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संघ परिवार का 'लविंग जेहाद'

Marriage
यह बात तो माननी पड़ेगी कि संघ परिवार का 'थिंक टैंक' नए-नए मिथक गढ़ने में माहिर है। खासतौर से मुसलमानों के बारे में संघ परिवार ऐसे-ऐसे मिथक गढ़ता है कि कभी हंसी आती तो कभी संघ परिवार पर तरस आता है। राममंदिर के आंदोलन को उसने 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' की संज्ञा देकर अपने गुनाहों पर परदा डालने की कोशिश की। आतंकवाद के दौर में संघ परिवार ने यह कहना शुरु किया कि 'यह सही है कि सभी मुसलमान आतंकवादी नहीं हैं, लेकिन प्रत्येक आतंकवादी मुसलमान ही क्यों है।' लेकिन जब मालेगांव से लेकर मडगांव तक के बम धमाकों में हिन्दुवादी संगठनों की संलिप्ता सामने आयी तो संघ परिवार को सांप सूंघ गया। बहुत पहले से संघ परिवार ने 'लविंग जेहाद' का मिथक गढ़ रखा है। शुरु में तो यही पता नहीं चल पाया कि यह 'लविंग जेहाद' बला क्या है।

धीरे-धीरे पता चला कि संघ परिवार ने एक सुनियोजित षडयंत्र के तहत यह अफवाह फैलाई कि मुस्लिम लड़के अपनी पहचान छिपाकर भोली और मासूम हिन्दू लड़कियों को अपने प्रेम जाल में फंसाकर उनसे शादी करते हैं और बाद में उनका धर्म-परिवर्तन कराते हैं। यहां तक झूठ बोला गया कि हिन्दू लड़कियों को आतंकवादी कार्यवाई में हिस्सा लेने के लिए तैयार किया जाता है। ऐसा लगता है कि संघ परिवार को यही नहीं पता कि यह इक्कसवीं सदी चल रही है। इस सदी में वह सब कुछ हो रहा है, जिसकी कल्पना नहीं की जा सकती थी। आज की तारीख में भारत में मल्टीनेशनल कम्पनियों की बाढ़ आयी हुई है। इन कम्पनियों में हिन्दु और मुस्लिम लड़कियां और लड़के कंधे से कंधा मिलाकर काम कर रहे हैं। सह शिक्षा ले रहे हैं। साथ-साथ कोचिंग कर रहे हैं। इस बीच अन्तरधार्मिक, अन्तरजातीय और एक गोत्र के होते हुए भी प्रेम होना अस्वाभाविक नहीं है।

प्रेम होगा तो शादियां भी होंगी। समाज और परिवार से बगावत करके भी होंगी। अब कोई हिन्दु लड़की किसी मुस्लिम लड़के से प्रेम और शादी कर लेती हैं तो संघ परिवार 'लविंग जेहाद' का राग अलापना शुरु कर देता है। जबकि सच यह है कि मुस्लिम लड़कियां भी हिन्दु लड़कों से अच्छी खासी तादाद में शादियां कर रही हैं। इसे संघ परिवार क्या नाम देना चाहेगा? शायद इसमें भी संघ परिवार यह कहना चाहेगा कि मुस्लिम लड़कियां हिन्दू लड़के का भी धर्म-परिवर्तन कराकर 'लविंग जेहाद' को अन्जाम दे रही हैं। मेरठ के एक गैर सरकारी संगठन ने उन हिन्दू और मुस्लिम लड़कियों से बातचीत की थी, जो विपरीत धर्म के लड़कों से प्रेम करती थीं। उस बातचीत में यह निकलकर आया था कि वे लड़के का धर्म पहले से जानती थीं, लेकिन दिल के हाथों मजबूर थीं।

लड़के और लड़की की जिद के चलते अब तो परिवार की रजामंदी से भी अन्तरधार्मिक शादियां हो रही हैं। कुछ साल पहले जब मैं अपने छोटे भाई की शादी के लिए शादी कार्ड लेने बाजार गया तो सेम्पल के तौर पर जो कार्ड दुकानदार ने मुझे दिखाए थे, उनमें एक कार्ड अन्तरधार्मिक शादी का कार्ड भी था। उस दिन मेरा यह मिथक टूटा था कि अन्तरधार्मिक शादियां केवल समाज और परिवार से बगावत करके की सम्भव हो सकती हैं। मेरे एक रिश्तेदार के लड़के का स्कूल के जमाने में ही एक हिन्दू लड़की से अफेयर हो गया था। मेरे रिश्तेदार बहुत परेशान हो गए थे। लेकिन वह इस बात से आशवस्त थे कि किशोर उम्र की प्यार की खुमारी वक्त के साथ खुद ही दूर हो जाएगी। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। लड़के ने दिल्ली में एक मल्टीनेशनल कम्पनी ज्वायन कर ली। लड़की अपनी एजुकेशन पूरी करके घर में रही। लेकिन दोनों का प्यार कम नहीं हुआ। दोनों ही ने कहीं और शादी करने से साफ इनकार कर दिया। दोनों परिवारों ने आपसी रजामंदी से दोनों के कोई गलत कदम उठाने से पहले दोनों को शादी की रजामंदी दे दी। अब इसे 'लविंग जेहाद' कहें या यह कहें कि 'जोड़ियां स्वर्ग में तय होती हैं।' यह भी सवाल है कि जब एक मुस्लिम लड़की एक हिन्दू लड़के से शादी करले तो उसे क्या कहा जाए? क्या उसे मुसलमान 'धर्मयुद्ध' कहना शुरु कर दें ?

सच्चाई यह है कि 90 के दशक के बाद से उदारीकरण के दौर में बहुत खुलापन आया है। मीडिया, खासतौर से टेलीविजन और फिल्मों ने युवाओं पर गहरा असर डाला है। मल्टीनेशनल कम्पनियों ने युवाओं को टारगेट करके व्यापारिक नीतियां बनायीं और उन पर मीडिया के जरिए अमल किया। परिवार के बुजूर्ग रुढ़ियों को पकड़े बैठे रहे जबकि मीडिया ने अपने स्वार्थ के चलते युवाओं को ऐसी राह दिखा दी, जिसने न जानें कितने युवाओं की बलि ले ली। अन्तरधार्मिक, अन्तरजातीय तथा समान गोत्र में शादियां हुईं, जिनके चलते 'ऑनर किलिंग' सिलसिला चल पड़ा।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश और हरियाणा 'ऑनर किलिंग' को लेकर राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय चर्चा में हैं। संघ परिवार ने 'लविंग जेहाद' जैसे मिथक गढ़ दिए। याद रखिए संकीर्णता और आधुनिकता एक साथ नहीं चल सकतीं। अब वह जमाना गया, जब लड़कियों को परिवार वाले किसी भी खूंटे से बांध देते थे। लड़कियों ने शिक्षा ली है तो उन्हें अपने अधिकार भी पता चले हैं। परिवर्तन की इस आंधी को युवाओं की जान लेकर या लविंग जेहाद का नाम देकर नहीं रोका जा सकता है। वक्त बदल रहा है। सभी को वक्त के साथ बदलना ही पड़ेगा, संघ परिवार को भी।

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