'निजता का अधिकार' से जुड़े कई सवाल

इसी विषय के तारतम्य में कुछ दिनों पहले केंद्रीय सूचना आयुक्त ने भी कहा था कि आयकर का वैयक्तिक रिकॉर्ड भी सूचना के अधिकार के तहत माँगा जा सकता है। आयुक्त ने अपने वक्तव्य में कहा था कि यह किसी की निजता पर हमला नहीं है। इतना ही नहीं इससे कर वंचना रोकने में भी मदद मिलेगी। आयुक्त ने यह भी कहा था कि संसद ने निजता के अधिकार को संहिताबद्व नहीं किया है और निजता का मामला सांस्कृतिक रुप से परिभाषित मुद्वा है।
इस खबर से अलग हटकर अगर हम मंथन करें तो पायेंगे कि धीरे -धीरे हम अपनी निजता को खोते जा रहे हैं। कभी राष्ट्रीय सुरक्षा को इसका कारण बताया जाता है तो कभी भष्ट्राचार को कम करने की दुहाई देकर इस कार्य को अमलीजामा पहनाया जाता है।
आज बाजार की ताकत हमारे घर सहित, हमारे निजी पलों में भी सेंघ लगा रहा है और हम चाहते हुए भी उसका विरोध नहीं कर पा रहे हैं। आपकी मोबाईल संख्या, आपका जन्मदिन, आपके बच्चों का नाम और बैंक में चल रहे खाताओं की संख्यायों का विवरण जाने कब आपके पास से फिसल करके बाजार में चला जाता है, आपको इसका पता भी नहीं चल पाता है।
मोबाईल का नया सिम कार्ड लेने के साथ ही आपके निजी पल आपके अपने नहीं रह जाते हैं। इसी तरह आपके इंटरनेट अकाउंट में दोस्तों के बजाय आपके अनजान दोस्तों का मेल ज्यादा आता है। तुर्रा यह है कि सभी आपको फायदा पहुँचाने की बात करते हैं। सूचना के अधिकार ने भी कुछ मामलों में व्यक्ति की निजता पर हमला किया है। यघपि सूचना के अधिकार के फायदे असीमित हैं। इसलिए किसी का ध्यान अभी तक इसके इस नकारात्मक पहलू की तरफ नहीं गया है।
पर यहाँ यह सवाल उठता है कि क्या निजी बैंकिग लेन-देन को सार्वजनिक किया जाना चाहिए? यह क्या हमारी निजता पर हमला नहीं होगा? अगर आयकर विभाग को किसी पर शक है तो वह अपने स्तर पर उसकी जाँच करवा सकता है। पर निजी वित्तीय लेन-देन को सार्वजनिक करने की प्रक्रिया किसी भी प्रकार से समीचीन नहीं हो सकती है।
सूचना के अधिकार के तहत हर किसी को इसके दायरे में लाने के प्रयासों के बीच आजकल हर व्यक्ति के लिए एक यूनिक आइडेंटिटी नबंर जारी करने की चर्चा भी जोरों पर है। जाहिर है इस यूनिक आइडेंटिटी नबंर को जारी करने के दरम्यान कई तरह के निजी सवाल पूछे जायेंगे। फिर भी गृह मंत्रालय ने इसके लिए रोडमैप बना लिया है।
इस योजना के अंतगर्त भारत के हर नागरिक की एक सूची तैयार की जायेगी, जिसमें उस नागरिक का सम्पूर्ण विवरण दर्ज होगा। इस क्रम में जन्मजात बच्चे तक का विवरण रहेगा। यह विवरण जन्म से लेकर मृत्यु तक धतन किया जाता रहेगा। अगर किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जायेगी, तब भी उसके यूनिक आइडेंटिटी नबंर को नष्ट नहीं किया जायेगा। इस परियोजना के तहत यूनिक आइडेंटिटी नबंर को सिर्फ निष्क्रिय करने का प्रावधान है। इस यूनिक आइडेंटिटी नबंर की यह भी विषेषता है कि इसकी दोबारा पुनरावृति सौ से दो सौ सालों तक नहीं हो पायेगी।
इस तरह की जानकारी राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर में दर्ज रहेंगे। कहने के लिए यूनिक आइडेंटिटी नबंर के पंजीयन के लिए किसी के ऊपर कोई दवाब नहीं डाला जायेगा। पर हकीकत में स्थिति है ठीक इसके उलट। इस रजिस्टर में पंजीयन नागरिक के स्वविवेक पर निर्भर नहीं होगा, क्योंकि जिसका नाम इस रजिस्टर में नहीं होगा वह किसी भी प्रकार की सरकारी और गैर-सरकारी सुविधा पाने से वंचित रहेगा।
इस तरह से कहा जा सकता है कि किसी भी सूरत में रजिस्टर में नाम दर्ज करवाने से कोई भी भारतीय इंकार नहीं कर सकता है। ज्ञातव्य है कि रजिस्टर में पंजीयन करवाने वाला पंजीयक सरकारी नौकर भी हो सकता है और गैरसरकारी भी, क्योंकि सरकार इस कार्य को निजी संस्थानों से भी करवा सकती है।
इस कवायद के पीछे सरकार की यह सोच है कि सारे बिखरे हुए सूचनाओं को एक जगह इकठ्ठा किया जाये, ताकि अलग-अलग सूचनाओं के लिए किसी भी व्यक्ति को अलग-अलग कार्यालयों और विभागों में न जाना पड़े। सरकार का यह भी मानना है कि इस यूनिक आइडेंटिटी नंबर से गरीब व्यक्ति की सभी तरह की सुविधाओं तक पहुँच हो जायेगी। इस संदर्भ में उलटबांसी यह है कि सरकार की इस कोशिश में एक आम नागरिक के अधिकारों का क्या होगा?
अगर सबकुछ सार्वजनिक होगा तो व्यक्ति की व्यक्तिगत जानकारियाँ भी सार्वजनिक होगी। इस स्थिति का फायदा कोई भी उठा सकता है। क्योंकि हमारे समाज में इतनी भी समरसता नहीं है कि सभी मिलजुलकर सौह्यद्र के माहौल में रह सकें। सभी अपनी और अपने परिवार की सभी बातों का खुलासा सार्वजनिक रुप से कभी भी नहीं करना चाहेगें।
हमारे देष में 21वीं सदी आने के बावजूद भी हालत मध्यकाल जैसी है। अभी भी आपसी दुष्मनी के कारण हमारे देष में प्रतिदिन सैकड़ों इंसान मौत कीे आगोष में जा रहे हैं। दरअसल भारत में इंसानी फितरत इस कदर गंदी हो गई है कि उसका इंसानियत से कोई वास्ता रहा ही नहीं है।
लिहाजा सरकार का यह कदम सुरक्षा, गोपनीयता और व्यक्ति की निजता के ठीक विपरीत है। इसके फायदे हो सकते हैं। पर ये फायदे पाक-साफ नहीं हैं। इसकी कुछ खामियाँ भी हैं, किंतु हम मदहोष हैं। अपोलो अस्तपताल के प्रबंधन का कहना है कि हमारे देष में प्रतिदिन बहुत सारे लोग सड़क दुर्घटना के शिकार होकर मर जाते हैं। इस यूनिक आइडेंटिटी नंबर की सहायता से बहुत सारे लोगों को बचाया जा सकता है।
पर ऐसा वास्तव में हमारे देष में नहीं हो सकता है। हमारे सिस्टम के पेंच इतने ढीले हैं कि दुर्घटना ग्रस्त व्यक्ति के अस्तपताल में दाखिल करने से पहले ही उसकी मौत हो जाती है। दरअसल थाने में प्रथम सूचना रपट दर्ज करवाने के बाद ही हमारे डाॅक्टर हरकत में आते हैं।
चंडीगढ़ में किस तरह से एक युवा की मौत सिर्फ प्रधानमंत्री के काफिले के कारण हुई थी, यह वाक्या आज भी हर किसी को याद होगा। भारत के बाबत यह कटु सत्य है कि इस यूनिक आइडेंटिटी नंबर के बावजूद भी हमारी व्यवस्था में कोई बदलाव नहीं आ सकता है। भारत से भष्ट्राचार खत्म नहीं होने वाला है। गरीब आदमी की स्थिति लगातार दयनीय होनी ही है।
चाहे डी एन ए बैंक बनाया जाये या यूनिक आइडेंटिटी नबंर के जरिये सभी नागरिकों पर नजर रखा जाये या फिर उसकी निजता को गिरवी रखा जाये, इससे कम-से-कम आम आदमी का भला तो नहीं हो सकता है। आतंकवाद और अपराधियों पर कितना नियंत्रण होगा यह मुद्वा भी सवालों के दायरे में है। हालीवुड की फिल्मों की तरह या पष्चिमी देषों की तरह हम वहाँ की सभी चीजों को हुबहू भारतीय जमीन पर नहीं उतार सकते हैं।
सूचना के अधिकार के तहत सूचना जरुर उपलब्ध करवायी जाये। साथ ही उसको पारदर्षी भी रखा जाये, पर इसके साथ इस तरह के कार्य को साकार करने के क्रम में इसका भी ध्यान रखा जाये कि किसी की निजता इस कार्य को करते हुए प्रभावित न हो।
इस मामले में यूनिक आइडेंटिटी नबंर की स्कीम लागू होने से आम आदमी की निजता कुछ ज्यादा ही खतरे में आ सकती है। अस्तु जरुरत इस बात की है कि सरकार अपने वादों को पूरा करते हुए नागरिकों की निजता के बीच सामंजस्य बना कर चले।
संसद को भी चाहिए कि वह निजता के अधिकार को संहिताबद्व करे और साथ में उसे पारदर्षी तरीके से परिभाषित भी करे। ताकि आम नागरिकों की निजता निजी बना रह सके और कोई गैरकानूनी या अवैधानिक तरीके से दूसरे की निजता पर हमला नहीं कर सके। कुछ तो नागरिकों का अपना रहे। हर मामले में सरकार का हस्तक्षेप कदापि उचित नहीं है। भारत में लोकषाही है न की तानाषाही।
लेखक परिचय-
श्री सतीष सिंह वर्तमान में स्टेट बैंक समूह में एक अधिकारी के रुप में दिल्ली में कार्यरत हैं और विगत दो वर्षों से स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। 1995 से जून 2000 तक मुख्यधारा की पत्रकारिता में भी इनकी सक्रिय भागीदारी रही है। श्री सिंह दैनिक हिन्दुस्तान, हिन्दुस्तान टाइम्स, दैनिक जागरण इत्यादि अख़बारों के लिए काम कर चुके हैं।
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