गायत्री और गंगा ने बनाया हरिद्वार को तीर्थराज (गंगा दशहरा पर विशेष)
हरिद्वार, 12 जून (आईएएनएस)। विश्व के तमाम राष्ट्रों में भारत ही एक ऐसा राष्ट्र है जिसकी संस्कृति शाश्वत है और जन मन को पवित्र करने वाली है, इसलिए इसे तीर्थ-राष्ट्र कहें तो कोई अतिशयोक्ति न होगी। इसके कोने कोने में तीर्थ भरे पड़े हैं। पूर्व से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण तक हर जगह यहाँ देवता बसते हैं।
यह क्षेत्र सदा हिमखण्डों से भरे रहने के कारण हिमक्षेत्र या हिमालय कहलाता है। संपूर्ण विश्व के आध्यात्मिक गतिविधियों का संचालन यहीं से होने के कारण इसे आध्यात्मिक क्षेत्रों का ध्रुव केंद्र कहा जाता है। इस पवित्रतम क्षेत्र में प्रवेश का मार्ग हरिद्वार होने के कारण इसे समग्र भारत में सर्वश्रेष्ठ तीर्थ के रूप में माना जाता है।
ऐसे पवित्र नगरी हरिद्वार ने आज से 18 साल पहले एक ऐसे संत को खोया है जिसने न केवल भारत ही, बल्कि समग्र विश्व में हरिद्वार का नाम ऊँचा उठाया है। वह संत हैं- गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज तथा अखिल विश्व गायत्री परिवार के संस्थापक पं. श्रीराम शर्मा आचार्य। आज गंगा दशहरा के दिन उनकी 18वीं पुण्य तिथि है। आज ही के दिन सृष्टि की आदि शक्ति वेदमाता गायत्री का प्राकट्य हुआ था। आज ही के दिन समग्र धरती में ज्ञान विज्ञान की सुरसरिता प्रवाहित हुई थी। आज ही के दिन उन्होंने उस महाशक्ति का दिव्य दर्शन प्राप्त किया था और आज ही के दिन उसे सर्वसाधारण के लिए सुलभ बनाया था। इसलिए आज के दिन को समग्र गायत्री परिवार के परिजन गायत्री जयन्ती के रूप में मनाते हैं।
किसी समय ब्रह्मर्षि विश्वामित्र आदि सात ऋषियों ने जिस स्थान पर बैठकर इस महाशक्ति को प्राप्त किया था, आज वह सप्तसरोवर के नाम से जाना जाता है। आचार्य जी ने अपने जीवन का अधिकांश समय इसी स्थान पर बिताया और यहीं से युगनिर्माण योजना को कार्यान्वित किया। आज विश्व के 80 से अधिक देशों में चार हजार से अधिक शक्तिपीठें, प्रज्ञापीठें स्थापित हैं और 8 करोड़ से अधिक लोग उनके मार्गदर्शन में कार्य कर रहे हैं जिसका प्रमुख केन्द्र उन्होंने शांतिजकुंज को बनाया। आज हरिद्वार आने वालों में से अधिकतर यात्री शांतिकुंज दर्शनार्थ अवश्य आते हैं। शांतिकुंज एक ऐसा जीवंत तीर्थ है जो उनको जीवन जीने की कला शिखाता है।
उनके द्वारा गंगा तट पर भारत माता मन्दिर के समीप स्थापित ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान अपने आपमें एक अनूठा संस्थान है, जहाँ पर विज्ञान की कसौटी पर खरे उतरते धर्म का व्यावहारिक ज्ञान प्रदान किया जाता है। यहाँ विभिन्न प्रकार के शोध कार्य भी किए जाते हैं। उनके द्वारा प्रणीत यज्ञ थैरेपी अपने आपमें एक अनूठी थैरेपी है जो ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान द्वारा शोध की गई है। इस थैरेपी द्वारा असाध्य से असाध्य बीमारियाँ भी कम खर्च में ठीक हो जाती हैं।
शिक्षा में संस्कृति का समावेश कराने वाली आचार्य जी की एक नयी शिक्षण पद्धति की परिकल्पना को साकार करने वाला देवसंस्कृति विश्वविद्यालय एक अनुपम शिक्षण संस्थान है जो बिना किसी सरकारी सहायता के स्वनिर्भर कार्य कर रहा है। यहाँ हजारों छात्र-छात्राएँ कुलाधिपति डॉ0 प्रणव पण्ड्या के सफल निर्देशन में अपने भविष्य को सँवार रहे हैं।
आचार्य जी ने धर्म, संस्कृति व दर्शन को नयी परिभाषा दी। उन्होंने 80 वर्ष की उम्र में तीन हजार से अधिक पुस्तकों का लेखन, समग्र आर्ष वा्मय का भाष्य तथा अखण्ड ज्योति जैसे क्रांतिकारी मासिक पत्रिका का लेखन कर ज्ञान गंगा को धरती पर अवतरित किया। हरिद्वार की पवित्र भूमि में गंगा और गायत्री के प्राकट्य दिवस को सचमुच ही उन्होंने सार्थक कर दिया।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।












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