पंचम स्थान का वक्री 'शुक्र' जातक को बनाता है समलैंगिक

लखनऊ। शुक्र ग्रह भोग विलास, सांसारिक सुख, भौतिक सुख, प्रेम, सौंदर्य, आकर्षण, दांपत्य सुख आदि का प्रतिनिधि ग्रह है। शुक्र जब किसी की कुंडली में शुभ अवस्था में मजबूत होता है तो वह ऐश्वर्यशाली जीवन व्यतीत करता है, लेकिन जब शुक्र वक्री हो जाए तो उस व्यक्ति के लिए जीवन की आनंददायी वस्तुएं नीरस हो जाती हैं।

आइए जानते हैं वक्री शुक्र का जीवन पर क्या प्रभाव पड़ता है....

जातक की कुंडली में शुक्र वक्री होता है...

जातक की कुंडली में शुक्र वक्री होता है...

शुक्र का वक्री होना अच्छा नहीं माना जाता है। यह हर प्रकार से जातक को कष्ट ही देता है। जिस जातक की कुंडली में शुक्र वक्री होता है वे कटुभाषी हो जाते हैं। कई बार सत्य को भी ये लोग इतना अधिक कटुता के साथ बोलते हैं कि सामने वाला व्यक्ति क्रोधित हो जाता है। सत्य बोलना अच्छी बात है लेकिन उस सत्य को बोलने का सही तरीका होता है। वक्री शुक्र वाले जातकों के मन में निराशा की ऐसी भावना जागृत होती है कि उनके लिए परिवार, बच्चे, जीवनसाथी, गृहस्थी और अन्य सुखों के प्रति सोच ही बदल जाती है। ऐसा व्यक्ति कई बार महत्वहीन वस्तुओं को भी अत्यधिक महत्व देने लग जाता है। ऐसी अवस्था में व्यक्ति संकुचित एवं सीमित विचारों वाला हो जाता है और सामाजिक और पारिवारिक जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ लेता है।

शुक्र चूंकि यौन इच्छाओं का भी ग्रह है...

शुक्र चूंकि यौन इच्छाओं का भी ग्रह है...

शुक्र चूंकि यौन इच्छाओं का भी ग्रह है इसलिए इसके वक्री होने के कारण व्यक्ति में भावुकता बढ़ जाती है। वह अपने प्रेमी या प्रेमिका से ज्यादा प्यार पाने के लिए लालायित हो उठता है और उसे पर्याप्त प्यार नहीं मिलने पर वह संबंधित व्यक्ति के प्रति विद्रोह कर बैठता है। उसके बारे में अनर्गल बातें फैलाने लगता है और इसी कारण इस जातक को कोर्ट-कचहरी, पुलिस तक के मामले झेलना पड़ते हैं।

शुक्र का अलग-अलग भाव में फल

प्रथम भाव में: वक्री शुक्र कुंडली के प्रथम भाव में हो तो जातक शारीरिक रूप से सुंदर होता है, लेकिन उसमें घमंड की अधिकता होती है। वह अपनी सुंदरता के मद में चूर होकर दूसरों का अपमान करता है। इस भाव में वक्री शुक्र वाले जातक विपरीतलिंगी को सहज ही अपने वश में कर लेते हैं और उसी कारण बदनाम भी होते हैं।

द्वितीय भाव में: द्वितीय भाव में वक्री शुक्र वाला जातक कामुक, विलासी होता है। भौतिक वस्तुओं और सांसारिक आनंद के प्रति इनका झुकाव अधिक होता है और उसे पाने के लिए गलत राह भी चुन लेते हैं। दिखावे में इनकी ज्यादा रूचि होती है और ये दिखावे पर खर्च भी खूब करते हैं। ये जातक दिखावा छोड़ आध्यात्मिकता पर ध्यान दें तो इनका जीवन सुंदर बन सकता है।

तृतीय भाव में: तृतीय भाव में अकेला वक्री शुक्र अशुभ फल देता है। ऐसा जातक लगभग प्रत्येक व्यावाहारिक कार्यों में असफल होता है। ऐसा जातक अभिचारी तथा रंगीली प्रवृत्ति का होता है और इसी कारण इन्हें सामाजिक रूप से बहिष्कार का सामना करना पड़ता है। शत्रु पक्ष से हमेशा परेशान रहता है और अपनी ही संपत्ति को नष्ट करता है।

जीवनसाथी व भागीदार के प्रति पूर्ण निष्ठा और विश्वास नहीं रखते।

जीवनसाथी व भागीदार के प्रति पूर्ण निष्ठा और विश्वास नहीं रखते।

  • चतुर्थ भाव में: चतुर्थ भाव में वक्री शुक्र भूमिपति होने का संकेत देता है, लेकिन जातक को अपनी ही भूमि, भवन से दूर भी कर देता है। शुक्र यदि मंगल से प्रभावित होता है तो जातक का अपने परिवार से लगाव कम रहता है और उसकी बुद्धि उसके व्यक्तिगत विकास में बाधक होती है। आयु के अंतिम भाग में इन्हें अत्यधिक खर्च करना पड़ता है।
  • पंचम भाव में: वक्री शुक्र पंचम भाव में होने पर जातक की कन्या संतानें अधिक होती हैं। पुत्र होने पर भी पुत्र की ओर से इन्हें कोई सुख प्राप्त नहीं हो पाता है। ऐसा व्यक्ति जुआरी, लॉटरी और ऐसे ही खेलों में अधिक रूचि रखता है। शुक्र यदि बिगड़ा हुआ हो तो जातक समलैंगिक होता है। प्रेम में इन्हें असफलता हाथ लगती है।
  • षष्ठम भाव में: वक्री शुक्र छठे भाव में हो तो जातक स्त्रियों के प्रति द्वेष रखता है। इनके जीवन में शत्रु बहुत होते हैं। परिवार के वरिष्ठों द्वारा अर्जित धन को यह नष्ट कर देता हे। ऐसे व्यक्ति को अपने अहम और घमंड के कारण एक समय बाद पराभव का सामना करना पड़ता है। ऐसे व्यक्ति का स्वयं का स्वास्थ्य तो अच्छा होता है लेकिन दूसरों को पीड़ा पहुंचाते रहते हैं।
  • सप्तम भाव में: सप्तम भाव में वक्री शुक्र वाले जातक अपने शत्रु स्वयं होते हैं। विवाह, साझेदारी, व्यापार के प्रति अपनी खराब नीतियों के कारण खुद ही अपना नुकसान कर बैठते हैं। ऐसे व्यक्ति अपने जीवनसाथी व भागीदार के प्रति पूर्ण निष्ठा और विश्वास नहीं रखते। ये धन और स्त्री के प्रति लालची दृष्टि रखते हैं। परस्त्री या परपुरुषों में ज्यादा रुचि रखते हैं।

सकारात्मक भावना

सकारात्मक भावना

  • अष्टम भाव में: जिन जातकों के अष्टम भाव में वक्री शुक्र हो उन्हें अपने पिता का लिया हुआ कर्ज चुकाना पड़ता है। ऐसे व्यक्ति एक बार कर्ज के जाल में फंस जाए तो कर्ज बढ़ता ही जाता है। इनके जीवन में प्रत्येक कार्य का अंत दुखदायी होता है। इन्हें कोई मुख रोग होता है या जंगली जानवर के काटने से मृत्यु होती है।
  • नवम भाव में: वक्री शुक्र नवम भाव में हो तो जातक सूदखोर होता है। ये अपने अहम और दिखावे के लिए खूब बढ़चढ़कर धार्मिक कार्य, यज्ञ, दान आदि में हिस्सा लेते हैं जबकि मन में कोई सकारात्मक भावना नहीं होती है। शुक्र पर यदि शुभ ग्रहों की दृष्टि हो तो जातक अपने परिजनों का शुभचिंतक होता है।
  • दशम भाव में: दशम भाव का वक्री शुक्र जातक को धनवान और वैभवशाली बनाता है। इनका विवाह उच्चकुल में होता है। हालांकि ऐसा व्यक्ति अपने मातृपक्ष से प्रेमपूर्ण व्यवहार नहीं रखता और किसी भी प्रकार से उनकी मदद नहीं करता है। गोचर में शुक्र के वक्री काल में इन्हें उच्च पद, प्रतिष्ठा एवं वैभव की प्राप्ति होती है।
  • एकादश भाव में: प्राचीन शास्त्रों में ऐसी मान्यता है कि एकादश भाव में वक्री शुक्र वाले जातक को इस जन्म में उन्हीं मित्र, शुभचिंतक और जीवनसाथी की प्राप्ति होती है जो कि पिछले जन्म में भी उनके साथ थे। वक्री शुक्र वाले जातक को धन-संपत्ति, वाहन सुख और नौकर चाकरों का सुख प्राप्त होता है।
  • द्वादश भाव में: जन्मकुंडली के 12वें भाव में शुक्र वक्री होने पर जातक खर्चीला होता है। यह धन इकट्ठा करने में असफल रहता है। शरीर में पित्त कफ की मात्रा अधिक होती है और जातक व्यसनी और भोगी किस्म का होता है। ऐसा पुरुष जातक अपनी पत्नी को छोड़कर पराई स्त्री के साथ रहने लग जाता है। स्त्री पति छोड़कर प्रेमी के साथ चली जाती है।

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