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एक्जिट पोल के आंकड़े व दावेः एक विश्लेषण

चुनाव 2009 की मतदान की प्रक्रिया पूरी होते ही टीवी चैनलों की ओर से किए गए एग्जिट पोल पर चर्चा शुरू हो गई है। हर चैनल में अलग-अलग तरीके से नतीजों की संभावना का आकलन किया गया है। यहां यह साफ कर देना जरूरी है कि 2004 के चुनावों में एग्जिट पोल के नतीजे बिल्कुल गलत थे। ज्यादातर चैनलों ने भविष्यवाणी की थी कि बीजेपी की अगुवाई वाले एनडीए को करीब 250 सीटें मिलेंगी और सरकार बीजेपी की बनेगी जबकि कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन को 170 से 205 सीटों के बीच कुछ भी मिलने की भविष्यवाणी की गई थी।

भविष्यवाणी के खतरे

टीवी चैनलों की सारी विद्वता और सर्वज्ञता धरी रह गई थी जब एनडीए को 178 और कांग्रेस वाले गठबंधन को 216 सीटें मिल गई थीं। वामपंथी पार्टियों की 60 सीटों के सहयोग से कांग्रेस की सरकार बन गई थी और बीजेपी वाले ताकते रह गए थे। इसलिए टीवी चैनलों की भविष्यवाणी पर विश्वास करने पर खतरे बहुत है लेकिन चर्चा तो इन पर होती ही है। खास तौर पर जब लगभग सभी टीवी चैनल कह रहे हों कि यूपीए को बढ़त हासिल है और एनडीए पिछड़ रहा है तो लगने लगता है कि टीवी चैनलों की भविष्यवाणी की विश्वसनीयता कहीं 2004 के चुनावों जैसी ही न हो। लेकिन 2004 में सभी टीवी चैनलों की भविष्यवाणी पर मध्य वर्ग और बुद्घिजीवियों ने विश्वास नहीं किया था और नतीजे आने के बाद चैनलों की बहसों में शामिल हो रहे सर्वज्ञ लोग मुंह छुपाते फिर रहे थे। कुछ बहादुर किस्म के चैनल मालिकों और उच्च अधिकारियों ने नतीजे आने के बाद व्याख्या की थी कि गलती क्यों हुई। ज़ाहिर है इस तरह की कोशिशों का मखौल उड़ाया जाता है और वही हुआ।

बीजेपी की सावधानी

2004 के चुनावों में बीजेपी की ओर से प्रमोद महाजन प्रचार प्रसार और मीडिया प्रबंधन का काम देख रहे थे। अपने रसूख के बल पर स्व. महाजन ने ऐसा माहौल बनाया था कि लगता था कि बीजेपी की वापसी पक्की थी। लेकिन सचाई कुछ और ही निकली। 2004 में भी जिन लोगों ने चुनावों का सही आकलन किया था, उन्हें भरोसा था कि बीजेपी और अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के खिलाफ जनता बहुत बड़े पैमाने पर थी और उनकी वापसी किसी भी हालत में संभव नहीं थी।
2004 के दूध के जले टीवी चैनलों ने इस बार पूरी सावधानी बरती है।

बीजेपी ने इस बार चुनाव पूर्व और चुनाव बाद सर्वेक्षण को प्रभावित करने की गरज से अपने खर्चे से सर्वेक्षण कराया था। सर्वेक्षण का जिम्म विख्यात सेफोलाजिस्ट जीवीएल नरसिंहा राव को दिया गया था। कोशिश की गई थी कि सेफोलाजी के अधिकारी विद्वान के नाम पर किए गए सर्वेक्षण को विश्वसनीयता की चादर ओढ़ाकर बाजार में पेश किया जाय लेकिन सफलता हाथ नहीं आई क्योंकि सबको मालूम है कि जीवीएल नरसिंहा राव अब बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य हैं। बीजेपी के प्रति उनकी निष्ठा पर सवाल उठाने का कोई औचित्य नहीं है।

यूपीए गठबंधन को बढ़त!

बीजेपी वाले सर्वे के अलावा बाकी सभी सर्वेक्षणों ने सावधानी बरती है और लगभग सभी का आकलन है कि यूपीए गठबंधन को 16 मई को बढ़त हासिल रहेगी। इस बार की परिस्थितियां ऐसी हैं कि 1999 की तरह बीजेपी को क्षेत्रीय पार्टियों का समर्थन नहीं मिलेगा। 1999 में बीजेपी के साथ, चंद्रबाबू नायडू, जयललिता और ममता बनर्जी सरकार में शामिल हो गए थे। लेकिन इस बार उनके शामिल होने की संभावना बहुत कम है। बीजेपी के साथ सरकार चलाकर जब ये नेता 2004 में दोबारा चुनाव में गए तो सबका सफाया हो गया क्योंकि अल्पसंख्यक समुदाय इनसे नाराज था। उसे यह बात ठीक नहीं लगी थी कि उसके वोट से जीतकर लोकसभा पहुंचे लोग, बीजेपी का साथ दें।

इन लोगों ने अगर 2002 के गुजरात नरसंहार के बाद भी बीजेपी से पल्ला झाड़ लिया होता तो इन्हें 2004 में अल्पसंख्यकों का वोट मिल सकता था। बहरहाल अल्पसंख्यकों के साथ धोखा करने का खामियाजा 2004 में उठा चुकी पार्टियां 2009 में 2004 वाली गलती नहीं करेंगी। इसका मतलब यह हुआ कि एनडीए को 2009 मे जयललिता, चंद्रबाबू नायडू और ममता बनर्जी का समर्थन नहीं मिलने वाला है क्योंकि अगले चुनाव में यह लोग फिर से शून्य होने की बात से अब भी डर जाते है। वामपंथी पार्टियां कांग्रेस से चाहे जितनी नाराज हों, वे बीजेपी की सरकार बनने से रोकने के लिए सारे उपाय करेंगी।

इस सबका मतलब यह हुआ कि 16 मई के बाद सरकार धर्मनिरपेक्ष ही बनेगी और पूरी संभावना है कि नेतृत्व मनमोहन सिंह के पास ही रहेगा। लेकिन अगर प्रकाश करात अपने कांग्रेस विरोधी रुख पर अड़े ही रह गए तो भी धर्मनिरपेक्ष सरकार तो बनेगी ही, प्रधानमंत्री कोई और बन सकता है।

[शेष नारायण सिंह वरिष्ठ राजनीतिक पत्रकार हैं।]

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