कैसे चंद्रयान-3 अभियान से जुड़ीं चंद्र मोहिनी भाटिया की बेटी विनती? अद्भुत है इनके हौसले की उड़ान
भारत ने चंद्रमा के उस दक्षिणी छोर पर कदम रखा है, जहां पहुंचना इससे पहले किसी देश के लिए संभव नहीं हुआ। चंद्रयान-3 मिशन की इस सफलता में इसरो के सैकड़ों वैज्ञानिकों की मेहनत लगी है। इन वैज्ञानिकों में बड़ी संख्या देश की होनहार महिला वैज्ञानिकों की भी है, जिनकी तारीफ में आज सारी दुनिया कसीदे पढ़ रही है। उन्हीं में से एक कानपुर की युवा वैज्ञानिक विनती भाटिया भी हैं।
1990 के दशक में जन्मीं विनती भाटिया की सफलता की कहानी देश के करोड़ों युवाओं को नई राह दिखा सकती है। क्योंकि, विनती की शिक्षा का शुरुआती दौर असफलताओं से होकर ही होकर गुजरा है। लेकिन, अपने हौसले और परिश्रम के दम पर वह आज वहां पहुंचीं है, जिसपर सारा देश ही नहीं, बल्कि पूरी मानवता गौरवांवित हो रही है।

कानपुर के स्कूल टीचर की बेटी हैं विनती भाटिया
कानपुर कैंट स्कूल में टीचर रहीं चंद्र मोहिनी भाटिया की बिटिया को परिवार में उन्हीं आर्थिक चुनौतियों से गुजरना पड़ा, जिसका सामना एक आम मध्यम वर्गीय भारतीय परिवार को करना होता है। लेकिन, शिक्षा की बात थी तो मां अपने बच्चों के लिए कहां समझौता करने वाली थी। बेटी पढ़ने में थोड़ी कमजोर भले थी, लेकिन उसने अच्छी शिक्षा देने की जिद जो ठान रखी थी।
शुरू में पढ़ाई में कमजोर समझी जाती थीं विनती
माता-पिता ने शहर के गुरु नानक पब्लिक सीनियर सेकेंड्री स्कूल में दाखिला करवाया। पढ़ाई अच्छी हो, लिहाजा पिता कृष्णा गोपाल भाटिया का आशीर्वाद हमेशा सिर पर बना रहा। आठवीं तक तो फिर भी किसी तरह से खींचकर काम चला। लेकिन, जब दादाजी का साया सिर से उठा तो दुख को दबाने के लिए उन्होंने किताब में ऐसा मन रमाया कि फिर कहानी ही पलट गई।
गाजियाबाद से की मैकेनिकल इंजीनियरिंग
पढ़ाई में पीछे रहने वाली विनती नौवीं से विद्या हासिल करने में पूरी तरह से रम गईं। अब क्लास में टीचर बच्चों को उनका उदाहरण देने लगे। पढ़ाई रफ्तार पकड़ती रही और बारवीं के नतीजे ने परिवार को बहुत खुश कर दिया। विनती अब अपने करियर का रास्ता तय करने के लिए तैयार हो रही थीं। लड़कियों के लिए कम आकर्षक विषय मैकेनेकिल इंजीनियरिंग पढ़ने दिल्ली-एनसीआर में गाजियाबाद के आईएमएस पहुंच गईं।
कभी हिम्मत नहीं हारीं
थोड़े समय तक परिणाम आशा के अनुरूप नहीं आए। लेकिन, विनती अब 'विनती' करने के लिए तैयार नहीं थीं। वह लड़ीं और खुद को फिर से संभाल लिया। इंजीनियरिंग के बाद आईटी में काम करने के लिए हैदराबाद पहुंचीं। लेकिन, मन नहीं लगा तो वापस अपने शहर लौट आईं। मैकेनिकल इंजीनियरिंग में ही और आगे बढ़ना तय किया।
आईआईटी दिल्ली में भी पढ़ने का मौका मिला
डीआरडीओ में शामिल होने का मौका मिला। यहीं से उन्होंने वैज्ञानिक बनने का ठान लिया। डीआरडीओ की फेलोशिप पर पढ़ाई के लिए आईआईटी दिल्ली पहुंचीं। नौकरी भी की और साथ में मास्टर्स भी करती रहीं। मेहनत में कोई कसर नहीं रखी। लाइब्रेरी को ही घर बना लिया। पहली बार गेट में मनपसंद परिणाम नहीं आया तो दूसरी बार हजार से कम रैंक में आ पहुंचीं। पब्लिक सेक्टर की अच्छी कंपनियों से नौकरी का ऑफर आता रहा, लेकिन किसी न किसी वजह से उन्हें स्वीकार नहीं कर पाईं।
आईआईटी कानपुर से पीएचडी की
विनती के जीवन में एक और बेहतर अवसर तब आया, जब उन्हें 2015 में सरकारी स्कॉलरशिप पर आईआईटी कानपुर में पीएचडी करने का मौका मिला। यह उनके लिए बहुत बड़ा सपना साकार होने जैसा था।
चंद्रयान टीम का हिस्सा बन गई कानपुर की विनती भाटिया
इसके बाद विनती ने इसरो ज्वाइन करने की कल्पना की। उस परीक्षा में शामिल हुईं, जिसमें देशभर में एक ही सीट थी। विनती कामयाब रहीं। 2016 में वह भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन की सदस्य बन गईं। चंद्र मोहिनी भाटिया की इस बेटी की साख अब इसरो के अच्छे वैज्ञानिक के रूप में बन चुकी थी। वह चंद्रयान टीम का हिस्सा बन चुकी थीं।












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