सपनों के सौदागरों पर नहीं रहा भरोसा!

बैतूल, 11 अप्रैल (आईएएनएस)। नारे लग रहे हैं, स्वर्णिम इतिहास लिखने की बात हो रही है और जीतने पर तस्वीर तथा तकदीर बदलने के वादे करने में कोई किसी से पीछे नहीं है। लोक सभा उपचुनाव का नजार ऐसा ही है। मगर बैतूल के चिचौली की सड़क के किनारे खड़े बाबूलाल को अब यह बातें नहीं सुहाती।

पिछले पांच दशक में उन्होंने दर्जनों चुनाव देखे हैं और सैकड़ों तरह के वादे हुए हैं, इसलिए वे कुछ सुनने की बजाए महुआ बेचने निकल पड़े हैं।

हाथ में महुआ की बोरी लिए खड़ा बोई गांव का बाबूलाल जहां देखता है उसे झंडे बैनर दिखाई दे रहे हैं और नेताओं के भाषण उसके कानों को शोर लग रहे हैं। इसके बावजूद इन सबसे बेखबर होकर वह अपने महुआ के दाम तलाश रहा है। एक ओर जहां वोट के लिए बोली लग रही है तो दूसरी ओर बाबूलाल के महुआ की। बाबूलाल के लिए वोट से ज्यादा कीमती महुआ है क्योंकि पेट तो रोटी से भरेगा।

चार किलो महुआ 28 रुपए में सात रुपए किलो के भाव से बेचने के बाद बाबूलाल अपने बजट का हिसाब किताब लगाने लगता है। उसे बैतूल में होने वाले उप चुनाव से कोई सरोकार नहीं है। वह सिर्फ इतना कहता है कि भैया बहुत चुनाव देख लिए, साठ की उमर पार हो गई है। ये नेता तो सिर्फ बातें ही करते हैं। हम जहां पहले थे आज भी वहीं खड़े हैं। खेत में हल चलाया सो अब भी चला रहे हैं। फुर्सत के वक्त महुआ बीन लेते हैं और चिचौली आकर उन्हें बेच जाते हैं।

बाबूलाल चुनाव का नजारा देखकर और नेताओं की बातें सुनकर सिर्फ मुस्कराकर रह जाता है। ऐसा इसलिए क्योंकि उसे लगता नहीं है कि जो नेता कह रहे हैं वैसा कुछ होगा। उसकी नजर में नेता तो सिर्फ इसलिए आए हैं कि चुनाव करीब है। उनके वादों से तन पर कपड़ा और पेट में रोटी नहीं आ सकती। बाबूलाल जैसे लोग जान गए हैं कि नेताओं की बातों में अब दम नहीं रहा।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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