CBSE Board Exam 2026: फिजिक्स पेपर में असमानता पर कोर्ट पहुंचा मामला, हाईकोर्ट में दायर हुई PIL
CBSE Board Exam 2026: देशभर में आयोजित हो रही बोर्ड परीक्षाओं के बीच एक बड़े विवाद ने दस्तक दी है, जिसने लाखों विद्यार्थियों और उनके अभिभावकों की रातों की नींद उड़ा दी है। मामला अब शिक्षा के गलियारों से निकलकर सीधे अदालत की चौखट तक जा पहुंचा है। इस विवाद की जड़ में प्रश्नपत्रों की असमानता है, जहाँ एक ही विषय के अलग-अलग सेट के बीच कठिनाई के स्तर को लेकर गंभीर सवाल उठाए जा रहे हैं।
शिक्षक प्रशांत किराड द्वारा दायर जनहित याचिका ने परीक्षा प्रणाली की पारदर्शिता पर बहस छेड़ दी है। आरोप है कि कुछ छात्रों को बेहद सरल सवाल मिले, जबकि अन्य को ऐसे कठिन प्रश्नों से जूझना पड़ा जिनका स्तर किसी प्रतियोगी परीक्षा से कम नहीं था। यह स्थिति छात्रों के समान अवसर के अधिकार पर प्रहार करती नजर आ रही है।

अदालत में जनहित याचिका, "असमानता" का आरोप
शिक्षक प्रशांत किराड ने Central Board of Secondary Education (CBSE) के खिलाफ याचिका दायर कर बोर्ड की कार्यप्रणाली को चुनौती दी है। याचिका के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
- असमान कठिनाई स्तर: कुछ छात्रों के लिए पेपर आसान थे, जबकि कुछ सेट में प्रश्न असाधारण रूप से कठिन थे।
- प्रतियोगी परीक्षा जैसा स्तर: दावा किया गया है कि कठिन सेट के प्रश्नों का स्तर स्कूली शिक्षा के बजाय उच्च स्तरीय प्रतियोगी परीक्षाओं जैसा था।
- अंकों पर प्रभाव: छात्र की मेहनत से ज्यादा उसके भाग्य (उसे कौन सा सेट मिला) पर अंकों का निर्भर होना गलत है।
विद्यार्थियों का अनुभव और शिकायतों का अंबार
परीक्षा केंद्रों से बाहर निकले छात्रों की प्रतिक्रियाओं में स्पष्ट अंतर देखा गया। जहां कुछ छात्र अपने सीधे और पाठ्यपुस्तक आधारित पेपर से खुश थे, वहीं अन्य छात्र काफी हताश नजर आए।
एक पीड़ित छात्र ने कहा, "हमने साल भर तैयारी की, लेकिन परीक्षा हॉल में मिले प्रश्न उम्मीद से कहीं ज्यादा पेचीदा थे। जब हमने दूसरे सेट के छात्रों से बात की, तो पता चला कि उनका पेपर काफी सरल था। यह हमारे साथ सरासर नाइंसाफी है।"
जब छात्रों ने सोशल मीडिया और व्यक्तिगत चर्चाओं में प्रश्नों की तुलना की, तो यह विवाद और गहरा गया।
सेट-सिस्टम और संतुलन पर सवाल
नकल रोकने के उद्देश्य से बोर्ड अलग-अलग सेट तैयार करता है, लेकिन इस बार मानकीकरण (Standardization) की प्रक्रिया पर संदेह जताया जा रहा है। याचिका में बोर्ड से कुछ कड़े सवाल पूछे गए हैं:
- प्रश्नपत्रों का स्तर तय करने के लिए किस वैज्ञानिक पद्धति का उपयोग किया गया?
- विभिन्न सेटों के बीच संतुलन सुनिश्चित करने के लिए क्या मापदंड अपनाए गए थे?
ग्रेस मार्क्स और 'नरम मूल्यांकन' की उठती मांग
विवाद के तूल पकड़ने के बाद अभिभावकों और शिक्षकों के एक वर्ग ने समाधान के तौर पर निम्नलिखित विकल्प सुझाए हैं:
- जिन छात्रों को कठिन प्रश्नपत्र मिले, उन्हें ग्रेस मार्क्स (Grace Marks) दिए जाएं।
- कठिन सेट वाले छात्रों के लिए लीनियंट मार्किंग (Lenient Evaluation) अपनाई जाए।
- कुछ विशेष मामलों में दोबारा परीक्षा के विकल्प पर भी विचार हो।
क्या कहता है बोर्ड का बदलता पैटर्न?
पिछले कुछ वर्षों में सीबीएसई ने रटने की प्रवृत्ति को खत्म करने के लिए योग्यता-आधारित (Competency-based) प्रश्नों पर जोर दिया है। शिक्षकों का मानना है कि यद्यपि यह बदलाव सकारात्मक है, लेकिन यह तभी सफल हो सकता है जब सभी छात्रों को मिलने वाले पेपर का 'डिफिकल्टी इंडेक्स' एक समान हो।
सोशल मीडिया पर 'डिजिटल' जंग
एक्स (पूर्व में ट्विटर) और इंस्टाग्राम पर हजारों छात्र अपने अनुभव साझा कर रहे हैं। कई मीम्स और पोस्ट के जरिए बोर्ड से न्याय की गुहार लगाई जा रही है। छात्रों का कहना है कि इस मानसिक तनाव ने उनके आगामी पेपरों की तैयारी को भी प्रभावित किया है। अब सभी की निगाहें अदालत के फैसले और बोर्ड के आधिकारिक स्पष्टीकरण पर टिकी हैं।
With AI Inputs
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