अब कहां चेहरा छुपाएंगे लालू...

Lalu Prasad Yadav
बात 23 अप्रैल की है। बिहार के 12 सीटों पर दूसरे चरण के लोस चुनाव के घंटे भर बाद ही राजद और लोजपा को लगने लगा था कि उनकी स्थिति ठीक नहीं है। लोजपा सुप्रीमो का भाग्य ईवीएम में बंद हो चुका था। मतदान के थोड़ी देर बाद ही रामविलास पासवान राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद के घर पहुंचे। लालू ने पत्रकारों से बातचीत करते हुए कहा कि यदि रामविलास पासवान हाजीपुर से दो लाख से कम वोट से जीते तो हम लोग अपना चेहरा नहीं दिखायेंगे।

असर कर गया 'विरोध का जिन्न'

यह खबर अखबार व कई टेलीविजन चैनलों पर आयी। 16 मई को ईवीएम में से राजद-लोजपा के विरोध में 'जिन्न' निकलना शुरू हुआ। लोजपा का सूपड़ा बिहार से साफ हो गया। वह शून्य पर आउट हो गयी। पिछले चुनाव में बिहार में राजद को 22 सीटें मिली थीं। इस चुनाव में लालू प्रसाद पाटलिपुत्रा से चुनाव हार गये। यह संयोग ही है कि वे छपरा से चुनाव जीत गये। लालू के सारे दिग्गज मैदान में ढेर हो गये। राजद के खाते में सिर्फ चार सीटें आयीं। लालू हार के दर्द से कराह उठे। उन्होंने मीडिया के लिए दरवाजे बंद कर दिये।

इस बात की खबर जब चैनलों पर आने लगी तो लालू ने कहा कि कांग्रेस के साथ मिलकर नहीं लड़ने से करारी हार का सामना करना पड़ा है। पासवान ने भी कुछ इसी तरह का राग अलापा और दिल्ली के लिए रवाना हो गए। लालू की छटपटाहट देखने लायक थी। यह जगजाहिर है कि लालू सत्ता सुख के बिना एक पल भी नहीं रह सकते हैं। लालू के उस बयान को सभी भूल गये कि उन्होंने चेहरा न दिखाने की बात कही थी। इस पर किसी ने सवाल तक नहीं किया।

बदलते बयान

लालू-पासवान न सिर्फ अपना चेहरा दिखाएंगे बल्कि राजनीति भी करेंगे। फिर ये नेता इस तरह के बेतुका बयान क्यों देते हैं? क्या सबसे ज्यादा मूर्ख इन्हें जनता ही नजर आती है? यह सोचने वाली बात है कि जिस तरह ये नेता समय के अनुसार अपना बयान बदल देते हैं। ऎसे में जनता कैसे विश्वास करे कि ये कौन-सा बयान सही दे रहे और कौन-सा गलत। नतीजे सामने आने के बाद भी लालू प्रसाद इस बात के लिए बेचैन थे कि यूपीए में कैसे शामिल हों। कांग्रेस के कई नेता बयान दे चुके थे कि उन्हें किसी के समर्थन कि जरूरत नहीं है और वे 'असली' दोस्तों पर ही भरोसा करेंगे।

लालू-रामविलास ने चुनाव के पहले बिहार में कांग्रेस की झोली में सिर्फ तीन सीटें डाली थीं। इससे बौखलायी कांग्रेस ने बिहार की सभी सीटों पर चुनाव लड़ने का फैसला किया था। इसका नुकसान लालू-पासवान को उठाना पड़ा। बिहार के यादवों ने ही लालू प्रसाद को नकार दिया। उनके खुद के अलावा जो तीन सीटें मिली हैं। तीनों पर राजपूत को जीत मिली है। लालू हर हाल में यूपीए के साथ बने रहने की बात दुहराते रहे। आखिरकार न तो कांग्रेस ने उन्हें यूपीए में शामिल किया और न ही मनचाही कुर्सी हासिल करने का उनका सपना ही पूरा हो सका।

[रविकांत प्रसाद पत्रकार हैं और ठेठ राजनीतिक मुद्दों पर लिखते हैं।]

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