मकान की नींव में सांप और कलश गाड़ना शुभ क्यों?

नई दिल्ली। मकान बनवाना हर व्यक्ति के जीवन का सबसे बड़ा सपना होता है। छोटा हो या बड़ा, भव्य हो या साधारण, अपना घर अपना ही होता है। मकान बनवाते समय हर व्यक्ति सब प्रकार के यत्न कर लेना चाहता है, जिनसे जीवन में शुभता आए, परिवार आनंदित होकर उस घर में अपना शेष जीवन यापन करे।

इसी क्रम में एक परंपरा देखने को मिलती है कि मकान की नींव खोदते समय उसमें एक छोटा कलश और चांदी का सांप गाड़ा जाता है। कहा जाता है कि इससे मकान मजबूत होता है। नींव में कैसे और क्यों स्थापित किए जाते हैं नाग और कलश?

क्या विश्वास है इस कर्मकांड के पीछे? आइए जानते हैं-

नींव में नाग और कलश की स्थापना

नींव में नाग और कलश की स्थापना

सबसे पहले जानते हैं कि नींव में नाग और कलश की स्थापना कैसे की जाती है। इसके लिए मकान की नींव खोदने के बाद चांदी का एक छोटा सा नाग और तांबे का कलश लिया जाता है। सर्वप्रथम इस कलश की हल्दी, कुमकुम, चावल से पूजा कर उसके जोड़ पर अनंत या नाड़ी बांधी जाती है। इसके बाद कलश में दूध, दही, घी, पुष्प और एक सिक्का डालकर मंत्रोच्चार कर भगवान विष्णु, देवी लक्ष्मी और शेषनाग का आवाहन किया जाता है। अब इस कलश को नींव में स्थापित किया जाता है। इसके बाद ही मकान का निर्माण कार्य प्रारंभ किया जाता है। माना जाता है कि इस कर्मकांड के बाद स्वयं भगवान विष्णु, देवी लक्ष्मी और शेषनाग मकान की रक्षा का दायित्व अपने ऊपर ले लेते हैं।

इस परंपरा का धार्मिक आधार क्या है?

इस परंपरा का धार्मिक आधार क्या है?

सबसे पहली बात यह है कि धरती के नीचे पाताल लोक की कल्पना की गई है। इसलिए जब हम भूमि की खुदाई करते हैं तो एक तरह से पाताल लोक की सत्ता में प्रवेश करते हैं। पुराणों में पाताल लोक का स्वामी शेषनाग को माना गया है। ऐसे में पाताल लोक में प्रवेश के साथ वहां के राजा को प्रसन्न करने और उसकी आज्ञा लेने के क्रम में उसका आवाहन इस पूजा के माध्यम से किया जाता है।

पृथ्वी शेषनाग के फन पर

पृथ्वी शेषनाग के फन पर

दूसरी और महत्वपूर्ण बात यह है कि पौराणिक ग्रंथों में बताया गया है कि पृथ्वी शेषनाग के फन पर टिकी है। मकान की नींव में सर्प की पूजा और स्थापना का सांकेतिक अर्थ यह लिया जाता है कि जिस तरह शेषनाग ने पूरी पृथ्वी को अपने फन पर पूरी मजबूती से संभाला हुआ है, उसी प्रकार वे मकान की भी रक्षा करेंगे।

कलश को भगवान विष्णु का प्रतीक

कलश को भगवान विष्णु का प्रतीक

शेषनाग भगवान विष्णु की शैया माने जाते हैं। कहा जाता है कि क्षीर सागर में भगवान विष्णु शेषनाग के ऊपर विश्राम करते हैं और उनके चरणों में देवी लक्ष्मी स्थापित होती हैं। हिंदू धर्मशास्त्रों में कलश को भगवान विष्णु का प्रतीक माना जाता है। भगवान विष्णु रूपी कलश में देवी लक्ष्मी का प्रतीक सिक्का डालकर, उसमें दूध, दही भरकर, पूजा कर शेषनाग को अर्पित किया जाता है। दूध, दही सांपों का प्रिय आहार माना जाता है।

मनोवैज्ञानिक विश्वास

मनोवैज्ञानिक विश्वास

इस तरह की पूजा से यह मनोवैज्ञानिक विश्वास उपजता है कि मकान बनाने वाले व्यक्ति ने पाताल लोक के राजा शेषनाग, सृष्टि के कर्ता-धर्ता भगवान विष्णु और पूरे ब्रह्मांड की संपन्नता की स्वामिनी देवी लक्ष्मी को प्रसन्न कर लिया है, इसलिए उसका मकान बिना किसी विघ्न के पूर्ण हो जाएगा। इसी विश्वास के आधार पर यह परंपरा कई स्थानों पर सदियों से चली आ रही है।

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