Swarodaya Tantra: कब कौन सा काम शुरू करना होगा शुभ, नाड़ी ज्ञान से होता है तय
लखनऊ। स्वरोदय विज्ञान अपने आप में एक सम्पूर्ण विज्ञान है। स्वरोदय अर्थात नासिका के छिद्रों से ग्रहण किया जाने वाला श्वास जो कि वायु की शक्ल में होता है। विज्ञान अर्थात जॅहा पर किसी विषय की गूढ़तम बातें एंव प्रयोग कहे जाते है।

संसार का प्रत्येक जीव अपनी नासिका के छिद्रों द्वारा सॉंस अर्जन करता है एंव उसका विर्सजन करता है।इसी सांस के द्वारा प्रत्येक जीव के प्राण स्थिर रहते है।
आईये आज हम आपको बताते है कि श्वास देखकर क्या-क्या काम करने चाहिए।ृ
मध्यमा भवति क्रूरा दृष्टा सर्वत्र कर्मसु।
सर्वत्र शुभकार्येषु वामा भवति सिद्धिदा।।
मध्यमा नाड़ी क्रूर है और सभी कार्यो के लिए दुष्ट है बॉयी नाड़ी सभी शुभ कार्यो को पूर्ण करती है।
मध्यमा अर्थात सुषुम्ना जब नाक के दोनों छिद्रों से स्वर चल रहा हो तो प्रत्येक कार्य में विघ्न आते है। बॉई अर्थात इड़ा नाड़ी यानि जब नाक के बॉयें छिद्र से स्वर चल रहा होता है तो उस दौरान प्रारम्भ किया गया प्रत्येक कार्य सफल होता है।
निर्गमे तु शुभा वामा प्रवेशे दक्षिणा शुभा।
चन्द्रः समः सुविज्ञेयो रविस्त विषमः सदा।।
घर से जाते वक्त बॉये स्वर का चलना शुभ होता है और घर वापसी करते समय दाहिना स्वर चलना उत्तम रहता है।
सूर्यनाड़ीप्रवाहेण रौद्रकर्माणि कारयेत्।
सुषुम्नायाः प्रवाहेण भुक्तिमुक्तिफलानि च।।
सूर्य नाड़ी के चलते समय रौद्र कार्य करें। सुषुम्ना नाड़ी भोग और मोक्ष प्राप्त करवाती है।

तिष्ठेत्पूर्वोत्तरे चन्द्रो भनुः पश्चिमदक्षिणे।
दशनाड्याः प्रसारे तु न गच्छेद्याम्यपश्चिमे।।
पूर्व तथा उत्तर दिशा में चन्द्र स्वर, पश्चिम तथा दक्षिण दिशा में सूर्य रहता है।
दाहिना स्वर चलने पर पश्चिम या दक्षिण दिशा की यात्रा नहीं करनी चाहिए।
वामाचार प्रवाहे तु न गच्छेत्पूर्व उत्तरे।
परिपंथि भयं तस्य गतोसौ न निवर्त्तते।।
बॉयें स्वर के चलते समय पूर्व तथा उत्तर दिशा की यात्रा नहीं करनी चाहिए। इस यात्रा के करने से यात्री को शत्रु का भय होता है और कभी-कभी तो यात्री घर वापस भी नहीं आता है।
वामावा दक्षिणे वापि यत्र संक्रमते शिवः।
कृत्वा तात्पादमादौ च यात्रा भवति सिद्धिदा।।
बॉया या दाहिना कोई भी स्वर चल रहा हो और साथ ही सुषुम्ना भी चल रही हो तो मुख्य स्वर की तरफ वाला पॉव आगे बढ़ाकर यात्रा करनी चाहिए। ऐसा करने से सफलता प्राप्त होती है।
तत्वज्ञान {सॉंस के द्वारा}-
मध्ये पृथ्वी ह्मधश्चापाश्चोर्ध्व वहति चानलः।
तिर्यग्वायुप्रवाहश्च नभो वहति सक्रमः।।
तत्वों के अधिकार में होने के कारण तत्व की ही भॉति स्वर भी चलता है।
पृथ्वी तत्व युक्त चलने वाली सॉस मध्य में चलती है। जल तत्व से युक्त होकर चलने वाली श्वांस नीचे को बहती है।
अग्नि तत्व से युक्त हेाकर चलने वाली श्वांस ऊपर की ओर चलती है। वायु तत्व से युक्त होकर चलने वाली श्वांस तिरछी चलती है और आकाश तत्व से युक्त होकर चलने वाली श्वांस दोनों छिद्रों से प्रवाहित होती है।
तत्व निवास-
स्कन्धद्वये स्थितो वाह्रिर्नाभिमूले प्रभंजनः।
जानुदेशे क्षितिस्तोयं पादान्ते मस्तके नभः।।
दोनों कन्धों पर अग्नि तत्व निवास करता है। नाभि में वायु तत्व, घुटनों में पृथ्वी तत्व, पॉवों में जल तत्व और सिर में आकाश तत्व निवास करता है।












Click it and Unblock the Notifications