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हिंदुत्व की राजनीतिः परिवर्तन के संकेत

हिंदुत्व की राजनीतिः परिवर्तन के संकेत
लोकसभा चुनाव में हार के बाद बीजेपी और आरएसएस के हर वर्ग में हताशा और कुंठा है। हार के कारणों की व्याख्या को लेकर बयानबाजी का दौर चल रहा है। लोकसभा में विपक्षी पार्टी को कुछ सुविधाएं और संवैधानिक पद मिलते हैं, उन पर दावेदारी की बातें भी झगड़े की ज़द में हैं। नेताओं के एक बड़े वर्ग को यह हार अप्रत्याशित लग रही है। उनकी समझ में नहीं आ रहा है कि आतंकवाद, महंगाई और मजबूत नेता की बुनियाद पर डिजाइन किए गए चुनाव अभियान को जनता ने गंभीरता से क्यों नहीं लिया।

आरएसएस और बीजेपी के नए पुराने चिंतकों की राय अखबारों में छप रही है और जो बात सबसे ज्यादा जोरदार तरीके से उठाई जा रही है, वह हिंदुत्व की विचारधारा से ताल्लुक रखती है। संघ परिवार के चिंतक हार का कारण हिंदुत्व से अलग होना बता रहे हैं। लगभग सब का मानना है कि अगर हिंदुत्व को चुनावी मुद्दा बनाया गया होता तो चुनाव जीता जा सकता था।

हिंदुत्व असल में है क्या?

राजनीतिक विश्लेषण के इस मौसम में हिंदुत्व की बारीकियों को समझना जरूरी है। हिंदू धर्म और हिंदुत्व की तरह-तरह की व्याख्याएं की गई हैं। हमारी परंपराओं के आधार पर इस देश में जो भी लोग रहते हैं अगर वे मुसलमान, सिख, ईसाई और यहूदी नहीं हैं, तो उनका वर्गीकरण हिंदू के रूप में किया जाता है। यानी आर्य समाजी, सनातनधर्मी, नाथपंथी, गोरखपंथी, कबीरपंथी, बौद्घ, जैन आदि संप्रदायों में बंटे हुए लोग हिंदू धर्म के अंदर आते हैं। हिंदुत्व को राजनीतिक आख्यान के साधन के रूप में इस्तेमाल करने का अब तक का सबसे सफल प्रयोग भगवान राम की जन्मभूमि के आख्यान के इर्द गिर्द बुना गया था। आरएसएस के कई वर्षों के प्रचार के बाद सनातन धर्मी हिंदुओं के एक वर्ग को यह बता दिया गया था कि अयोध्या में जहां राम का जन्म हुआ था, वहीं पर बाबरी मस्जिद बना दी गई थी।

आरएसएस और बीजेपी ने एड़ी चोटी का जोर लगा लिया लेकिन सरकार बनाने लायक बहुमत नहीं जुटा पाए। लगता है कि हिंदुत्व के सारे आख्यान को भगवान राम के सहारे चलाकर संघ परिवार ने हिंदुओं के एक बड़े वर्ग को अपने से अलग कर दिया। आर्य समाज के महान नेता दयानंद सरस्वती राम को महापुरुष तो मानते हैं लेकिन अवतार नहीं मानते। कबीरपंथी, गोरखपंथी आदि संप्रदायों के लोगों के मन में भी भगवान राम को वह मुकाम नहीं हासिल है, जो हिंदुत्ववादियों के मन में है।

सवर्णों और दलितों का हिंदुत्व

हिंदुत्व को राजनीति की बुनियाद बनाने की कोशिश कर रहे नवचिंतकों से एक सवाल पूछा जाना चाहिए कि आरएसएस जिस हिंदुत्व की बात कर रहा है क्या वह केवल सवर्णों का पक्षधर हिंदुत्व नहीं है। इस देश में दलितों की संख्या 20 प्रतिशत से ज्यादा है और वे कभी भी न जनसंघ के वोटर रहे और न ही बीजेपी के। बौद्घों, जैनों और सिखों के भी आराध्य देव भगवान राम नहीं हैं। आर्य समाजी भी किसी से कम हिंदू नहीं हैं लेकिन वे वेदों को ही अंतिम सत्य मानते हैं। सबको मालूम है कि वेदों में हिंदुत्व के वर्तमान संदर्भ का कोई महत्व नहीं है।

हिंदुत्व को राजनीति की बुनियाद मानकर चलने पर बीजेपी को सत्ता का विचार दिमाग से निकाल देना पड़ेगा क्योंकि करीब ख्0 प्रतिशत मुसलमान और 20 प्रतिशत दलित तो तुरंत उनकी राजनीति के विरोधी हो जाते है। अगर आर्यसमाजी, जैन, बौद्घ, कबीर पंथी, नाथपंथी आदि को भी जोड़ लिया जाए तो चुनावी गणित में बीजेपी को 20 प्रतिशत लोगों को अपनी गणना से बाहर करके शुरू करना पड़ेगा। इसके बाद उदारवादी और सनातनधर्मी हिंदुओं का एक बड़ा वर्ग भी आक्रामक हिंदुत्व का समर्थन कभी नहीं करेगा। हो सकता है कि सत्ता की प्रमुख दावेदार बीजेपी के नेताओं ने इस सच्चाई को अच्छी तरह से समझा हो। इसीलिए नागपुर और झंडेवालान के बार बार चेताने के बाद भी हिंदुत्व को राजनीति का आधार बनाने की बीजेपी वालों की हिम्मत नहीं पड़ रही है।

भाजपा का सफर और उसकी असलियत

पिछले 25 वर्षों से अपने देश में हिंदुत्व के आक्रामक पक्ष को राजनीति के रूप में पेश किया जा रहा है। 1996 तक तो बीजेपी को उम्मीद थी कि अपने बल पर इतनी संख्या जुटा ली जाएगी कि केंद्र में सरकार बना ली जाए लेकिन 1998 में यह उम्मीद छोड़ दी गई और उन लोगों को साथ लेकर सरकार बनाई गई जो शुद्घ हिंदू राजनीति के पक्षधर नहीं थे। अकाली दल के लोग सिखों के, तेलुगू देशम के सांसद पिछड़ों और मुसलमानों के, नेशनल कांफ्रेस वाले मुसलमानों के वोट से जीत कर आए थे। ज़ाहिर है कि 1999 की बीजेपी सरकार हिंदुत्व विरोधी वोटों के बल पर पड़ी थी। शायद इसी राजनीतिक सच्चाई के चलते बीजेपी के लोग अब खांटी हिंदुत्व की राजनीति से अपने को अलग करना चाहते हैं। हिंदुत्ववादी तरकीब से सारे हिंदू तो साथ आते नहीं, गैर हिंदुत्ववादी साथ छोड़कर चले जाते हैं।

वैसे भी हिंदुत्व की विचारधारा हिंदू धर्म की प्रतिनिधि नहीं है। 1923 में वीडी सावरकर जब रत्नागिरि जेल में बंद थे तो उन्होंने चुपके एक पत्रक लिखा था जिसमें हिंदुत्व की विचारधारा के बारे में बताया गया था। इस विचारधारा को मानने वालों के लिए जरूरी था कि वे भारत को अपनी पितृभूमि और पुण्यभूमि मानें। यही एक शर्त मुसलमानों और ईसाइयों को इनसे अलग कर देती है ज़ाहिर है इस विचारधारा को मानने वाले की राजनीतिक शक्ति नहीं बने। हिंदुत्व की राजनीति का सबसे ऊंचा उफान 1999 में आया जब बीजेपी को लोकसभा मे 182 सीटें मिलीं फिर भी सरकार तब तक नहीं बनी जब तक सिखों और मुसलमानों के वोट पाकर विजयी लोगों ने साथ नहीं दिया। इसीलिए बीजेपी के नेता सावरकरवादी हिंदुत्व को अपनी राजनीति का आधार बनाने को तैयार नहीं है।

हिंदुत्ववादी राजनीति के लिए वर्तमान समय बहुत ही उथल-पुथल भरा है। आरएसएस के पूर्व प्रवक्ता और बड़े नेता एमजी वैद्य ने अपने तरुण भारत वाले लेख में साफ कह दिया कि अगर बीजेपी की राजनीति का आधार हिंदुत्व नहीं है तो उसे संघ से अलग हो जाना चाहिए। जबकि राजनीतिक समझदारी का तकाजा है कि इस हिंदुत्व को अपनाने पर देश की आबादी का एक बड़ा वर्ग बीजेपी अलग हो जाएगा। तो क्या यह समझा जाए कि आने वाले समय में हिंदुत्ववादी राजनीति में कुछ परिवर्तन होने वाला है। ज़ाहिर है बीजेपी के पराजय के बाद शुरू हुई राजनीतिक गतिविधियां देश के राजनीतिक क्षितिज पर बड़े परिवर्तन का संकेत दे रही हैं।

[शेष नारायण सिंह वरिष्ठ राजनीतिक पत्रकार हैं।]

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