क्यों महत्वपूर्ण है महाकुंभ, कब करें स्नान
इलाहाबाद में गंगा नदी के तट पर महाकुंभ का मेला चल रहा है। इस मेले में करोड़ों लोग अगले दस दिनों तक गंगा नदी में डुबकी लगायेंगे। करोड़ों लोगों की आस्था इस महापर्व से जुड़ी हुई है। ऐसे मौके पर लखनऊ के ज्योतिषाचार्य पं. अनुज के शुक्ला बता रहे हैं कुंभ का इतिहास, उसका महत्व और कब-कब आप गंगा नदी में स्नान करें।
विश्व का सबसे बड़ा धार्मिक व सामाजिक उत्सव वाला महाकुंभ एक व्यापक जनसम्पर्क का स्थान है। महाकुंभ भारत का धार्मिक ही नहीं, अपितु यह एक सामाजिक उत्सव भी है। यहां आने वाले सभी श्रद्धालु एक धर्म यात्री है, जिसमें सम्पूर्ण भारत के प्रतिनिधि एकत्रित होकर परस्पर परिचय प्राप्त के साथ-साथ सामाजिक समस्याओं पर विचार कर उनके समाधान के मार्ग खोजने का एक सामूहिक केन्द्र है।
महाकुंभ का इतिहास
देश के सबसे बड़े धार्मिक मेले की परम्परा कितनी प्रचीन है, इसका सही अनुमान लगाना कठिन है। वास्तव में कुंभ का आयोजन कब और क्यों हुआ? यह एक यक्ष प्रश्न है। इतिहास में कुंभ के मेले का सबसे पुराना उल्लेख महाराजा हर्ष के समय का मिलता है, जिसको चीन के प्रसद्धि बौद्ध भिक्षु ह्रेनसान ने ईसा की सातवीं शताब्दी में आंखों देखी वर्णन का उल्लेख किया है।
ऐसी मान्यता है कि 7 हजार धनुष निरन्तर मां गंगा की रक्षा करते-रहते है, इन्द्र पूरे प्रयाग की रक्षा करते है। विष्णु भीतर के मण्डल की रक्षा करते है एंव अक्षयवट की रक्षा शिव जी करते है। प्रयागराज में एक माह तक सत्य, अहिंसा और ब्रहमचर्य का पालन करने से मनुष्य को असीम उर्जा की प्राप्ति होती है। पृथ्वी की एक लाख बार प्रवीक्षण करने का फल कुंभ पर स्नान, दान आदि कर्म करने से प्राप्त होता है।
महाकुंभ की तस्वीरें और रोचक तथ्य:

कब-कब लगता है कुंभ मेला?
महाकुंभ- यह अमृत कलश जिन-2 स्थानों पर पर छलका या रखा गया था। उस समय सूर्य, चन्द्र व गुरु जिन राशि में स्थित थे, ये ग्रह जब उन्ही राशियों में भ्रमण करते है, तो उस स्थान पर पूर्ण कुंभ का आयोजन होता है।
पहला- जब सूर्य और चन्द्रमा मकर राशि में तथा गुरु वृष राशि में आते हैं, तो प्रयाग में भव्य महाकुंभ होता है। दूसरा- जब कुंभ राशि में गुरु हो एंव सूर्य मेष राशि में होता है, तब हरिद्वार में कुंभ का आयोजन होता है। तीसरा- सिंह राशि में गुरु और सूर्य एंव चन्द्र कर्क राशि में भ्रमण करते है, तब नासिक (पंचवटी) में कुंभ मेले का आयोजन होता है। चौथा कुंभ- जब तुला राशि में सूर्य आये तथा गुरु वृश्चिक राशि में भ्रमण करें, इस योग में अवनितकापुरी (उज्जैन) में कुंभ के पर्व को बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है।

पहली कथा का भाग-1
प्रथम कथा- समुद्र मन्थन से अमृत कुंभ के निकलने पर असुर उसे छीनने के लिए देवताओं पर टूट पड़े, किन्तु इन्द्र का पुत्र जयन्त उस अमृत के घड़े को लेकर निकल गया। यह भाग-दौड़ दिव्य 12 दिन ( मनुष्य के 12 वर्ष) पर्यन्त चलती रही। इन 12 दिव्य दिनों में चार स्थानों पर चार बार राक्षसों ने जयन्त को पकड़ा और उससे अमृत घड़ा छीनने का भरसक प्रत्यन किया, किन्तु उसी समय सूर्य चन्द्र और बृहस्पति ने उन चारों स्थानों पर जयन्त का साथ देकर अमृत कुंभ की रक्षा की। कथा जारी है अगली स्लाइड में।

पहली कथा का भाग-2
इस खींचा-तानी में अमृत की कुछ बूंदें उन चारों स्थानों पर गिरी, वे स्थान इस प्रकार से है- 1- प्रयाग, 2- हरिद्वार, 3-नासिक (गोदावरी) 4- उज्जैन क्षेत्र है। अमृत घट की रक्षा के समय सूर्य, चन्द्र और गुरु जिन राशियों में स्थित थे, उसी राशि पर इन तीनों के होने पर अब तक उक्त चारों पुण्य क्षेत्रों में कुंभ महापर्व का स्नान होता है। गुरु बृहस्पति ने राक्षसों से अमृत कुंभ की रक्षा की, सूर्य ने घड़े को फूटने से बचाया और चन्द्रमा ने घटस्थ अमृत को गिरने से बचाया, इसी कारण इन तीनों का कुंभ महापर्व से गहरा सम्बन्ध है। इस कथा का उल्लेख विष्णुयोग मीमांसा, योगसार सहिंता तथा धर्म साधन के अनुसार गंगास्थिति समय मीमांसा आदि ग्रन्थों में मिलता है। पहली कथा समाप्त हुई।

कुंभ की ऐतिहासिक कथा-2
श्री स्वामी शंकराचार्य जी के साथ भी महाकुंभ का ऐतिहासिक सम्बन्ध है। श्री स्वामी आद्यशंकराचार्य जी महराज जी जब अपने विरोधियों को परास्त करने के लिए भारत भ्रमण पर कर रहे थे तब उनकी शिष्य मण्डली में निरन्तर वृद्धि हो रही थी, तो उन्होने उन लाखों अपने उत्साही शिष्यों को आज्ञा दी कि तुम सभी लोग देश के कोने-कोने में पहुंचकर धर्म प्रचार का कार्य सम्पन्न करो। आगे की कथा अगली स्लाइड में।

दूसरी कथा का भाग-2
स्वामी जी के इस आदेश से शिष्यों ने उदास होकर जिज्ञासा की कि अब हम श्री चरणों का साक्षात्कार फिर कब, कैसे और कहा प्राप्त करेंगे। साथ ही अपने साथी, सहपाठी और सन्यासी वर्ग से फिर कैसे साक्षात्कार हो सकेगा? इस पर स्वामी जी ने कहा कि आप सभी उज्जैन के कुंभ पर्वो एकत्रित हो सकते है। तदनुसार सन्यासी मण्डल अपने प्रचार कार्य में निरत होकर प्रति तीसरे वर्ष इन निश्चित सथानों पर एकत्रित होने लगे। इस कथा का उल्लेख विष्णुयोग मीमांसा, योगसार सहिंता तथा धर्म साधन के अनुसार गंगास्थिति समय मीमांसा आदि ग्रन्थों में मिलता है।

कौन-कौन से पर्व पर करें स्नान
कुंभ महापर्व की पुण्यदायक स्नान तिथियां
प्रयाग माध मासे तु त्रयहं स्नानस्य यद् भवेत्।
नाश्वमेघ सहस्त्रेण तत्फलं लम्यते भुवि।।
माघ मास में तीर्थराज प्रयाग में तीन विशेष पर्वो में स्नान करने से जो फल प्राप्त होता है, वह पृथ्वी पर एक हजार अश्वमेध करने पर भी प्राप्त नहीं होता है। वह स्नान के तीन विशेष पर्व निम्न है- प्रथम- मकर संक्रान्ति, द्वितीय- मौनी अमावस्या, तृतीय- वसन्त पंचमी। सन्त, महात्माओं के समस्त अखाड़े पूर्वक्त पर्वकालों में अपने-2 दल-बल के साथ शान-शौकत के साथ शाही स्नान करते है।

पौष मास में स्नान की तिथियां
1- तिथि-3, दिन-सोमवार, उत्तरायण मकर संक्रान्ति पुण्यकाल दिनांक 14 जनवरी 2013 को प्रथम शाही स्नान।
2- तिथि- पुत्रदा एकादशी, दिनांक 22 जनवरी 2013।
3- तिथि- पौषी पूर्णिमा, 27 जनवरी 2013।
4- तिथि- कृष्ण षटतिला एकादशी, दिनांक 6 फरवरी 2013।

माघ मास में स्नान की तिथियां
1- कृष्ण चतुर्दशी, 9 फरवरी 2013 को अपरान्ह 3:19 मि0 से सूर्यास्त तक महोदय योग में स्नान करना फलदायी रहेगा।
2- शुक्ल द्वितीया, 12 फरवरी 2013, कुंभ संक्रान्ति पर्व पुण्यकाल मध्यान्होतर से सूर्यास्त तक।
3- कृष्ण अमावस्या, मौनी अमावस्या, दिनांक 10 फरवरी 2013। कुंभ महापर्व का प्रमुख दूसरा शाही स्नान।
4- शुक्ल चतुर्थी, वसन्त पंचमी, दिनांक 14 फरवरी 2013 को तृतीय शाही स्नान।
5- एकादशी, दिनांक 21 फरवरी 2013।
6- पूर्णिमा, श्री ललिता जयन्ती, दिनांक 25 फरवरी 2013।
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