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कार्टूनिस्ट एक बेहतर कैरियर विकल्प

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    नई दिल्ली, 12 जून (आईएएनएस)। कार्टूनिस्ट की नजर बड़ी पैनी होती है। गंभीर विषयों को रोचग ढंग से चित्रण की गहन जानकारी होती है, ताकि पाठक पर अभीष्ट प्रभाव पड़ सके। विनोदप्रियता, विवेक, समाज में विद्यमान असंगतियों को मापने की योग्यता, राजनीतिज्ञों की मूर्खता, सामाजिक, आर्थिक व्याकुलता आदि होना जरूरी है, ताकि विषय को सर्वाधिक प्रभावशाली एवं चुटीले ढंग से व्यक्त किया जा सके।

    इस प्रकार कार्टूनिस्ट सशक्त पत्रकार होता है। वह कारगर ढंग से संप्रेषण के लिए इस दृश्यात्मक/प्रत्यक्ष माध्यम का इस्तेमाल करता है। दूसरे शब्दों में, कार्टूनिंग की कला प्रत्यक्ष माध्यम के जरिए विनोदपूर्ण ढंग से व्यंग्य कसना या व्यंग्य लेख लिखने की प्रतिभा है, इसका विकास किया जा सकता है। सर्जनात्मक कार्य करने के लिए सामाजिक-आर्थिक तथा राजनीतिक वातावरण की गहन समझ होना जरूरी है। व्यक्ति ललित या व्यावसायिक कला की पृष्ठभूमि, या सरल शब्दों में कहें तो प्रतिभा, से ही कला में पारंगत हो सकता है, बशर्ते उसमें कार्टून या प्रत्यक्ष इमेज के माध्यम से सूक्ष्म या महत्वपूर्ण संदेश देने की योग्यता हो। आज श्रव्य-दृश्य मीडिया के प्रसार के कारण कम्प्यूटर और नेटवर्क पर आधारित अनुप्रयोगों की वजह से कॉमिक स्ट्रिप्स तैयार की जा सकती है। टेलीविजन, रुपहले परदे पर प्रिंट मीडिया के लिए कार्टून फिल्में बनाई जा सकती हैं।

    अमूल मक्खन तथा एयर इंडिया महाराजा जैसे कुछ उल्लेखनीय विज्ञापनों में इस मीडिया का कारगर ढंग से इस्तेमाल हुआ है। ये अभियान लोकप्रिय होने के साथ-साथ संदेश पहुंचाने में भी सफल हुए। आप कल्पना कर सकते हैं कि यदि किसी समाचार-पत्र में कार्टून नहीं होता तो खून-खराबा, प्राकृतिक आपदओं, दुर्घटनाओं, कर संबंधी छापों आदि से भरी निराशाजनक खबरों के कारण समाचार-पत्र कितना उबाऊ होता। संपादकीय लेख, कार्टून तथा राजनीतिज्ञों के व्यंग्य-चित्रों में निर्भीक होकर व्यंग्य शैली में सामाजिक बुराइयों और कमियों को उभारा जाता है या टिप्पणी की जाती है। कॉमिक कलाकार में विनोदप्रियता का गुण होता है। हल्के-फुल्के रोचक ढंग से खबरें प्रस्तुत की जाती हैं। टी.वी. एवं फिल्मों में दिखाए जानेवाले सजीव कार्टून 'मोशन कार्टूनिस्ट' द्वारा तैयार किए जाते हैं। ये कार्टूनिस्ट रहस्यों को प्रकट करते हैं, पारियों की कहानियां चित्रित करते हैं, बच्चों की कहानियां तैयार करते हैं। बच्चे इस रचना जगत के वशीभूत हो जाते हैं। मोशन पिक्चर्स, विज्ञापन तथा टी.वी. और कुछ सीमा तक नेटवर्क पर ये कार्टून लोकप्रिय हैं।

    इसमें सर्जनात्मक शक्ति को सर्वोत्तम ढंग से अभिव्यक्त किया जाता है; क्योंकि कलाकार इस सशक्त माध्यम का अपने ढंग प्रयोग करता है। प्रयोग की विधि के अनुसार यह रूप लोकप्रिय होता है, फिर चाहे जन-साधारण तक बढ़ती आबादी पर नियंत्रण पाने का संदेश हो अथवा बच्चों को यह नैतिक शिक्षा देनी हो कि वे कर्तव्यनिष्ठ हों, कर्मठ हों या ईमानदार बनें या ऐसी रचना का लक्ष्य मात्र मनोरंजन करना हो। स्कूल स्तर से पूर्व स्तर या स्कूली बच्चों को देशभक्ति आदि जैसे मूल्य सिखाने के लिए कार्टून को शिक्षा के माध्यम के रूप में इस्तेमाल किया जाता है, क्योंकि इससे रचनाशील मस्तिष्क पर स्थायी प्रभाव पड़ता है। कार्टून के माध्यम से एड्स नियंत्रण, सुरक्षित स्वास्थ्य प्रक्रियाओं आदि से संबंधित संदेश लोगों तक पहुंचाए जाते हैं।

    10+2 परीक्षा के बाद कार्टूनिंग को कैरियर के रूप में चुना जा सकता है, हालांकि बारहवीं कक्षा तक पढ़ाई करना आदर्श रहता है। इसके बाद ही यह पाठ्यक्रम किया जाए। मल्टी मीडिया पाठ्यक्रम से तकनीकी पहलुओं को समझने में सहायता मिलती है। तब व्यक्ति विभिन्न सॉफ्टवेयर पैकेज का इस्तेमाल करने का आदी हो जाता है। तथापि कॉमिक रूपों के आरेखन की कला के लिए किसी औपचारिक प्रशिक्षण की जरूरत नहीं होती है, बशर्ते व्यक्ति में चित्र बनाने, मूल रूप में चित्रण, हास्य शैली में सामाजिक, राजनीतिक संकट एवं विपत्तियों का व्यक्त करने का प्रतिभा हो, जिससे जनता में रुचि जाग्रत हो तथा उसकी कल्पना-शक्ति प्रस्फुटित हो। ऐसा ही व्यक्ति सफल कार्टूनिस्ट बन सकता है।

    कार्टूनिस्ट और एनीमेटर (सजीव चित्रकार) के लिए पब्लिशिंग संस्थानों में नौकरियां उपलब्ध रहती हैं। इसके अलावा पत्रिकाओं, विज्ञापन एजेंसियों, श्रव्य-दृश्य मीडिया और समाचार-पत्रों में भी काफी संभावनाएं विद्यमान हैं। यदि व्यक्ति के पास प्रतिभा एवं कल्पना-शक्ति है तो उसका भविष्य उज्जवल है। लेकिन ऐसे कार्यो के लिए बड़े शहरों में ही ज्यादा मांग है। बाधा यही है कि संपादकीय कार्य में काफी स्वतंत्रता की जरूरत है लेकिन सौंपे गए कार्य को कर्मचारियों में बांटकर करवाना पड़ता है। कम्प्यूटर सहायता प्राप्त डिजाइन (सी.ए.डी.) प्रौद्योगिकी का श्रव्य-दृश्य प्रस्तुतीकरण में व्यापक स्तर पर इस्तेमाल किया जाता है। इस संबंध में कड़ी स्पर्धा है, लेकिन उच्च कोटि के कार्य से व्यक्ति को अपनी पसंद का कार्य मिलने में सहायता मिलती है।

    भारत में कार्टूनिस्ट का कार्यक्षेत्र अभी प्रारंभिक अवस्था में है। इसकी तुलना चार दर्शक पूर्व 'पंच' एवं 'न्यूयार्कर' से की जा सकती है। प्रारंभ में कार्टूनिस्ट को पैर जमाने के लिए काफी मेहनत करनी पड़ती है लेकिन एक बार शुरुांत हो जाने पर पीछे मुड़कर देखने की जरूरत नहीं पड़ती। भारत में आर.के. लक्ष्मण, सुधीर तैलंग, रंगा, राजिंद्र पुरी, राशि काल्दा जैसे कुछ नाम उल्लेखनीय है।

    ये पाठ्यक्रम निम्नलिखित संस्थानों में चलाए जा रहे हैं -

    1. शंकर अकादमी ऑफ आर्ट, बहादुर शाह जफर मार्ग, नई दिल्ली।

    2. ए.पी.जे. इंस्टीच्यूट ऑफ डिजाइन, 54, तुगलकाबाद इंस्टीट्यूशनल एरिया, एम.बी. रोड, नई दिल्ली-110 062।

    3. द दिल्ली कॉलेज ऑफ आर्ट, तिलक मार्ग, नई दिल्ली 110 001।

    4. सर जे. जे. स्कूल ऑफ आर्ट, डॉ. डी.एन. रोड, मुंबई-400 001।

    5. नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ डिजाइन, पालदी, अहमदाबाद।

    6. जाइका स्टूडियों, एसेल वर्ल्ड, गोराई आईलैंड, बोरीचाली (पश्चिम), मुंबई-400 091।

    7. द केरल कार्टून अकादमी, चित्तूर रोड, ऑफ कोची, केरल।

    (यह लेख ग्रंथ अकादमी, नई दिल्ली से प्रकाशित ए गांगुली और एस. भूषण की पुस्तक "अपना कैरियर स्वयं चुनें" से लिया गया है।)

    इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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