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कला संरक्षक तथा जीर्णोद्धारक रुचि के साथ रोजगार पाएं

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    नई दिल्ली, 11 जून (आईएएनएस)। आधुनिक युग की यह प्रवृत्ति उभरकर सामने आ रही है कि परंपरा एवं विरासत के संरक्षण में कला को बचाकर रखना अनिवार्य है। पांचवें दशक के अंत तक कुछ विशेषज्ञ शिल्पी ही कला और परंपरा को बचाए रखने तथा जीर्णोद्धार का कार्य करते थे। इस कार्य में प्राचीन या आद्य तकनीक शामिल थी, जिसमें तैलीय रंग (पेंट) को हटाया जाता था या उसे पुन: सजाया जाता था। तथापि प्रौद्योगिकी से कला को बनाए रखने का कार्य वैज्ञानिक प्रक्रिया बन चुका है, जिसमें जटिल प्रौद्योगिकी शामिल है। यह अब विशेषज्ञता वाला क्षेत्र बन गया है।

    आम व्यक्ति की दृष्टि में कला जीर्णोद्धार तथा संरक्षण लगभग समानार्थी प्रतीत होते हैं, लेकिन मूलत: ये दोनों अलग-अलग क्षेत्र हैं। प्रत्येक क्षेत्र कला के अलग-अलग पहलुओं से जुड़ा है। जीर्णोद्धार कार्य कलाकृतियों को पहुंची क्षति की मरम्मत का कार्य है ताकि कला के क्षेत्र में सुसंगतता तथा निरंतरता बनी रहे। इन्हें ऐसी स्थिति में पुन: लाया जाए कि ये मौलिक कृतियां दिखाई दें।

    जलवायु, मौसम, आद्र्रता, धूल एवं धुएं का कलाकृतियों पर प्रभाव पड़ता है। खास तौर पर पेंटिंग और रंगों पर इसका असर पड़ता है। कलाकार भी ऐसी सामग्री का इस्तेमाल करते हैं जो अंतत: नष्ट हो जाती है, रंग बदल जाते हैं या रंग फीके पड़ जाते हैं। जीर्णोद्धारक का कार्य ऐसी समस्याओं को दूर करना है। जीर्णोद्धारक कलाकृतियों के संग्रह तथा प्रदर्शन (डिस्प्ले) पर परामर्श देता है।

    वस्तुत: कला संरक्षण मूल कलाकृतियों को बचाकर रखने की कला है ताकि इनका सौंदर्य विकृत न हो।

    पारखी दृष्टि, ब्योरों एवं पूर्णता के प्रति भावावेश, जुनून, धर्य, निरंतर प्रयास और इससे अधिक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक स्वभाव - ये सफल कला जीर्णोद्धारक की कुछ विशेषताएं हैं। कलाकृति के सर्जनात्मक पहलू को देखने की योग्यता के अलावा आपको पर्यावरण के ऐसे पहलुओं के बारे में भी सतर्क रहना होगा, जिनका कलाकृति पर प्रभाव पड़ता है क्योंकि अलग-अलग वातावरण में सामग्री पर अलग-अलग प्रभाव पड़ता है। इसी विषय में वैज्ञानिक एवं प्रौद्योगिकीय योग्यताएं सामने आती हैं।

    सफल कला जीर्णोद्धारक बनने की दिशा में सबसे पहले आपको इस क्षेत्र में तत्संबंधी पाठ्यक्रम पूरा करना होगा, लेकिन भारत में कला संरक्षण तथा संग्रह कला-इतिहास संस्थान (इंस्टीच्यूट ऑफ हिस्ट्री ऑफ आर्ट, कंजरवेशन एंड म्यूजियोलॉजी) एवं राष्ट्रीय संग्रहालय, नई दिल्ली में स्नातकोत्तर स्तर पर पूर्णकालीन पाठ्यक्रम चलाया जाता है। इस पाठ्यक्रम में पात्रता का आधार विज्ञान विषय में स्नातक डिग्री है, साथ ही ललित कला में कौशल के संबंध में वरीयता दी जाती है। यदि कलाकार कला क्षेत्र में अपनी समझ-बूझ एवं ज्ञान शक्ति बढ़ाना चाहते हैं तो वे भी इस पाठ्यक्रम में भाग ले सकते हैं।

    अभिवृत्ति परीक्षण के बाद प्रतिवर्ष दस-बारह विद्यार्थियों को प्रवेश दिया जाता है। अन्य संस्थानों में मुख्यत: भारतीय इतिहास में पाठ्यक्रम चलाए जाते हैं। पाठ्यक्रम की विषय-वस्तु में जैव तथा अजैव रसायनशास्त्र तथा बुनियादी पेंटिंग कौशल शामिल हैं। इस पाठ्यक्रम के बाद छात्र-छात्राओं में दृश्यात्मक ग्रहण शक्ति भी अच्छी तरह से समंजित होती है।

    सर्वाधिक महत्वपूर्ण दूसरी अवस्था किसी प्रतिष्ठित कला जीर्णोद्धारक तथा संरक्षक के सहायक के रूप में कार्य करके अनुभव प्राप्त करना है। जब तक दुनिया में कला की सराहना होगी तब तक कला जीर्णोद्धारक तथा संरक्षक का भी कार्य-क्षेत्र मौजूद रहेगा। लखनऊ, दिल्ली और कोलकाता के राष्ट्रीय संग्रहालय भावी कला जीर्णोद्धारक के लिए सर्वोत्तम सहायक साधन हैं। आईएनटीएसीएच (इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चरल हेरिटेज), नई दिल्ली कला संरक्षण केंद्र है, जहां प्राइवेट संग्रहकर्ता तथा संस्थाओं को जीर्णोद्धार की सुविधाएं प्रदान की जाती हैं।

    प्राइवेट आर्ट फर्मे तथा कला दीर्घाएं भी आकर्षक विकल्प हैं हालांकि प्राइवेट प्रैक्टिस में खतरा हो सकता है, क्योंकि इस क्षेत्र में भारी निवेश करना पड़ता है, लेकिन एक बार पैर जम जाने के बाद यह आकर्षक विकल्प बन जाता है। आप कला व्यवहार में विविधता ला सकते हैं। इसमें कला सामग्री का व्यापार भी शामिल है। ऐसा करते समय असाधारण या उत्कृष्ट व्यवसाय-बोध और कलात्मक कौशलों का सुंदर सम्मिश्रण किया जाता है। प्रारंभिक रुकावटों के बावजूद संरक्षण और जीर्णोद्धार के क्षेत्र में काफी पैसा मिलता है। मोनेट के संरक्षण में मेहनताना मिलता है। दक्ष जीर्णोद्धारक अच्छी-खासी रकम कमा सकता है।

    (कैरियर संबंधी और अधिक जानकारी के लिए देखिए ग्रंथ अकादमी, नई दिल्ली से प्रकाशित ए. गांगुली और एस. भूषण की पुस्तक "अपना कैरियर स्वयं चुनें"।)

    इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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