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उत्तरायणी मेला:कुमाऊं-गढ़वाल का संगम

Uttaranchal
रामगंगा के किनारे बसा बरेली शहर यूँ तो कई चीजों के लिये प्रसिद्ध है लेकिन उत्तरायणी मेला यहाँ का मुख्य आकर्षण है. प्रतिवर्ष 14-15 जनवरी को मकर संक्रान्ति के अवसर पर, उत्तरायणी मेला बरेली में आयोजित किया जाता है. कहा जाता है कि मकर संक्रान्ति पर्व पर सूर्य दक्षिणायण से उत्तरायण मे प्रवेश करते है. इस पर्व को उत्तराँचल में धूमधाम से मनाया जाता है.यही से उत्तरायणी मेले का आरम्भ हुआ है. पर्व को उत्साहपूर्वक मनाने तथा कुमाऊँ-गढ़वाल की संस्कृति का प्रचार-प्रसार करने के लिये उत्तरायणी मेला समिति का गठन किया गया है. यही समिति हर साल उत्तरायणी मेले का आयोजन करती है.

सड़कों पर निकलती झांकियां

इस आयोजन में कुमाऊँ-गढ़वाल के बड़े-बड़े नेता-अभिनेता भी सहयोग प्रदान करते हैं.यही नही कुमाऊँ-गढ़वाल के लोग जो कि बरेली में रह रहे हैं,इस आयोजन में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेते हैं. उत्तरायणी मेले का मुख्य आकर्षण यहाँ दो दिन तक लगातार चलने वाला साँस्कृतिक कार्यक्रम है. उत्तरायणी मेला कुमाऊँ-गढ़वाल का एक ऐसा संगम है जहाँ दोनों ही मंडलों कि विभिन्न लोक कलाओं रूपी नदियाँ देखने को मिलती हैं. कुमाऊँ-गढ़वाल मंडल के विभिन्न शहरों से आये कलाकार यहाँ साँस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत करते हैं.

उत्तरायणी मेले का आरम्भ 14 जनवरी को शहर में शोभा यात्रा निकालकर किया जाता है. विभिन्न कलाकार सड़कों पर नृत्य करते हुए चलते हैं. इन झाँकियों को देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे पूरा उत्तराँचल बरेली में समाहित हो गया है. शहर की शोभा देखते ही बनती है. शोभायात्रा मेला परिसर में पहुँचकर समाप्त होती है. उसके पश्चात साँस्कृतिक कार्यक्रमों का सिलसिला शुरु हो जाता है.

मिस्टर और मिस उत्तरायणी

साँस्कृतिक कार्यक्रमों के अलावा मेले में कई प्रतियोगितायें भी आयोजित की जाती हैं. इनमें से मिस्टर उत्तरायणी और मिस उत्तरायणी प्रमुख है. इस प्रतियोगिता में कुमाऊँ-गढ़वाल के परिधानों तथा भाषा का विशेष ध्यान रखा जाता है. इस मेले की खासियत यह है कि यहाँ पर कुमाऊँ-गढ़वाल मंडल में मिलने वाली सामग्रियों की दुकानें लगायी जाती हैं. अत: अपने मंडल से दूर रह रहे लोगों के लिये यह सुनहरा मौका होता है जब वो अपने प्रदेश में मिलने वाली वस्तुयें खरीद सकें.

जब उत्तरायणी समिति का गठन हुआ था और मेले का शुभारम्भ किया गया तब उन सदस्यों ने सोचा भी नही होगा कि उनका यह प्रयास लोगों को इतना पसंद आयेगा. पर कहते हैं न कि"मै तो अकेला ही चला था मंजिल ए गाफ़िल, लोग आते गये कांरवा बनत गया"

खैर संस्कृति कोई भी हो यदि हमारा उद्देश्य साँस्कृतिक धरोहरों को बचाना है तथा उनका प्रचार करना है तो लोगों की सराहना और साथ दोनों ही मिलता है, उत्तरायणी मेला इसका उदाहरण है.

[दीपाली तिवारी ब्लागर हैं और समकालीन मुद्दों पर लिखती हैं।]

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