'राजनीति में नए-नए आए हो क्या मंत्री जी, जो सुबह ही ऑफिस आ गए?'

''रोज आने की कोई जरूरत नहीं है मंत्री जी। जब मन हो आ जाया करें। कुछ वक्त बीवी-बच्चों को दीजिए और कुछ आलाकमान को... लोकसभा में टिकट की कोशिश करिए।''

नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश में जब से सरकार बदली है, आला अफसरों से लेकर कर्मचारियों तक की शामत आई हुई है। हर मंत्री अपनी कर्मठता दिखाने के चक्कर में अपने मंत्रालय के कर्मचारियों को लपेट ले रहा है, हालांकि बाबू लोग इससे बिल्कुल परेशान नहीं हो रहे हैं क्योंकि उन्हें पता है कि नया मुल्ला पांच-सात दिन तक जल्दी-जल्दी अजान देता ही है।

'राजनीति में नए-नए आए हो मंत्री जी, जो सुबह ही ऑफिस आ गए?'

यूपी के सारे मंत्री अपने मंत्रालय के कर्मचारियों को ईमानदारी की शपथ दिल रहे हैं, बड़ी-बड़ी बातें हो रही हैं। इसके अलावा भी कई चीजें सामने आ रही हैं। मोहसिन रजा अपने ऑफिस में मुलायम सिंह की तस्वीर देख कर्मचारियों पर भड़क गए तो उपेंद्र तिवारी ने खुद ही कार्यालय में झाडू लगाई जिससे अफसरों ने छोटे कर्मचारियों की क्लास ले ली। हद तब हो गई जब दफ्तर पहुंचे मंत्री एसपी बघेल को ऑफिस ही बंद मिला।

एसपी बघेल अपने दफ्तर पर देर तक खड़े रहे। काफी देर इंतजार के बाद एक बाबू आया, तो हाथ से मंत्री जी को दरवाजे से हटने के कहा (मुंह गुटखे की वजह से खुल नहीं पाया, खोल देते तो मंत्री जी को शर्ट बदलनी पड़ती इसलिए हाथ से ही इशारा किया), ताला खोला मंत्री जी को भीतर जाने का इशारा किया और चाय पीने चला गया।

मंत्री जी देर तक बैठे रहे। चाय-पानी के बाद बाबू वापस आया तो मंत्री जी भड़क गए और खरी-खोटी सुनाने लगे लेकिन बाबू एकदम कूल रहे। बाबू को शांति में देख मंत्री जी भी शांत हो गए और उन्हें सामने की कुर्सी पर बैठा लिया। मंत्री जी ने सोचा कि गुस्से से क्या फायदा, इनसे बातचीत करके दफ्तर का माहौल जान लेते हैं।

मंत्री जी- भैया, हम पहले आ गए, इतनी देर बाहर खड़े रहे और अब इतनी देर हो चुकी है लेकिन कोई नहीं आया? क्या यहां रोज यही होता है?

बाबू- अभी और आधे घंटे तक कोई नहीं आने वाला वाला है। ये तो मैं आ गया क्योंकि मैं कभी-कभी टीवी देखता रहता हूं।

मंत्री जी- टीवी देखने और ऑफिस आने का क्या मतलब ?

बाबू - यूपी में आपकी जीत के बाद पीएम बोले थे ना... कि बहुत से लोग पहली बार जीत कर आए हैं जिन्हें तजुर्बा नहीं है तो इसलिए उनसे गलतियां हो सकती हैं। बस वही बात हमारे दिमाग में थी कि कहीं हमारे ऑफिस का नया मंत्री भी कोई पहली बार वाला ना हो... और...

मंत्री जी- तो आपको लगता है कि टाइम पर आना अनाड़ीपन और गैर-तजुर्बेकार लोगों का काम है..?

बाबू- तो आपको क्या लगता है कि ये एक्सपीरियंस वाले लोग ऐसे फेसबुक पर मशहूर होने के कारनामे करते हैं (बातचीत में थोड़ा सा कमला पसंद बाबू के मुंह से निकल कर मेज पर भी गिरा)

मंत्री जी- पहले तो आप जाकर ये गुटखा थूक कर आइए.. आपको पता है ना कि ये सब नई सरकार में नहीं चलेगा।

बाबू- आप हमारे बिना सरकार चला लेंगे क्या???

मंत्री जी- इसका गुटखा थूक कर आने से क्या मतलब हुआ?

बाबू- देखो मंत्री जी, मंत्रालय आप मंत्री नहीं हम बाबू लोग चलाते हैं... और हम चलते हैं, कमला पसंद से .. तो बिना गुटखे के तो हम एक ठों काम ना करेंगे फिर देखना क्या रिपोर्ट आएगी मंत्रालय की और साथ में आपकी भी... गुस्सा क्यों होते हैं, मेज हम साफ किए देते हैं (बाबू ने हाथ फिरा कर मेज से गुटखा साफ कर दिया, बस लाल निशान रह गया)

मंत्री जी- अरे यार, मैं मुख्यमंत्री और आलाकमान को क्या जवाब दूंगा अगर मंत्रालय में काम ठीक से नहीं होगा?

बाबू- देखिए, आप लोग हर पांच साल में बदल जाते हैं और मंत्रियों के मंत्रालय तो कई बार सालभर में ही बदल जाते हैं.. लेकिन हमें यहीं रहते हैं। इसलिए हम चीजों को ज्यादा समझते हैं ना कि आप... इसलिए काम कैसे होता है, ये हम जानते हैं।

मंत्री जी- अरे यार तो फिर हम क्या करें, आप ही बता दो ??

बाबू- देखो हमने सब विचारधारा वालों की सरकारें देखी हैं.. ये कर्मठता, ईमानदारी और बदल डालेंगे प्रदेश टाइप की बातें बस एक महीने का प्रोग्राम है। सरकार बनते ही एक-दो महीना इस तरह की क्रांति सब करते हैं.. पहले वाले भी करते थे और आपके बाद वाले भी करेंगे, हमें आदत है इस सब की इसलिए किसी का लोड नहीं लेते हैं। हमें पता है एक-डेढ़ महीने बाद सब ठीक हो जाएगा।

मंत्री जी- तो क्या हम भी दोपहर बाद आना शुरू करें???

बाबू- अरे साब, दोपहर को भी हर रोज आने की कोई जरूरत ही नहीं है, क्या करेंगे आप यहां? जब कभी घूमने का मन हो आ जाया करें। चुनाव के लंबे शेड्यूल के बाद फ्री हुऐ हैं तो कुछ वक्त बीवी-बच्चों को दीजिए और कुछ पार्टी आलाकमान की सेवा कीजिए... आलाकमान से संबंध मधुर करिए और लोकसभा लड़ने के लिए टिकट की कोशिश में लगिए..

मंत्री जी- बात तो एकदम सही है, लोकसभा का चुनाव लड़ने के इच्छुक तो हम भी हैं. आपने तो मन की बात कही लेकिन.. मंत्रालय का क्या होगा??

बाबू- मंत्री जी, हम किसलिए बैठे हैं। सभी कामों की फाइल टिपटॉप बन जाएंगी, सब रिपोर्ट एक नंबर मिलेंगी। बीच-बीच में मीडिया-वीडिया, कैमरा-अखबार वालों को बुला के आपका सम्मान वगैरह भी करवा देंगे अच्छा काम करने के लिए।

मंत्री जी- भैया, आप तो बड़े काम के आदमी लगते हैं, जैसे आप बताएंगे, हम वैसे ही करेंगे। राजनीति की बड़ी समझ लगती है आपको.... बताएं क्या-क्या करें हम।

बाबू- सबसे पहले तो सुबह उठकर ये क्लास के मॉनिटर की तरह सबसे पहले दफ्तर आना छोड़ दो, बहुत खराब आदत है. वो अमिताभ बच्चन का गाना है ना.. 'बुरी आदत है ये आदत अभी बदल डालो'.. आप तो जानते ही हैं मंत्री जी, नेता लोग बैंक बैंचर होते हैं, देर से आने वाले.. तो ये मॉनिटर मत बनों... समझे?

मंत्री जी- हां ये तो समझ गए और बताओ?

बाबू- दूसरा काम ये करो कि मंत्रालय के सभी कर्मचारियों के लिए एक बढ़िया पार्टी का इंतजाम करो.. थोड़ा पीने की भी इंतजाम.... ताकि कर्मचारी उत्साह से काम कर सकें। अच्छा, बाकी बात बाद में बताएंगे अभी ऑफिस के दूसरे लोग आ गए हैं। कल हम घर पर ही आकर आगे का प्रोग्राम बताएंगे नेताजी... और मिठाई भी खाएंगे आपकी जीत और मंत्री बनने की...

(यह एक व्यंगात्मक लेख है)

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