Surya Grahan 2019: 'रिंग ऑफ फॉयर' में बदलेगा आज सूरज, जानिए कहां-कहां दिखेगा 'सूर्यग्रहण'

नई दिल्ली। साल 2019 का दूसरा सूर्यग्रहण आज है, जो कि भारत में दिखाई नहीं देगा, इस ग्रहण के दौरान एक वक्त ऐसा भी आएगा जब सूर्य 'रिंग ऑफ फॉयर' में बदल जाएगा। यह सूर्य ग्रहण पूरे पांच घंटे का होगा जो भारतीय समयानुसार 2 जुलाई की रात लगभग 10 बजकर 25 मिनट से शुरू होगा, इसके बाद 12 बजकर 53 मिनट पर ग्रहण का मध्‍य होगा और रात 3 बजकर 21 मिनट पर ग्रहण समाप्‍त हो जाएगा।

क्या है 'रिंग ऑफ फॉयर'

क्या है 'रिंग ऑफ फॉयर'

जब चंद्रमा सूर्य और पृथ्वी के मध्य में आता है, तब यह पृथ्वी पर आने वाले सूर्य के प्रकाश को रोकता है और सूर्य में अपनी छाया बनाता है। इस खगोलीय घटना को 'सूर्य ग्रहण' कहा जाता है। सूर्यग्रहण एक खगोलीय घटना है और 'Ring Of Fire' ग्रहण तभी होता है, जब चन्द्रमा, सूर्य और पृथ्वी के बीच से गुज़रता है, ये ग्रहण एक चमकती हुई रिंग की तरह दिखाई देता है, जिसे कि नग्न आंखों से नहीं देखना चाहिए।

कहां दिखेगा ये सूर्य ग्रहण

कहां दिखेगा ये सूर्य ग्रहण

भारत में तो भले ही ये नजर नहीं आएगा लेकिन नासा की लाइव स्ट्रीमिंग के जरिए कोई भी इस खगोलीय घटना का साक्षी बन सकता है। यह सूर्य ग्रहण चिली, अर्जेंटीना और दक्षिण पैसिफिक क्षेत्र में करीब 6000 मील तक दिखेगा, लेकिन भारत, पाकिस्तान, अफगानिस्तान और नेपाल जैसे एशियाई देशों में इस सूर्य ग्रहण को नहीं देखा जा सकेगा।

2019 में भी तीन सूर्य ग्रहण

2019 में भी तीन सूर्य ग्रहण

नासा के अनुसार 2019 में भी तीन सूर्य ग्रहण पड़े हैं, 2019 में पहला सूर्य ग्रहण 6 जनवरी को था, दूसरा 2 जुलाई को और तीसरा 26 अगस्त को पड़ेगा।

अमावस्या को लगता है ग्रहण

अमावस्या को लगता है ग्रहण

ग्रहण प्रकृ्ति का एक अद्भुत चमत्कार है, ज्योतिष के दृष्टिकोण से यदि देखा जाए तो अभूतपूर्व अनोखा, विचित्र ज्योतिष ज्ञान, ग्रह और उपग्रहों की गतिविधियां एवं उनका स्वरूप स्पष्ट करता है। यह घटना सदा हमेशा अमावस्या को ही होती है।

क्या है मान्यताएं?

क्या है मान्यताएं?

हमारे ऋषि-मुनियों ने सूर्य ग्रहण लगने के समय भोजन के लिए मना किया है, क्योंकि उनकी मान्यता थी कि ग्रहण के समय में कीटाणु बहुलता से फैल जाते हैं। खाद्य वस्तु, जल आदि में सूक्ष्म जीवाणु एकत्रित होकर उसे दूषित कर देते हैं इसलिए ऋषियों ने पात्रों के कुश डालने को कहा है, ताकि सब कीटाणु कुश में एकत्रित हो जाएं और उन्हें ग्रहण के बाद फेंका जा सके, ग्रहण के बाद स्नान करने का विधान इसलिए बनाया गया ताकि स्नान के दौरान शरीर के अंदर ऊष्मा का प्रवाह बढ़े, भीतर-बाहर के कीटाणु नष्ट हो जाएं और धुल कर बह जाएं।

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