Sawan 2020: पढ़ें सावन के सोमवार की व्रत कथा और इसका महत्व
नई दिल्ली। जो लोग श्रावण सोमवार का व्रत करते हैं उन्हें इस व्रत की कथा भी जरूर सुनना चाहिए। कथा सुने या पढ़े बिना व्रत अधूरा रहता है।

श्रावण सोमवार के संदर्भ में जो सर्वाधिक प्रचलित कथा है उसके अनुसार
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किसी समय अमरपुर नामक नगर में एक धनवान व्यापारी रहता था। वह भगवान शिव का बड़ा भक्त था, लेकिन वह दुखी रहता था, क्योंकि उसकी कोई संतान नहीं थी। दिन-रात उसे एक ही चिंता सताती रहती थी कि मृत्यु के बाद उसके इतने बड़े व्यापार और धन-संपत्ति को कौन संभालेगा। कोई पुत्र या पुत्री होती तो वह संभाल लेती। संतान पाने की इच्छा से वह व्यापारी और उसकी पत्नी प्रति सोमवार भगवान शिव की व्रत-पूजा किया करते थे। उनकी भक्ति देखकर एक दिन मां पार्वती ने भगवान शिव से कहा कि हे प्राणनाथ! यह व्यापारी आपका सच्चा भक्त भक्त है। कितने दिनों से यह सोमवार का व्रत और पूजा नियमित कर रहा है। आप इस व्यापारी की मनोकामना अवश्य पूर्ण करें।
भगवान शिव ने कहा हे पार्वती! इस संसार में सबको उसके कर्म के अनुसार फल की प्राप्ति होती है। इसके बावजूद पार्वतीजी नहीं मानीं। उन्होंने आग्रह करते हुए कहा कि आपको इस व्यापारी की इच्छा पूरी करनी ही पड़ेगी। पार्वती के आग्रह पर भगवान शिव ने कहा तुम्हारे आग्रह पर मैं इस व्यापारी को पुत्र-प्राप्ति का वरदान देता हूं, लेकिन इसका पुत्र 16 वर्ष से अधिक जीवित नहीं रहेगा।
पुत्र-प्राप्ति का वरदान
उसी रात भगवान शिव ने स्वप्न में उस व्यापारी को दर्शन देकर उसे पुत्र-प्राप्ति का वरदान दिया और उसके पुत्र के 16 वर्ष तक जीवित रहने की बात भी बताई। भगवान के वरदान से व्यापारी को खुशी तो हुई, लेकिन पुत्र की अल्पायु की चिंता ने उस खुशी को नष्ट कर दिया। फिर भी व्यापारी पहले की तरह सोमवार का विधिवत व्रत करता रहा। कुछ महीने पश्चात उसके घर अति सुंदर पुत्र उत्पन्न् हुआ। पुत्र जन्म से व्यापारी के घर में खुशियां भर गईं। पुत्र का नाम अमर रखा गया।
रास्ते में जहां भी रूको वहां यज्ञ करना
जब उसका पुत्र 12 वर्ष का हुआ तो शिक्षा के लिए उसे मामा के साथ वाराणसी भेजने का निश्चय हुआ। व्यापारी ने बालक के मामा को कहा कि रास्ते में जहां भी रात्रि विश्राम के लिए ठहरो, वहां यज्ञ करते और ब्राह्मणों को भोजन कराते जाना। लंबी यात्रा के बाद वे लोग एक नगर में पहुंचे तो वहां उस नगर के राजा की कन्या का विवाह था। निश्चित समय पर बारात आ गई, लेकिन वर एक आंख से काना था। इस कारण उसके पिता को भय था कि यह बात राजा को पता लगी तो वह विवाह से इनकार कर देगा। वर के पिता ने जब उस व्यापारी के बालक अमर को देखा तो उसने सोचा क्यों न इस लड़के को दूल्हा बनाकर राजकुमारी से विवाह करा दूं। विवाह के बाद इसको धन देकर विदा कर दूंगा और राजकुमारी को अपने नगर में ले जाऊंगा। मामा ने धन मिलने के लालच में वर के पिता की बात स्वीकार कर ली। अमर को दूल्हे के वस्त्र पहनाकर राजकुमारी चंद्रिका से विवाह करा दिया गया। राजा ने बहुत-सा धन देकर राजकुमारी को विदा किया।
राजकुमारी चंद्रिका, तुम्हारा विवाह तो मेरे साथ हुआ था
उस बालक ने राजकुमारी की ओढ़नी पर लिख दिया। राजकुमारी चंद्रिका, तुम्हारा विवाह तो मेरे साथ हुआ था, मैं तो वाराणसी में शिक्षा प्राप्त करने जा रहा हूं। अब तुम्हें जिस नवयुवक की पत्नी बनना पड़ेगा, वह काना है। जब राजकुमारी ने अपनी ओढ़नी पर लिखा हुआ पढ़ा तो उसने काने लड़के के साथ जाने से इनकार कर दिया। राजा ने सब बातें जानकर राजकुमारी को महल में रख लिया। उधर अमर अपने मामा के साथ वाराणसी पहुंच गया। अमर ने गुरूकुल में पढ़ना शुरू कर दिया। जब अमर की आयु 16 वर्ष पूरी हुई तो उसने एक यज्ञ किया। यज्ञ की समाप्ति पर ब्राह्मणों को भोजन कराया और खूब अन्न्, वस्त्र दान किए। रात को अमर अपने शयनकक्ष में सो गया। शिव के वरदान के अनुसार शयनावस्था में ही अमर के प्राण उड़ गए। सूर्योदय पर मामा अमर को मृत देखकर रोने-पीटने लगा। आसपास के लोग भी एकत्र होकर दु:ख प्रकट करने लगे।

मामा के रोने, विलाप करने के स्वर समीप से गुजरते हुए भगवान शिव और माता पार्वती ने भी सुने। पार्वतीजी ने भगवान से कहा प्राणनाथ! मुझसे इसके रोने के स्वर सहन नहीं हो रहे। आप इस व्यक्ति के कष्ट दूर करें। भगवान शिव ने पार्वतीजी के साथ अदृश्य रूप में समीप जाकर अमर को देखा तो पार्वतीजी से बोले पार्वती! यह तो उसी व्यापारी का पुत्र है। मैंने इसे 16 वर्ष की आयु का वरदान दिया था। इसकी आयु तो पूरी हो गई।
हे प्राणनाथ! आप इस लड़के को जीवित करें
पार्वतीजी ने फिर भगवान शिव से निवेदन किया, हे प्राणनाथ! आप इस लड़के को जीवित करें। नहीं तो इसके माता-पिता पुत्र की मृत्यु के कारण रो-रोकर अपने प्राणों का त्याग कर देंगे। पार्वती के आग्रह करने पर भगवान शिव ने उस लड़के को जीवित कर दिया। शिक्षा समाप्त करके वह बालक अपने मामा के साथ अपने नगर की ओर चल दिया। दोनों चलते हुए उसी नगर में पहुंचे, जहां उसका विवाह हुआ था। उस नगर में भी बालक ने यज्ञ का आयोजन किया। राजा ने यज्ञ का आयोजन देखा और अमर को पहचान लिया। यज्ञ समाप्त होने पर राजा अमर और उसके मामा को महल में ले गया और कुछ दिन उन्हें महल में रखकर बहुत-सा धन, वस्त्र देकर राजकुमारी के साथ विदा किया।
भोलेनाथ हर किसी की मनोकामना पूरा करते हैं
मामा ने नगर में पहुंचते ही एक दूत को घर भेजकर अपने आगमन की सूचना भेजी। अपने बेटे अमर के जीवित वापस लौटने की सूचना से व्यापारी बहुत प्रसन्न् हुआ। व्यापारी अपनी पत्नी और मित्रों के साथ नगर के द्वार पर पहुंचा। अपने बेटे के विवाह का समाचार सुनकर, पुत्रवधू राजकुमारी चंद्रिका को देखकर उसकी खुशी का ठिकाना न रहा। उसी रात भगवान शिव ने व्यापारी के स्वप्न में आकर कहा हे श्रेष्ठी! मैंने तेरे सोमवार के व्रत करने से प्रसन्न् होकर तेरे पुत्र को लंबी आयु प्रदान की है। कहते हैं तभी से इस कथा में भगवान शिव की कृपा व्याप्त हो गई और जो कोई भी इस कथा को पढ़ता है या सुनता है भोलेनाथ उसकी हर मनोकामना को जल्दी पूरा करते हैं।
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