घर में यज्ञ करायें और दूर करें सारी परेशानियां

Beneficial of Yagya
यज्ञ का अर्थ है- शुभ कर्म, श्रेष्ठ कर्म, सतकर्म और सर्वजन कल्याण कर्म है न कि यज्ञ का अर्थ है, अग्नि में घी डालकर स्वाहा बोलना। स्वच्छ व निर्मल भाव से भगवान और प्रकृति के तत्वों से किये गये अवाहन से जीवन की विभिन्न प्रकार की मनोकामनायें पूर्ण होती हैं। स्तुति करो, कर्म करो और फिर प्राप्त करो। यज्ञ एक रहस्य है।

वेदों में पांच प्रकार के यज्ञों को उल्लेख है। 1- ब्रहम यज्ञ, 2- देव यज्ञ, 3- पितृ यज्ञ, 4- वैश्वदेव यज्ञ, 5- अतिथि यज्ञ।

ब्रहम यज्ञ- सभी जीवों में श्रेष्ठ है, मनुष्य। मनुष्य से बढ़कर पितृ अर्थात माता-पिता और गुरू। पितरों से बढ़कर है, देव अर्थात प्रकृति की पांच शक्तियां और देव से बढ़कर है, भगवान। भगवान अर्थात ब्रहमा। नित्य सन्धा, वन्दन, स्वध्याय तथा ध्यान करने से ब्रहम यज्ञ सम्पन्न होता है। इस यज्ञ को करने से हमारे ऋषियों का ऋण उतरता है तथा ब्रहमचर्य आश्रम शक्तिशाली होता है।

देव यज्ञ

वेदी में अग्नि जलाकर एंव मन्त्रों को पढ़ते हुये घी डालकर हवन करने की विधि को देव यज्ञ कहते है। इस विधि को अग्नि होत्र यज्ञ भी कहते है। हवन में सात पेड़ों की लकड़ियां सबसे उपयुक्त मानी जाती है- आम, बरगद पीपल, ढाक, जाटी, जामुन और शमी। हवन करने से पूरे घर में सकारात्मक उर्जा का संचरण होता है, जिससे अरोग्यता एंव शान्ति बनी रहती है। इसे सन्धिकाल में गायत्री मन्त्र के साथ किया जाता है। देव यज्ञ करने से देव ऋण से मुक्ति मिलती है एंव गृहस्थ जीवन शक्तिशाली बना रहता है।

पितृ यज्ञ

सत्य, आस्था और निर्मल मन से किये गये कर्म को श्राद्ध कहते है एंव जिस कर्म से माता-पिता और गुरू की आत्मा तृप्त हेाती है, उसे तर्पण कहते है। वेदों के अनुसार श्राद्ध और तर्पण हमारे माता-पिता व गुरू के प्रति सम्मान का भाव है। जिससे हमारे आने वाली पीढ़ी अपने माता-पिता का सम्मान व आदर करें। यह यज्ञ सम्पन्न होता है, सन्तानोत्पत्ति से। यह यज्ञ करने से पितृ ऋण से मुक्ति मिलती है।

वैश्वदेव यज्ञ

यह मानव शरीर पांच तत्वों से बना है। सभी जीवों तथा पेड़ों के प्रति करूणा और कर्तव्य समझकर उन्हे अन्न-जल देकर उनकी रक्षा करनी चाहिए। अर्थात जो कुछ भी भोजन कक्ष में बना है, उसमें का कुछ भाग अग्नि में होम करें जिससे भोजन पकाया गया हे। तत्पश्चात कुछ भाग गाय, कुत्ते और कौवे को दें। इसे वैश्वदेव यज्ञ कहते है। यह यज्ञ करने से घर में सुख व समृद्धि बनी रहती है।

अतिथि यज्ञ

अतिथि का अर्थ होता है- जिसकी आने की कोई निश्चित तिथि न हो। घर पर आये हुये अतिथि जैसे- गरीब, अपंग, बुर्जुग महिला, साधु सन्त, धर्म गुरू, बालक, वृद्ध आदि जनों की पूरे मनोभाव से सेवा व सहयोग करना चाहिए। यह यज्ञ करने से सन्यास आश्रम बलवान होता है। यह यज्ञ करने से परिवार की आर्थिक व सामाजिक उन्नति होती है।

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