समाज सेवकों की राय, पानी पर रहे सभी का समान अधिकार

भोपाल, 14 जून (आईएएनएस)। पानी की कमान निजी हाथों में सौपने की चल रही कोशिशों से समाज सेवी बेहद चिन्तित हैं। उनका मत है कि पानी पर किसी का एकाधिकार नहीं होना चाहिए, अगर ऐसा हो गया तो युद्ध जैसे हालात बन सकते हैं। यह निष्कर्ष है शुक्रवार को भोपाल में हुई जल नियामक आयोग के प्रभावों की कार्यशाला का।

मंथन अध्ययन केन्द्र बडवानी और सामाजिक संस्था 'प्रयास' पुणे द्वारा आयोजित इस कार्यशाला में मध्यप्रदेश के अलावा महाराष्ट्र और देश के प्रमुख समाज सेवी तथा विचारकों ने हिस्सा लिया। मैग्सेसे पुरस्कार प्राप्त अरविन्द केजरीवाल का मानना है कि अगर जल नियामक आयोग बन गया तो पानी पर कारोबारियों का कब्जा हो जाएगा, जिसके पास पैसा होगा वही पानी हासिल कर पाएगा। उन्होंने कहा कि नियामक आयोग बन जाने से राजनैतिक दलों और सरकार का उस पर कोई नियंत्रिण नहीं रहेगा।

सवरेदय प्रेस सर्विस इंदौर, विकास संवाद भोपाल और एकलव्य के सहयोग से आयोजित इस कार्यशाला में केजरीवाल ने आगे कहा कि जल नियामक आयोग बनाना आग से खेलने से कम नहीं है। महाराष्ट्र में यह प्रयोग हुआ जो पूरी तरह असफल रहा। मध्यप्रदेश में बिजली नियामक आयोग इस बात का गवाह है कि यहां बिजली आदमी से दूर हो गई है। हर छह माह में 10 प्रतिशत बिजली के दाम बढाए जा रहे हैं। सरकार चाहके भी निजी कम्पनियों को रोक नहीं पा रही है। यही हाल पानी का होने वाला है।

मंथन अध्ययन केन्द्र के अध्यक्ष पाद धर्माधिकारी ने महाराष्ट्र में जल नियामक आयोग गठित होने के बाद की स्थितियों का जिक्र करते हुए कहा कि इससे लाभ सिर्फ निजी कम्पनियों को हुआ है। महाराष्ट्र से आए कल्पना, सचिन और सुबोध ने कहा कि देश का पहले जल नियामक आयोग के जो नतीजे सामने आए हैं वे भयावह हैं क्योंकि पानी आदमी से दूर हो चला है। ऐसी स्थितियों में मध्य प्रदेश सरकार को इससे सबक लेना चाहिए।

होशंगाबाद की ग्राम सेवा समिति के लक्ष्मण भाई ने तवा बांध की जल उपभोक्ता समिति बनने से उत्पन्न समस्याओं को बताया। उन्होंने कहा कि इस समिति के जरिए ही पानी का निजीकरण शुरू हो चुका है। कृषक चंडिकेश्वर सिंह ने पानी के निजीकरण की कोशिशों को देश और समाज के खिलाफ बताया है। कार्यक्रम का संचालन नीता हार्डिकर ने किया।

कार्यशाला के तीसरे सत्र में मध्यप्रदेश योजना आयोग के उपाध्यक्ष सोमपाल ने कहा कि नियामक आयोग के मामले में एकांगी सोच से काम नहीं चलेगा। इसके लिए विचार मंथन जरूरी हैं। सोमपाल निजी तौर पर नियामक आयोग के पक्ष में नहीं हैं। दैनिक भास्कर के प्रदेश प्रमुख अभिलाश खांडेकर का अभिमत है कि जनसंख्या बढ़ने के साथ पानी की खपत बढ़ी है। साथ में दुरूपयोग और बर्बादी भी हो रही है। इसे रोकना भी सभी की जिम्मेदारी है। खांडेकर कहते हैं कि नियामक आयोग के लिए सार्वजनिक चर्चा और बहस जरूरी है जिसमें बुद्धिजीवी से लेकर जनता की भागेदारी होना चाहिए। ऐसा होने पर जो निष्कर्ष निकले उसी के मुताबिक आगे कदम बढाया जाए।

जल नियामक आयोग को लेकर हुई इस कार्यशाला का कुल लब्बोलुआब यही रहा कि पानी अगर निजी हाथों में पहुंच गया तो कई इलाकों में युद्ध जैसे हालात बन जाएगे। इसलिए जरूरी हैं कि इस दिशा में कदम बढाने से पहले विचार मंथन हो।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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