अगले एक साल तक भयावह हो सकता है शनि का प्रभाव

तुला राशि में शनि का प्रवेश-
विक्रम संवत् 2068 में मार्गशीर्ष मास कृष्ण पक्ष की चतुर्थी, दिन मंगलवार 15 नवम्बर 2011ई0 को प्रातः 10:10 बजे मिथुन राशिस्थ चन्द्र के समय शनि ग्रह अपनी उच्च राशि तुला में प्रविष्ट होकर, वर्षान्त तक वहीं संक्रमण करेगा।
शनि की साढ़ेसाती का विचार-
द्वादशे जन्मगे राशौ द्वितीये च शनैश्चरः।
सार्धानि सप्त वर्षाणि तथा दुःखैर्युतो भवेत।।
जन्म राशि यानि चन्द्र राशि से गोचर में जब शनि ग्रह द्वादश भाव, प्रथम भाव एंव द्वितीय भाव में भ्रमण करता है, तो साढ़े सात वर्ष के समय को शनि की साढ़ेसाती कहते है।
तुला राशि में शनि के गोचर फल-
सूर्य पुत्रे तुलायाते हा्रग्न्युपद्रवमादिशेत।
सप्तधान्यमहधारणि मेदिनी नष्टकारिका।।
जब तुला राशि में शनि का प्रवेश होता है, तब विश्व में अग्निकाण्ड का उपद्रव होता है, सभी अन्न सप्तधान्य महगें होते है और पृथ्वी पर आपदायें व विपदायें अधिक आती हैं। तुला में शनि के आने से अनाज के भाव तेज हो जाते हैं, विश्व में व्याकुलता, पश्चिमी देशों और भू-भागों में क्लेश, मुनियों को शारीरिक कष्ट, जनपदों में रोगोत्पत्ति, वनों का विनाश और धन का अभाव होता है।
तुला का शनि जनता के लिए कष्टकारी होता है एंव महिलाओं को न्याय मिलने के लिए कोई विशेष कानून पारित करा सकता है। बंगाल में उत्पात व छत्रभंग होने की आशंका रहती है। तुला राशि में शनि के प्रवेश व संचार काल में इसकी दृष्टि पश्चिम दिशा पर होगी। शनि की जॅहा पर दृष्टि पड़ती है, उस स्थान की हानि होती है। अतः विश्व व भारत के दक्षिणी तथा पश्चिमी क्षेत्रों में प्राकृतिक आपदायें, बाढ़ तथा आतंकवाद, हिंसा, तूफान, आरजकता तथा जनान्दोलन के कारण क्षति की आशंका रहती है।
तुला राशि में शनि के संक्रमण का विभिन्न राशियों पर फल-
मेष- इस राशि के लिए शनि ताम्रपाद का रहेगा। यात्रा में भय, जीवन साथी को मानसिक व शरीरिक कष्ट, शत्रुओं से भय, धन का अपव्यय एंव बुद्धिभ्रंश होने की आशंका रहेगी।
वृष- इस राशि के लिए शनि रजतपाद का रहेगा। पराक्रम में व उत्साह में वृद्धि, शासन की कृपा, जीवन साथी का सुख व सहयोग, प्रतिष्ठित व्यक्तियों का साथ मिलेगा, धन का लाभ एंव धन संचय भी होगा।
मिथुन- इस राशि के लिए शनि स्वर्णपाद का रहेगा। स्त्री, सन्तान व बन्धुवर्ग को कष्ट रहेगा। वायु रोग, श्वास रोगियों को विशेष सावधान रहने की आवश्यकता है। कठोर परिश्रम से ही धन की प्राप्ति होगी।
कर्क- इस राशि के लिए शनि लौहपाद का रहेगा। धन का अपव्यय, जीवन साथी को कष्ट, मन में व्याकुलता, माता को कष्ट, नेत्र रोग, गृह क्लेश की आंशका है।
सिंह- इस राशि के लिए शनि स्वर्णपाद का रहेगा। चिन्ताओं से मन अप्रसन्न रहेगा, परिश्रम से धन,वस्त्र, आभूषण तथा वाहन आदि की प्राप्ति हो सकती है। शासन से जुड़े लोगों को लाभ मिलेगा।
कन्या- इस राशि के लिए शनि ताम्रपाद का रहेगा। पैरों की उतरती साढ़ेसाती मुख और नेत्र रोग को उत्पन्न कर सकती है। जीवन साथी तथा सन्तान की चिन्ता, धन का व्यय एंव शासन से भय बना रहेगा।
तुला- इस राशि के लिए शनि रजतपाद का रहेगा। ह्रदय पर आयी हुयी शनि की साढ़ेसाती मस्तक और छाती में रोगजन्य पीड़ा उत्पन्न करेगी। स्वजनों से विवाद एंव परिवार में कलह की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। जीवन साथी का सुख एंव सहयोग रहेगा।
वृश्चिक- लौह पाद की मस्तक एंव शिर पर चढ़ती शनि की साढ़ेसाती। नेत्र, छाती व पैरों में पीड़ा रहेगी। सांस वाले रोगी विशेष सावधानी बरतें। धन की हानि, बुद्धि भ्रमित एंव अपनों से विवाद हो सकता है।
धनु- इस राशि के लिए शनि ताम्रपाद का रहेगा। प्रतिष्ठा में वृद्धि, क्रय व विक्रय से लाभ, जीवन साथी व सन्तान का सुख और उत्साह व धैर्य में वृद्धि होगी।
मकर- इस राशि के लिए शनि स्वर्णपाद का रहेगा। शासन से भय, धन की हानि, व्यापार में चिन्ता, नौकरी वाले लोगों का स्थानान्तरण हो सकता है। रोग वृद्धि एंव चोरों से सावधान रहने की आवश्यकता है।
कुम्भ- इस राशि के लिए शनि रजतपाद का रहेगा। सामान्य समय रहेगा, स्थान च्युति, धन का कुछ दुरूपयोग तथा शासन से भय बना रहेगा। अपने विवेक से कार्य करना उचित रहेगा।
मीन- इस राशि वालों पर शनि की लौह पाद की ढैया रहेगी। रोगजन्य पीड़ा, जीवन साथी को कष्ट, सन्तान को कष्ट, प्रवास, शत्रु से भय तथा कठोर परिश्रम से कुछ लाभ होगा।
शनि की साढ़ेसाती से प्रभावित राशियां- कन्या, तुला, वृश्चिक, मिथुन, कर्क, कुम्भ एंव मीन है। इस राशि वाले जातक निम्न उपाय कर सकते है।
उपाय-
1- मदिरा या मादक पदार्थो का सेंवन न करें।
2- नौंकरो को समय पर वेतन दें।
3- काले रंगों का प्रयोग न करें।
4- नित्य किसी बड़े, बुजर्ग का पैर छुकर आशीर्वाद लें।
5- कर्ज-ब्याज का लेन-देन न करें।
6- रिस्क वाले कार्य एंव शेयर आदि में अधिक निवेश न करें।
7- महामृत्युजंय मन्त्र का नित्य 10 माला 125 दिन तक करें।
8- प्रति शनिवार सुरमा, काले तिल, सौंफ और नागरमोथा इन सभी को जल में डालकर स्नान करें।
9- पिप्पलाद उवाच का पाठ करें।
10-पश्चिम दिशा में कबाड़ या गन्दगीं न रखें












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