ग्रह-नक्षत्र देखकर बच्चा पैदा करना मां-बच्चे दोनों के लिए खतरा

गायनिकोलॉजिस्ट डा. मीनू सागर का कहना है कि प्री-मेच्योर बच्चे का जन्म बहुत ही खतरनाक है। प्री-मेच्योर अर्थात समय से पहले बच्चे को दुनिया में लाने से न सिर्फ उसका शारीरिक विकास प्रभावित होता है बल्कि उसे तमाम प्रकार की बीमारियां होने की संभावना बढ़ जाती है।
समाज में अब लोग हर काम शुभ घड़ी में करना चाहते हैं। नयी नौकरी करने से लेकर विवाह तक सबकुछ ज्योतिष से पत्रांक दिखाकर किया जाता है। अब समय आ गया कि जन्म की घड़ी भी मनुष्य तय कर देना चाहता है शायद यही कारण है कि उसने प्रकृति से छेड़छाड़ करना शुरू कर दिया है। विज्ञान भी लोगों की मंशा में उनकी मदद कर रहा है।
नार्मल डिलीवरी में समय को दो चार घंटे आगे करना तो आम बात थी लेकिन अब तो लोग बच्चे के जन्म में ऑपरेशन का सहारा ले रहे हैं। ऑपरेशन के जरिए लोग अपने बच्चे का दुनिया में आने का समय तय कर रहे हैं। महिला चिकित्सालयों में ऐसे दम्पत्तियों की कमीं नहीं है जो अपने बच्चे के जन्म के लिए शुभ घड़ी का चयन कर रहे हैं।
चिकित्सक भी इस बात को मानते हैं कि पिछले कुछ समय के दौरान उनके पास ऐसे तमाम दम्पत्ति आते हैं जो अपने बच्चे के जन्म के लिए समय निर्धारित किए जाने की अपील करते हैं। चिकित्सक बताते हैं कि अब लोग पण्डितों व ज्यातिषों के कहने पर कार्य करने लगे हैं जिसके कारण अब लोग पण्डित के बताए समय पर ही गर्भवती को चिकित्सालय में भर्ती कराते हैं।
इसके बाद यदि सामान्य डिलवरी का समय कुछ और हो तथा ज्योतिष ने दो तीन दिन पहले का समय शुभ बताए तो दम्पत्ति पहले डिलवरी कराने की बात कहते हैं। लोग नहीं चाहते कि उनके बच्चे का जन्म राहु काल में हो इस लिए वह ऐसा करते है। ऐसी स्थिति में चिकित्सक को ऑपरेशन के माध्यम से बच्चे का जन्म कराना पड़ता है।
गायनिकोलॉजिस्ट डा. मीनू सागर का कहना है कि उनके सामने जब भी ऐसा प्रस्ताव आया उन्होंने मना कर दिया। उनका कहना है कि ऐसा करने से जच्चा-बच्चा दोनों के लिए खतरा होता है। डा. सागर कहती हैं कि यदि बच्चा प्री मेच्योर हो तो उसका वजन कम होता है और वह शरीरिक रूप से कमजोर होता है। उनका कहना है कि समय से पहले बच्चे का दुनिया में आना कई बीमारियों को दावत देता है जिसमें से रिस्पाइरेट्री सिन्ड्रोम सबसे सामान्य बीमारी है। इस बीमारी में बच्चा ठीक से सांस नहीं ले पाता।
डा. सागर के अनुसार यह रोग समय के साथ दूर नहीं होता बल्कि जीवन भर बना रहता है। इतना ही नहीं बच्चे का मानसिक विकास भी प्रभावित होता है और उनका आई-क्यू लेवल सामान्य बच्चों से भी कम होता है। प्री मेच्योर बच्चे मां का दूध भी ठीक प्रकार से नहीं पी पाते।












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