मोटे बच्चों के लिए इस्तेमाल मधुमेह जांच की मौजूदा प्रक्रिया कारगर नहीं
वाशिंगटन, 16 जून(आईएएनएस)। मोटापे के शिकार बच्चों की मधुमेह जांच के लिए इस्तेमाल मौजूदा तकनीकी त्रुटियों से मुक्त नहीं कही जा सकती। एक नए अध्ययन से पता चलता है कि ब्लड शुगर टेस्ट नामक यह जांच पूरी तरह कारगर नहीं है।
टाइप-2 डायबिटीज की चपेट में बच्चे के आने के खतरे का पता लगाने के लिए जिस प्रक्रिया का सबसे अधिक इस्तेमाल होता है, वह है ब्लड ग्लूकोज टेस्ट। एक नए अध्ययन के मुताबिक यह प्रक्रिया लंबी नहीं होती, इसलिए कई अन्य संभावित खतरों के बारे में सही जानकारी नहीं मिलती। ओंतारियो स्थित मैकमास्टर विश्वविद्यालय की कैथरीन मॉरीसन ने कहा कि मधुमेह से संबद्ध लंबी रक्त जांच प्रक्रिया की तुलना में सर्वाधिक इस्तेमाल होने वाला ब्लड ग्लूकोज टेस्ट कम कारगर होता है। इसके लिए कहीं अधिक सटीक जांच है ग्लूकोज स्ट्रेस टेस्ट, जिसे ओरल ग्लूकोज टॉलरेंस टेस्ट भी कहा जाता है।
ग्लूकोज स्ट्रेस टेस्ट इसलिए लंबा होता है, क्योंकि मरीज से उपवास के बाद और फिर मीठा घोल पिलाने के दो घंटे बाद जांच के लिए रक्त लिया जाता है। उनके मुताबिक यह प्रक्रिया मेटाबॉलिक सिंड्रोम, जिससे दिल की संभावित बीमारी और मधुमेह आदि के संकेत मिलते हैं, का पता लगाने में कहीं अधिक कारगर है, जब इस मामले में ब्लड ग्लूकोज टेस्ट बेहद कम असरदार है। इसके अंतर्गत 5 से 17 वर्श के 172 मोटे बच्चों की जांच की गई।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।












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