कितने बहाने आते हैं बड़ी झील को

भोपाली गपबाजी में झील की रंगत
असल में भोपाल की बतोलेबाजी में इस झील का भी बड़ा हिस्सा रहा है। भोपाली गपबाजी में झील की रंगत कई बार झलकती है। वैसे भी कहते हैं कि परमार वंश के राजा भोज का चर्म रोग तो इसमें एक बार नहाकर ही ठीक हो गया था. आपको याद ही होगा कि जब राजा भोज को चर्मरोग हुआ था तो कैसे सारे कामकाज ठप पड़ गए थे और पूरी रियासत का एकमात्र काम नए-नए वैद्यों को राजा की तीमारदारी में लगाना रह गया गया था। लेकिन हर कहानी की तरह हमारी कहानी के राजा की बीमार भी वैद्यों के सहारे न तो ठीक होनी थी और न हुई। हर बीमारी का इलाज चूंकि महात्माओं को ही पता होता है। सो राजा भोज को भी एक महात्मा ने इलाज बताया। इलाज था, राजा किसी ऐसी जगह नहाए जहां 365 नाले आकर मिलते हों, तो उनका रोग ठीक हो जाएगा।
अब पता नहीं महात्मा जी ने जान छुड़ाने के लिए यह उपाय बताया था, या सचमुच उन्होंने साल के दिनों से मिलाकर ये आंकड़ा बताया। जो भी हो राजा को रोग से छुटकारा दिलाना ही था, सो गौंड कमांडर कल्याण सिंह ने बेतवा नदी के पास झील का निर्माण शुरू कराया, इसमें आसपास की सभी बहती, सूखी और गुमनाम नदियों को मिलाया गया। कई नालों का मुंह झील की ओर मोड़ा गया और 365 की सख्या पूरी होते-होते यह रंग बदलने वाली झील तैयार हो गई। आप जानते ही हैं कि झील की रंगत कभी नीली होती है, तो कभी हरी हो जाती है और कभी यह भूरे रंग का मुलममा ओढ़ लेती है। 31 वर्ग किलोमीटर में फैली इस झील के बीच में एक टापू पर बाजार बसाया गया था, जो अब मंडीदीप हो गया है। बाद में इसके आसपास आबादी बसती गई, तो झील ने खुद को समेटना शुरू कर दिया, ताकि लोगों को रहने की जगह मिलती जाए।
फिर बड़ी झील
कमला पार्क से बड़ी झील की ओर जाओ, दस बार जाओ। हर बार बड़ी झील हमारी शकल भूल जाती है, तो या बड़ी झील बूढ़ी हो गई है और इसकी आंखों में मोतियाबिंद उतर आया है। बड़ी झील से पूछो तो वह उम्र नहीं बताती। इस गफलत में न रहिए कि सबेरे-सबेरे चलने वाली हवा इसकी उम्र पर झुर्रियाँ दे जाती है, तो यह उम्रदराज हो गई- लहरों की शक्ल में। उम्रदराज तो अपनी बड़ी आपा भी हैं और वे कैसे गा-गाकर बताती हैं कि "मेरी उमर हो गई बचपन पार, लाड़ो याह दो छोड़ घर चार.."।
बड़ी झील ने खुद को राजा भोज के भोज कुंड से जोड़कर अपनी उम्र में हजार साल यूं ही कम कर लिए। असल में राजा भोज का जो भोज कुंड है वह तो भीमबेठिका से लेकर औबेदुल्लागंज और बरखेड़ी से लेकर मंडीदीप तक के पहाड़ों तक फैला हुआ है। आप जानते ही हैं कि इन कस्बों के बीच की दूरी उतनी ही है जो राजा भोज के कुष्ठ रोग को ठीक करने के लिए बनवाए गए कुंड की थी- यानी 16.8 किलोमीटर। असल में राजा भोज को जो कुष्ठ रोग हुआ था वह 12 नदियों और 99 नालों के पानी से बनने वाले कुंड में नहाने के बाद ठीक होना था, जो आपकी उस संन्यासी की कहानी से मेल नहीं खाता, जिसमें ३६५ नाले हैं, लेकिन है सच यही कि राजा भोज का दायां हाथ सेनापति कल्याण सिंह 12 नदियों और 99 नालों का पानी जुटाने की टोह में था। यह वही कल्याण सिंह है, जिसे आप कालिया कहते हैं और जिसकी बनाई एक नहर को कालिया की सोत कहा जाता रहा। एक अरसे तक।
बारह नदियों का भोज कुंड
तो मसला कुछ यूं है मियां कि कल्याण सिंह ने 11 नदियां तो खोज लीं- भीमबेठिका से लेकर औबेदुल्लागंज के बीच, लेकिन जिंसी चौराहे पर, जो तब का औबेदुल्लागंज नाका हुआ करता था, बैठा वह सोच रहा था कि राजा की बीमारी ठीक कैसे हो। तब एक दरवेश ने उसे बताया कि अगर बड़ी झील से एक नाला बनाकर भोज कुंड में मिला दिया जाए तो भोज कुंड पूरा यानी 12 नदियों का हो जाएगा और 99 नाले लाना तो कोई बड़ा काम है नहीं। सो बनी कलिया की सोत, जिसे भदभदा से होते हुए भोज कुंड से मिलाया गया।
ये तो हुई हिस्ट्री। अब सुनिए असल बात। बड़ी झील का पानी था पुराना। यह आज से हजार साल पहले की बात है और तब बड़ी झील का पानी एक हजार साल का हुआ करता था। मगरमचछ से लेकर तमाम तरह के घड़ियाल यहां हुआ करते थे और वे इस सोच से बेजार थे कि उनका एक हिस्सा, यानी पानी, किसी राजा की बीमारी ठीक करने के लिए किसी दड़बेनुमा कुंड में मिलाया जा रहा है। उसी वत पानी ने जो बगावत की, वो है अपनी छोटी झील। बगावत का कुछ सिरा मोतिया तालाब से लेकर नूरमहल तक बिखरा और यह नाइंसाफी इतिहास में दर्ज हो गई। जिसे न कभी लिखा जा सका और न महसूस किया जा सका।
पानी का रेला
हालांकि बाद में कुंड का पानी बांध तोड़कर बाहर निकला। तब नवाब साहब के कोई विदेशी दोस्त भोज कुंड में नाव चला रहे थे। लहरों ने गुस्सा दिखाया और वह विदेशी मेहमान नाव समेत कुंड की चकरदार गहराइयों में समा गया। नवाब सहाब ने घोषणा कि किसी भी तरह उसकी लाश निकाली जाए और तब हजार फीट और तीन सौ फीट के बांधों को तोड़ा गया। इलाके में बिखरे अलंगे अपनी कहानी आप हैं। बांध टूटा तो पानी का एक रेला भी निकला, जिसने अपनी भीतर छुपाई हुई वनस्पति को भीमबेठिका से लेकर औबेदुल्लागंज तक बिखेर दिया। अब यह सैकड़ों साल पानी में भीगती रही वनस्पति हकीमों के काम आती है।
बात यकीनन सच्ची है। जिन्हें शकसुबहा रहा उन्होंने कई किस्म से ताकीद भी की। आपको विश्वास न हो तो झील के बोट लब वाले हिस्से से तैरना शुरू कीजिए। ज्यादा नहीं बस गौहर महल के सामने जो परी घाट है न, जहां से बाबे सिकंदरी दिखाई देता है, वहां तक आइए। अगर आप अचछे तैराक हैं, तो आपको कुल जमा ४५ मिनिट लगेंगे- अगस्त की हवाओं में। उस पर भी यह जून का झुलसाऊ गर्मी का दौर हुआ तो आप 35 मिनिट में परी घाट पर होंगे। यहां थोड़ी-सी तकलीफ होगी। बस आपको 1819 के उस दौर से गुजरना होगा, जब कुदसिया बेगम ने गौहर महल को बनवाने का जिमा लिया था। बाबे सिकंदरी, जो 1840 से लगातार बड़ी झील की तमतमाई लहरों को किनारों से टकराता देख रहा है, उससे भी पूछ लीजिए।
बड़ी झील की तकलीफ
पहली बार बड़ी झील ने अपनी तकलीफ जाहिर की थी, बाबे सिकंदरी से। इस जनाना दरवाजे ने अपने पड़ोसी शौकत महल और जरा-सी दूरी पर खड़े बुतनुमा सदर को भी इस हकीकत से अनजान रखा है। हकीकत यह कि बड़ी झील का घटता पानी उसकी खुशी है, योंकि बड़ी झील जब-जब अपने राजाई रोग को ठीक करने की कीमियागीरी पर रोई है, उसका पानी बढ़ा है- यह खारा पानी था, जो आंसुओं से बना था और आधे भोपाल की पयास में पानी का लौंदा बनकर उतरी बड़ी झील सूखे के दिनों में सबसे ज्यादा खुश होती है- उन दिनों आंखें सूखी होती हैं।
यकीन नहीं होगा, लेकिन है सौ फीसदी सच कि अपने भोजकुंडीय इस्तेमाल पर आंसू बहाती बड़ी झील इन दिनों भरी-भरी सी है- जरा चखिए इसका पानी। इसमें आंसुओं का नमक तो नहीं।
[सचिन श्रीवास्तव पत्रकार तथा ब्लागर हैं और संस्कृति, शहर व आम लोगों के बारे में अपने खास अंदाज में लिखते हैं।]












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