ऑनर किलिंग: सामाज का घिनौना कृत्य: भाग-2
सवाल उठता है कि जातीय जनगणना का अंतरजातीय विवाह से क्या संबंध है? वस्तुतः अंतरजातीय विवाह की राह में सबसे बड़ी बाधा जातीय जनगणना और आरक्षण है। हमारे देश के सभी अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के सदस्य इन्डोगेमस वर्ग से संबंध रखते हैं। सभी को इस वर्ग की सदस्यता जन्म के आधार पर मिलती है। बच्चे में पैतृक गुण माता-पिता से मिलता है, जिसका आधार वैधानिक विवाह होता है।
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वैधानिक विवाह का खिताब उसी को मिलता है जो एक जाति के अंदर विवाह करता है। यही वह प्रक्रिया जिसके माध्यम से व्यक्ति अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति या फिर अन्य पिछड़ा वर्ग का सदस्य बनता है। जब भी कोई आरक्षण की मांग करता है तो उसे अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति या फिर अन्य पिछड़ा वर्ग का सदस्य होने का प्रमाणपत्र प्रस्तुत करना पड़ता है।
अगर इन वर्गों के किसी सदस्य द्वारा प्रस्तुत किये गये प्रमाणपत्र के बाबत कोई विवाद सामने आता है तो अदालत उसके माता-पिता के विवाह की वैधानिकता और उसके अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति या फिर अन्य पिछड़ा वर्ग के वैधानिक सदस्य होने की जाँच करती है।
जाति के अंदर विवाह को मिलेगा बढ़ावा
वस्तुस्थिति से स्पष्ट है कि जब तक अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति या फिर अन्य पिछड़ा वर्ग की उपस्थिति हमारे समाज में है तब तक एक जाति के अंदर विवाह होना लाजिमी है। जातीय जनगणना से भी स्वजातियों के बीच विवाह को ही बढ़ावा मिलेगा। पड़ताल से स्पष्ट है कि जातीय जनगणना का उद्देष्य विविध जातियों की वास्तविक संख्या को निर्धारित करना है। जातीय जनगणना के द्वारा ही यह तय किया जा सकता है कि किस जाति को कितना प्रतिषत आरक्षण मिलना चाहिए। इस तरह से देखा जाए तो दोनों सिद्धांत स्वंय की मर्जी से अपना जीवन साथी का चुनाव करने की मंषा के खिलाफ है।
कहने के लिए तो हमारी न्यायपालिका देष के नागरिकों की अपनी पसंद से विवाह करने के अधिकार का बचाव करती है, पर साथ में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति या फिर अन्य पिछड़ा वर्ग जैसी सामाजिक संस्थाओं को मान्यता देकर इन्डोगेमी के सिद्धांत को भी मजबूत करती है। यह विरोधाभास सचमुच चैंकाने वाला है और साथ ही यह हमारी व्यवस्था की लाचारगी को भी जाहिर करता है।
दरअसल हमारी आधुनिक न्यायपालिका की नीति-निर्देषिका आजादी के बाद नहीं बनी है। उसका आधार हमारे देष के प्राचीन काल से चले आ रहे परम्परा और कानून रहे हैं। समय-समय पर संषोधन की आवष्यकता थी, परन्तु वास्तव में ऐसा हो नहीं सका। वर्तमान न्ययायपालिका में भी जाति की परिभाषा इन्डोगेमस वर्ग के सिंद्धात के आधार पर बनाई गई है, जोकि प्राचीन काल व मघ्यकाल में पंडितों, शास्त्रियों, हिन्दु कानून और समाज में चल रही अन्यान्य परम्पराओं के आधार पर गढ़ी गई थी।
व्यवस्था में खोट
किसी भी मुद्दे पर जब हाई और सुप्रीम कोर्ट सरकार से अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति या फिर अन्य पिछड़ा वर्ग की वास्तविक संख्या के बारे में जानकारी तलब करता है तो उसके पीछे न्यायपालिका की यह अवधारणा रहती है कि इन वर्गों की एक इन्डोगेमस यूनिट के रुप में हमारे समाज में स्थिति साफ है और उसकी गणना आसानी से की जा सकती है। देश के राजनीतिज्ञ, समाजशास्त्री एवं तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग एक तरफ तो वैयक्तिक स्वतंत्रता की बात करते हैं तो दूसरी तरफ जाति और जनजाति पर आधारित आरक्षण की भी बात करते हैं। हमारे देश्ा की व्यवस्था में विरोधाभास यही है। दानों स्थिति विवाह की स्वतंत्रता को बाधित करने वाले हैं। इससे जातिवाद को भी बढ़ावा मिलता है। साथ ही कई तरह की सामाजिक कुरीतियाँ भी इसके कारण पनपती हैं।
अक्सर देश के राजनीतिज्ञ, समाजषास्त्री एवं तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग यह तर्क देते हैं कि वे जाति में सिर्फ राजनीति को देखते हैं। इसलिए इसमें कोई बुराई नहीं है, पर उनके विचारों, कार्यकलापों और अवसरवादिता वाली मानसिकता से एक आम इंसान कई तरह के संवैधानिक अधिकारों से वंचित हो जाता है। लिहाजा इन पहूलओं पर विचार करते हुए शीघ्रताषीघ्र कुछ सकारात्मक कदम उठाने की जरुरत है।
लेखक परिचय-
श्री सतीष सिंह वर्तमान में स्टेट बैंक समूह में एक अधिकारी के रुप में दिल्ली में कार्यरत हैं और विगत दो वर्षों से स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। भारतीय जनसंचार संस्थान से हिन्दी पत्रकारिता में डिप्लोमा करने के बाद 1995 से जून 2000 तक मुख्यधारा की पत्रकारिता में इनकी सक्रिय भागीदारी रही है। श्री सिंह से मोबाईल संख्या 09650182778 के जरिये संपर्क किया जा सकता है।
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