, यह सही है कि आप्रवासन मेरा प्रिय विषय रहा है। मेरी किताबों के पात्र और कलेवर अलग हो सकते हैं, पर उनमें आप्रावासन से जुड़ी संवेदना बरकरार रहती है। मैं भूमंडलीकरण से भी पहले से आव्रजन और जन पलायन जैसे विषयों पर लिखता रहा हूं। आप्रवासन हमारे समय की बड़ी सच्चाई है।"
होटल ताज मानसिंह की 11 वीं मंजिल पर स्थित सुइट में ठहरे घोष ने इस संवाददाता से बातचीत करते हुए कहा कि वह जन पलायन और आव्रजन को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखते रहे हैं। उनके मुताबिक आव्रजन के कई आर्थिक, सामाजिक कारण हो सकते हैं। यहां तक कि इसे बेहतर ज्ञान हासिल करने की ललक के परिणाम के तौर पर भी देखा जाना चाहिए।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।












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