गौरी कला गांव की महिलाएं कर रही हैं सामूहिक खेती

वाराणसी, 7 अप्रैल(आईएएनएस)। 'आंचल में है दूध और आंखों में पानी' वाली कहानी अब बीते जमाने की बात हो गई है क्योंकि महिलाएं जहां पुरुषों के साथ पाताल की गहराईयां नाप रही हैं वहीं अंतरिक्ष की ऊंचाई भी छूने में पुरुषों से पीछे नहीं हैं। महिला सशक्तिकरण का यह उदाहरण केवल शहरों तक ही सीमित नहीं है बल्कि गांवों तक भी पहुंच गया है।

वाराणसी के आस पास के गांवों में ग्रामीण महिलाओं ने सामूहिक खेती और स्वयं सहायता समूह को स्वावलंबन का नया माध्यम बनाया है। इस क्षेत्र की महिलाएं अब घर की चहारदीवारी से न सिर्फ बाहर निकल रही हैं बल्कि कुदाल और फावड़ा चला कर सामूहिक खेती भी कर रही हैं।

बात हम वाराणसी के गौरीकला गांव की कर रहे हैं, जहां लगभग 4500 महिलाओं ने न सिर्फ सामूहिक खेती को आजीविका का साधन बना लिया है, बल्कि सेल्फ हेल्प ग्रुप (स्वयं सहायता समूह ) बनाकर एक दूसरे की मदद भी कर रही हैं।

महिलाओं में यह आत्मनिर्भरता अकेले गौरीकला गांव में ही नहीं आई है बल्कि इस पूरे इलाके के 90 गांवों की लगभग 4500 महिलाएं न सिर्फ आत्मनिर्भर हुई हैं बल्कि ये सामूहिक खेती करके अपने परिवार का पेट भी पाल रही हैं ।

ग्रुप में खेती करके अपने जीवन में नया सवेरा लाने वाली इन महिलाओं ने अब ख़ुद किराये पर खेत लेकर आलू, पपीता, अमरूद, गेहूं , चावल, और फूल तक की खेती करने लगी हैं। सामूहिक खेती के तहत ग्रुप की महिलाएं खेतों में सामूहिक रूप से काम करती हैं और जो पैदा होता है उसे आपस में बांट लेती हैं । साल के अंत में जो बच जाता है उसे समूह के खाते में डाल दिया जाता है ताकि समूह के पास अतिरिक्त जमा रहे ।

इसी का नतीजा है कि आज इस गांव की महिलाएं आत्मनिर्भर हैं, क्योंकि इनके पास अब जमीन है, अन्न का भंडार है, बैंक बैलेंस है। लिहाजा इनका हौसला बुलंद है और चहरे पर मुस्कुराहट है । ऐसा किसी चमत्कार से नहीं बल्कि इनकी ख़ुद की मेहनत और स्वयं सहायता समूह के प्रयासों से हुआ है।

स्वयं सहायता समूह महिलाओं का वह समूह है जिसमें सब कुछ सामूहिक रूप से होता है । गांव की 15 से 20 महिलाएं मिलकर एक समूह बनाती हैं जिसका बकायदे एक नाम रखा जाता है इसके बाद उस समूह में सभी सदस्य प्रतिदिन कुछ न कुछ पैसे जमा करते हैं। जिनका बकायदे हिसाब किताब लिखा जाता है और जब जरूरत पड़ती है तब इनके सदस्यों को 2 फीसदी ब्याज पर लोन भी दिया जाता है। अब न इन्हें दूसरों के सामने हाथ फैलाना पड़ता है और न ही ये महाजनों के चुंगल में फसती हैं।

लक्ष्मी बाई नामक समूह की सदस्या रीता और विजय लक्ष्मी बड़े गर्व के साथ कहती हैं कि अब हमारे गांव की कोई भी महिला को महाजनों के यहां हाथ फैलाने की जरूरत नहीं पड़ती है, क्योंकि अब हमारे पास जमीन ही नहीं नकद पैसा भी है। इसी गांव की मुन्नी देवी का दावा है की यदि इसी माडल को पूरे देश में अपना लिया जाय तो महिलाएं भी स्वावलम्बी बन सकती हैं।

दरअसल पूर्वाचल की परंपरा के अनुसार ये महिलाएं भी घर की चहारदीवारी से बाहर नहीं निकलती थी और घर में ही हैंडलूम पर कम करती थी। लेकिन जब हैंडलूम इंडस्ट्री में मंदी आ गई तो इनकी जिंदगी रेशम के धागों में उलझती नजर आई । गांव का पुरूष वर्ग रोजी रोटी की तलाश में शहर चला गया लिहाजा महिलाओं ने फावड़ा उठा लिया । आज इनकी जिंदगी में फूलों की बाहर है और स्वावलंबन की रौनक। इसके लिए ह्यूमन वेलफेयर एशोसियेशन नामक जिस संगठन ने इन्हें रास्ता दिखाया उसके अध्यक्ष डाक्टर रजनी कान्त और भी उत्साहित है और उसका मानना है की महिलाओं के लिए किया गया यह प्रयास पूरे देश के लिए माडल बन सकता है।

महिला सशक्तिकरण की माडल बन चुकी इन महिलाओं ने पूरे क्षेत्र की तस्वीर ही बदल कर रख दी है और अब ये चाहती हैं पूरे देश की महिलाएं इनकी तरह स्वावलंबी बने ताकि ये किसी पर आश्रति न रहें। इन महिलाओं को ह्यूमन वेल फेयर एशोसियेशन नामक स्वयं सेवी संस्था ने केवल तरीका बताया था और इन महिलाओं ने अपनी मेहनत से रास्ता ख़ुद ही बना लिया। इस क्षेत्र की महिलाओं के बुलंद हौसलों और मंजिल पा लेने के उत्साह को देखकर अब यही कहा जा सकता है कि महिला सशक्तिकरण का इससे बड़ा उदाहरण शायद ही दूसरा कोई नहीं है।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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