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School Admission:कर्नाटक में बच्चों के दाखिले पर छिड़ी जंग, क्या है उम्र सीमा विवाद? CM के पास पहुंचे पेरेंट्स

Karnataka School Admission: कर्नाटक में स्कूल दाखिले को लेकर छिड़ा विवाद अब गहराता जा रहा है, क्योंकि हजारों अभिभावक 1 जून की सख्त कट-ऑफ तारीख के खिलाफ एकजुट हो गए हैं। राज्य शिक्षा नीति (SEP) में 1 ग्रेड में प्रवेश के लिए 90 दिनों की रियायत देने की स्पष्ट सिफारिश की गई है, लेकिन सरकार ने अभी तक इसे जमीन पर लागू नहीं किया है।

वर्तमान नियमों के अनुसार, बच्चे की उम्र 1 जून तक अनिवार्य रूप से 6 वर्ष होनी चाहिए। इस कठोर नियम के कारण वे बच्चे अधर में लटक गए हैं जिनका जन्म इस तारीख के कुछ ही दिन बाद हुआ है। अभिभावकों का तर्क है कि उनके बच्चे यूकेजी (UKG) पास कर चुके हैं और मानसिक रूप से तैयार हैं, फिर भी उन्हें सिर्फ जन्म तारीख के कारण एक पूरा साल दोहराने पर मजबूर किया जा रहा है।

Karnataka School Admission

1 जून की कट-ऑफ, बच्चों के भविष्य पर 'तारीख' का पहरा

वर्तमान में लागू नियम शिक्षा व्यवस्था में एक बड़ी बाधा बन गया है। जिन बच्चों का जन्म जून, जुलाई या अगस्त में हुआ है, उन्हें प्रवेश से वंचित रखा जा रहा है। अभिभावकों के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:

  • जन्म तारीख बनाम योग्यता: बच्चों का मूल्यांकन उनकी संज्ञानात्मक और सामाजिक क्षमता के बजाय कैलेंडर की तारीख से किया जा रहा है।
  • शैक्षणिक नुकसान: यूकेजी की पढ़ाई पूरी कर चुके बच्चों को दोबारा वही कक्षा पढ़ने के लिए कहना उनके सीखने के उत्साह को कम कर सकता है।
  • मानसिक तनाव: सिर्फ कुछ दिनों के अंतर के कारण एक साल का पीछे होना बच्चों और माता-पिता दोनों के लिए तनावपूर्ण है।

मुख्यमंत्री से गुहार, 50 से अधिक अभिभावक पहुंचे CM हाउस

विवाद के समाधान के लिए आज लगभग 50 अभिभावक अपने बच्चों के साथ मुख्यमंत्री से मिलने पहुंचे। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए मुख्यमंत्री ने 5 अभिभावकों के प्रतिनिधिमंडल को चर्चा के लिए आमंत्रित किया।

  • अभिभावकों ने एसईपी (SEP) की सिफारिशों को तुरंत लागू करने की मांग रखी।
  • मुख्यमंत्री ने मामले की समीक्षा करने का भरोसा दिया है और अपने पीए (PA) को इस पर आगे की कार्रवाई के लिए निर्देशित किया है।

SEP रिपोर्ट और आरटीई (RTE) के तर्क

राज्य शिक्षा नीति (SEP) की रिपोर्ट अगस्त 2025 में ही सरकार को सौंपी जा चुकी है। मुख्यमंत्री पहले ही कह चुके हैं कि वे नई शिक्षा नीति (NEP) के स्थान पर राज्य की अपनी नीति लागू करेंगे।

अभिभावकों का सवाल है कि जब रिपोर्ट में 90 दिन की छूट का जिक्र है, तो देरी क्यों हो रही है? कुछ अभिभावकों ने यह भी याद दिलाया कि आरटीई (RTE) एक्ट में भी 60 दिनों के लचीलेपन का प्रावधान है, फिर राज्य स्तर पर इसे और उदार बनाने में क्या अड़चन है?

अन्य राज्यों के बच्चों पर भी संकट का साया

यह नियम न केवल कर्नाटक में जन्मे बच्चों को प्रभावित कर रहा है, बल्कि उन परिवारों के लिए भी चिंता का विषय है जो दूसरे राज्यों से आकर यहां बसे हैं। आंकड़ों के अनुसार, कर्नाटक में पढ़ रहे करीब एक लाख से ज्यादा बाहरी राज्यों के बच्चे भी इस उम्र सीमा के फेर में फंसे हैं। अभिभावकों का कहना है कि यदि सरकार ड्रॉपआउट कम करना चाहती है, तो स्कूल के लिए तैयार बच्चों को रोकना तर्कसंगत नहीं है।

With AI Inputs

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