Get Updates
Get notified of breaking news, exclusive insights, and must-see stories!

एक नजर चुनाव बाद समीकरणों पर

Government of India
तीसरे दौर के चुनाव के बाद बिल्कुल पक्का हो गया है कि बीजेपी के नेता लाल कृष्ण आडवाणी के प्रधानमंत्री पद के सपने हमेशा के लिए दफ़न हो जायेंगे। जिन 107 लोकसभा सीटों के लिए पिछली 30 अप्रैल को वोट डाले गए उसमें मध्य प्रदेश की 16, महाराष्ट्र की 10, गुजरात की 26, और कर्नाटक की 11 सीटें हैं। 2004 के चुनावों में इन 63 सीटों में बीजेपी को 39 सीटें मिलीं थीं। और कांग्रेस को 19 सीटें मिली थीं।

एक नजर भाजपा के प्रदर्शन पर

गुजरात और मध्य प्रदेश में बीजेपी का प्रदर्शन बहुत अच्छा था। मसलन मध्य प्रदेश में इन कम सीटों में से बीजेपी को 13 सीटें मिली थीं। ज़ाहिर है इससे बेहतर नतीजों की उम्मीद करने का कोई मतलब नहीं। पिछली बार मध्य प्रदेश में कांग्रेस को कुल चार सीटें मिली थीं जिसमें सुधार की संभावना है। दरअसल आज जिन सीटों पर चुनाव हो रहा है उन इलाक़ों को बीजेपी का गढ़ माना जाता है और यहां 2004 में बीजेपी का प्रदर्शन बहुत अच्छा था। अगर बीजेपी उस प्रदर्शन से एक सीट भी कम करती है तो उनकी कुल सीट संख्या कम हो जायेगी। जिसकी संभावना बहुत ही प्रबल है। इस के पहले के दोनों दौर में बीजेपी के साथियों की संख्या कम हुई है और सीटें भी कम होने वाली हैं। इसका मतलब यह हुआ कि बीजेपी की सरकार बनने की संभावना दूर-दूर तक नहीं है।

कांग्रेस भी अधर में

लेकिन इसका मतलब यह नहीं हुआ कि कांग्रेस के उम्मीदवार डा.मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बन जायेंगे। अगर कांग्रेस की सदस्य संख्या 150 उससे ऊपर पहुंच गई तब तो मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री बनने की संभावना बहुत जोरदार हो जायेगी लेकिन अगर कांग्रेस की सदस्य संख्या 130 पर ही अटक गई तो धर्मनिरपेक्ष सरकार तो बनेगी, लेकिन सरकार के स्वरूप के बारे में कुछ भी कह पाना संभव नहीं है। उस हालत में कोई भी गैर कांग्रेसी, गैर भाजपा नेता प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठ सकता है। इस तरह के दावेदारों की लिस्ट काफी लंबी है।

सबसे बड़ी दावेदार तो मायावती ही हैं जो चुनाव की घोषणा के पहले ही तीसरे मोर्चे के नेताओं को हड़का कर अपने आपको उम्मीदवार घोषित करवा लेना चाहती थीं। हालांकि उनका यह दांव नाकाम गया क्योंकि वामपंथी पार्टियों ने साफ बता दिया कि लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद तीसरें मोर्चे की सदस्य पार्टियों की संख्या को देखकर ही प्रधानमंत्री पद की दावेदारी पर विचार किया जायेगा। यानी उन्हें बता दिया गया कि 17 सीटों पर जीत हासिल करने के बाद प्रधानमंत्री पद के सपने देखना ठीक नहीं है। दूसरी बात जो उनके खिलाफ जाती है, वह यह कि मायावती ने कर्नाटक, मध्य प्रदेश, राजस्थान और गुजरात में लगभग सभी सीटों पर उम्मीदवार खड़े करके बीजेपी की जीत का रास्ता साफ़ किया है।

तीसरे मोर्चे के नेताओं ने इस बात का बहुत बुरा माना है और इस बात की पूरी संभावना है कि प्रधानमंत्री पद तो दूर मायावती को सेक्युलर सरकार में जगह भी न मिले। उत्तर प्रदेश और गुजरात के बीजेपी नेताओं से उनके अच्छे संबंध हैं। नरेंद्र मोदी की ओर से तो वे चुनाव सभाओं में भाषण भी कर चुकी हैं। ऐसी हालत में धर्मनिरपेक्ष राजनीति के पक्षधर नेता उन्हें अपने साथ लेने में संकोच कर रहे हैं।

प्रधानमंत्री पद के दावेदार

प्रधानमंत्री पद के अन्य दावेदारों में प्रकाश करात, एच डी देवगौड़ा, मुलायम सिंह यादव, जय ललिता, नीतीश कुमार और शरद पवार को माना जा रहा है। यह तो वक्त़ ही बताएगा कि ताज किसके सिर पर बांधा जाता है लेकिन राजनीतिक सरगरमियां जारी हैं और कांग्रेस के 130 से कम रहने पर भारत की 16 मई के बाद की राजनीति बहुत ही दिलचस्प हो जायेगी। सेक्युलर पार्टियों के दावेदारों में जो सबसे बड़ी दिक्कत है वह यह कि वामपंथी पार्टियों और शरद पवार के अलावा किसी भी प्रभाव क्षेत्र अपने राज्य के बाहर नहीं है। मुलायम सिंह यादव का उत्तर प्रदेश, एच डी देवगौड़ा का कर्नाटक, चंद्रबाबू नायडू का आंध्रप्रदेश और जयललिता का तमिल नाडु के बाहर कोई आधार नहीं है।

प्रकाश करात एक योग्य व्यक्ति और सबसे बड़ी कम्युनिस्ट पार्टी के मुखिया तो हैं लेकिन जिस तर्क का इस्तेमाल करके उन्होंने 1996 में ज्योति बसु को प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठने से रोका था वह उनके खिलाफ़ भी इस्तेमाल हो सकता है। कांग्रेस के प्रधनमंत्री पद से दूर रखने की प्रतिज्ञा कर चुके प्रकाश करात के लिए किसी और को आगे बढ़ाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता। ऐसी हालत में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के नेता शरद पवार के एक सर्वमान्य नेता के रूप में उभर कर आने की संभावना सबसे ज्यादा है। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के मुख्य प्रवक्ता डी पी त्रिपाठी का कहना है कि अगर कांग्रेस के उम्मीदवार पर सर्वमान्य फैसला न हुआ तो शरद पवार सबसे ज्यादा स्वीकार्य नेता होंगे। समाजवादी पार्टी और चिरंजीवी की प्रजा राज्य ने न तो उनका स्वागत करने का मन बना लिया है।

डीपी त्रिपाठी और प्रकाश करात में बहुत अच्छा संबंध है। ज़ाहिर है कि त्रिपाठी अपने नेता के पक्ष में वामपंथी समर्थन का जुगाड़ कर लेंगे। उनकी पार्टी का विस्तार कई राज्यों में है, सीटें भले न हों लेकिन गुजरात, बिहार, मध्यप्रदेश और गोवा में तो उनकी हैसियत है ही। पूवोत्तिर में भी पीए संगमा के चलते मज़बूती है। और तो और उत्तर प्रदेश की बिजनौर सीट पर बीजेपी, बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी को पीछे छोड़ कर उनका उम्मीदवार मज़बूत है और कांग्रेस से मुक़ाबला है। उत्तर प्रदेश की राजनीति मे यह अजूबा है लेकिन डीपी त्रिपाठी का दावा है कि ऐसा हो रहा है। यानी राष्ट्रवादी कांग्रेस का दायरा बढ़ रहा है। ऐसी हालत में 16 मई के बाद अगर कांग्रेस को 130 से कम सीटें मिलीं तो सेक्युलर पार्टियां शरद पवार को आगे बढा सकती हैं।

More From
Prev
Next
Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+