कोरोना से जूझता बिहार, अस्पताल फुल, मरीजों को नहीं मिल रही जगह, देखिए क्या है हाल
पटना, अप्रैल 15। कोरोना वायरस की दूसरी लहर ने देशभर में स्वास्थ्य सुविधाओं की बुरी हालत की पोल खोलकर रख दी है। बिहार में जहां स्वास्थ्य व्यवस्था पहले से ही लचर हालत में है, कोविड की दूसरी लहर ने चुनौती को कठिन कर दिया है। इस दौरान पिछले 24 घंटे में राज्य में कोविड एक्टिव केस की संख्या 21 हजार से अधिक हो चुकी है जिनमें 7000 से अधिक केवल राजधानी पटना में हैं।

पटना के बाद गया, भागलपुर और मुजफ्फरपुर सबसे अधिक प्रभावित जिले हैं। राज्य में कई ऐसे केस सामने आ रहे हैं जहां मरीजों को बेड ही नहीं मिल पा रहा है। स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडे सुविधाएं बढ़ाने की बात कर रहे हैं लेकिन अभी इसका असर नहीं दिख रहा है।
अभी तक जो हालात हैं उसके मुताबिक करीब 20 सरकारी और निजी अस्पतालों में कोविड बेड भर चुके हैं। पटना एम्स के डायरेक्टर पीके सिंह ने कहा कि हम बेड बढ़ा रहे हैं लेकिन यह काफी नहीं है। उन्होंने रेफर किए जा रहे केसों की बढ़ती संख्या को लेकर कहा कि सभी को जगह दे पाना बहुत ही मुश्किल है। पीएमसीएच और एनएमसीएच में यही हाल हैं।
कई निजी अस्पतालों में भी बेड भर चुके हैं। डॉक्टरों का कहना है कि पिछले 10 दिनों में कोविड मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ी है। अगले महीने में स्थिति और चुनौतीपूर्ण व भयावह होने की आशंका जताई जा रही है।
राज्य में केवल 1700 आईसीयू बेड
अगर पूरे बिहार के हेल्थ केयर की बात करें तो राज्य में केवल 1700 आईसीयू बेड हैं। इनमें से 1000 बेड निजी अस्पतालों में हैं जबकि 700 बेड सरकारी अस्पताल में हैं। वेंटिलेटर की संख्या तो और भी कम है। केवल 800 वेंटिलेटर हैं जिनमें से 300 सरकारी अस्पतालों में हैं और 500 वेंटिलेटर निजी अस्पतालों में मौजूद हैं।
राज्य के स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडे ने कहा है "हम एम्स, पीएमसीएच और एनएमसीएच में 30-30 बेड बढ़ा रहे हैं।" इसके साथ ही राज्य ने इंदिरा गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (आईजीआईएमएस) से 50 कोविड बेड शुरू करने की अपील की है। इन सबके साथ ही केंद्र ने ऐसा इशारा किया है कि एम्स पटना को पूर्ण रूप से कोविड अस्पताल घोषित किया जा सकता है।
ऐसे में बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि क्या इतने प्रयास से कोरोना वायरस के बढ़ते संक्रमण से मुकाबला किया जा सकता है। पिछले दिनों एक मरीज की एनएमसीएच के बाहर इलाज के इंतजार में मौत हो गई थी। उसे निजी अस्पताल से गंभीर हालत में रेफर किया गया था। परिजनों ने एनएमसीएच पर लापरवाही का आरोप लगाया था। हालांकि एनएमसीएच प्रबंधन ने लापरवाही के आरोपों से इनकार किया है और कहा है मरीज जब पहुंचा तो मौत हो चुकी थी। प्रबंधन का कहना है कि अक्सर निजी अस्पताल हालत एकदम खराब होने पर मरीज को हमारे पास रेफर कर देते हैं और सारा दोष हम पर डाल देते हैं।
वापस लौट रहे प्रवासी बड़ी चुनौती
सबसे खराब हालत जिला अस्पतालों की है जहां पर कोरोना से निपटने के लिए कोई खास इंतजाम नहीं है और सब कुछ भगवान भरोसे चल रहा है। जिला स्तर के अस्पतालों में कोरोना वायरस के गंभीर मरीजों को लेकर व्यवस्था नहीं है।
इसके साथ महाराष्ट्र से वापस लौट रहे प्रवासी मजदूर और यात्री एक नई चुनौती लेकर खड़े हुए हैं। पाटलिपुत्र रेलवे स्टेशन पर, जहां महाराष्ट्र से आने वाले अधिकांश ट्रेन रुकती हैं, 100 कोविड पॉजिटिव केस सामने आ चुके हैं। इन्हें आइसोलेशन सेंटर में रखा गया है।












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