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सावन में कीजिये 16 श्रृंगार. औऱ जीतिये पति का दिल

दोस्तों, अक्सर लोगों के मुंह से सुना जाता है कि सावन के पवित्र महीने में ..महिलाओं को.. विशेषकर के सुहागिनों को 16 श्रृंगार करके अपने पति के सामने और भगवान की पूजा करनी चाहिए तभी भगवान और उनके पतिदेव उनसे प्रसन्न होंगे।

16 श्रृंगार होते क्या हैं?

लेकिन आज की दौड़ती भागती जिंदगी में ऐसा कर पाना बेहद ही असंभव है। इसलिए महिलाओं ने सावन विशेष करके एक दिन चुन लिया है जिसके लिए वो पूरी तैयारी करती हैं लेकिन आज भी हमारी बहुत सारी बहनें ऐसी हैं जिन्हें पता ही नहीं कि 16 श्रृंगार होते क्या हैं?

जानी मानी पत्रिका 'एराउंड द इंडिया' के मई 2011 अंक में छपे लेख 'सोलह श्रृंगार की महत्ता' की लेखिका कुमद मेहरोत्रा ने इस विषय पर गहन अध्ययन किया है, जिसके बाद उन्होंने अपनी लेखनी से श्रृंगार का महत्व समझाया है।

कुमद मेहरोत्रा के मुताबिक स्वर्णाभूषण शरीर के ऊपरी भाग में घारण किये जाते हैं और वेदांग की मान्यता है कि सोना संसार के पालक श्री हरि विष्णु को सर्वाधिक प्रिय हैं। इसलिए मान्यता है कि स्वर्ण आभूषण नाभि से ऊपर ही धारण किये जाये। इसलिए श्रृंगार का क्रम सिर से होते हुए पैरों तक पहुंचता है।

आईये जानते हैं इन सबकी की उपयोगिता...

माथ बेंदी या मांग टीका

माथ बेंदी या मांग टीका

महिलायें जब भी श्रृगांर करें तो वो सबसे पहले मांग टीका धारण करें, क्योंकि यह पति द्वारा प्रदान किये गये सिंदूर का रक्षक होता है। ललाट पर लटकता हुआ इसका अंतिम छोर दोनों भवों के नीचे पहुंचता है, जहां पर पुरूष तिलक लगाते हैं इसलिए इसका नाम मांग टीका है। क्योंकि ये पूरी तरह मांग को आच्छादित करके टीके के स्थान पर पहुंचता है।

बिंदिया

बिंदिया

आकर्षण में बिंदिया का अपना ही महत्व है। इसे इस तरह से लगाया जाता है कि मांगटीका का एक छोर इसे स्पर्श करे लेकिन पूरी तरह से ढके नहीं। दोनों भवों के बीचों-बीच ये आज्ञाचक्र होता है, जहां ईस्वरीय ऊर्जा के रूप में हमारे संचित संस्कार केन्द्रीत होते हैं।

काजल

काजल

स्त्री की आंखो की उपमा मछली और हिरणी से दी जाती है या तो वह मीनाक्षी होती है या मृगनयनी। सृष्टि के ये दोनों जीव बेहद चंचल होते है। इनकी चंचलता को किसी की नजर लग जाये तो नजर का अभिशाप आंखो में होकर हृदय में उतर जाता है। काजल ऐसी अशुभ नजरों से बचाव करता है। इसलिए काजल लगाना हर स्त्री के लिए बेहद शुभ माना जाता है। जहां ये आपको बुरी नजर से बचाता है वहीं ये आपकी सुंदरता में चार चांद लगा देता है।

नथुनी

नथुनी

आपको बताते हैं श्रृंगार नंबर 4 के बारे में, जिसें हम नथुनी कहते हैं। नाक में पहना जाने वाला यह आभूषण अपनी अपनी परंपरा व रस्मों रिवाज में छोटा-बड़ा होता है। यह रक्त संचार को ग्रीवा भाग में स्थित करवाता है इसलिए कील या नथुनी के रूप में जीवन पर्यन्त इस आभूषण को धारण करना एक सुहागन के लिए अति आवश्यक माना गया है।

सिंदूर

सिंदूर

श्रृंगार नंबर 5 को सिंदूर कहते हैं। भारतीय वेदांग के मुताबिक शरीर में सिर का हिस्सा सूर्य का होता है और सूर्य आत्मा का कारक है इसलिए इस श्रृंगार के माध्यम से प्रथम बार कोई पुरूष किसी स्त्री को अपनी संगिनी बनाता है। इसलिए जीवन में इसकी निरन्तरता और स्थायित्व बना रहे इसलिए विवाह के मुहूर्त बहुत सोच विचार कर निर्धारित किया जाते हैं। सिंदूर के बिना समस्त प्रकार के श्रृंगार अधूरे माने जाते हैं। एक चुटकी भर सिंदूर से दो लोग जन्मों के साथी बन जाते हैं।

मंगलसूत्र

मंगलसूत्र

श्रृंगार नंबर 6 को हार कहते हैं। कंधे और सिर के बीच का भाग अनेक प्रकार की नाड़ियों से घिरा होता है और गले में पड़ने वाला हार उन नाड़ियों की गति को व्यवस्थित करता है। इसलिए एक भारतीय परंपरा है कि स्त्री को कभी भी खाली गले से नहीं रहना चाहिए। इसके लिए सबसे आदर्श मंगलसूत्र माना जाता है। जो कि एक ऐसा धागा होता है जिसे पहनने के बाद हर चीज मंगलमय होती है। ये सुहाग का सूचक होता है। वक्त के साथ मंगलसूत्र भी बदल चुका है। आजकल मार्केट में एक से एक नायाब रूप में मंगलसूत्र मौजूद है। ये देखने में काफी आकर्षक होते है। कोई भी स्त्री इस धागे से तभी अलग होती है जब उसका पति उसका साथ छोड़ कर चला जाता है।

कर्णफूल या इयर रिंग

कर्णफूल या इयर रिंग

श्रृंगार नंबर 7 कर्णफूल को कहते हैं। कान की नसें स्त्री की नाभि से लेकर पैर के तलवे तक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इससे उसकी सहिष्णुता निर्धारित होती है। कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि कान और नाक में छिद्र ना होने पर स्त्री के लिए प्रसव पीड़ा सहन करना अत्यंत कठिन हो जाती है। वक्त ने आज कर्णफूल के रूप-रंग को बदल दिया है, आज कर्णफूल के रूप में मार्केट में कई इयर रिंग अलग-अलग तरह से मौजूद है जिनकी मांग बहुत ज्य़ादा है। ये वो ही कर्णफूल हैं जो हमारे साहित्यकारों का मनपसंद विषय है। उन्होंने नारी के झुमकों में ऐसी रचनाएं लिखी हैं जिन्हे पढ़कर और सुनकर आज भी लोग रोमांचित हो जाते हैं। वाकई में कान के श्रृंगार के बिना नारी की सजावट फीकी है।

'मेंहदी'

'मेंहदी'

श्रृंगार नंबर 8 'मेंहदी' को कहते हैं। विशेष अवसरों पर लगायी जाने वाली मेंहदी हार्मोन को तो प्रभावित करती ही है। रक्त संचार में भी नियंत्रण रखती है। आजकल पहले की अपेक्षा इसका चलन काफी बढ़ गया है। ये दिमाग को शांत और तेज बनाती है। इसके साथ ही मान्यता ये भी है कि जिसकी मेहंदी जितनी रंग लाती है, उसको उतना ही अपने पति और ससुराल का प्रेम मिलता है। मेहंदी की सोंधी खुशबू से लड़की का घर-आंगन तो महकता ही है साथ ही लड़की की सुंदरता में भी चार चांद लग जाते हैं। इसलिए कहा भी जाता है कि मेहंदी बिना दुल्हन अधूरी है।

कंगन या चूड़ी

कंगन या चूड़ी

चूड़िया तो मन की चंचलता को दर्शाती हैं तो कंगना मातृत्व की ललक उत्पन्न करता हैं। इसलिए कंगन दुल्हनों का श्रृंगार है जब कि चूंड़ियां कुमारी कन्याएं भी पहनती हैं। हमारे साहित्यकारों ने भी इस श्रृंगार के बारे में इतना कुछ लिख दिया है जिसके बारे में बात करना बेहद कठिन हैं। वैसे भी जब तक दुल्हन के हाथ में चूड़ियां और कंगन खनकते नहीं हैं तब तक एहसास नहीं होता कि दुल्हन घर आ गयी हैं। बेहद ही खूबसूरत श्रृंगार में शामिल कंगना और चूड़ी केवल महिलाओं को ही नहीं रिझाते बल्कि पुरूषों का भी दिल चुराते हैं।

गजरा

गजरा

बालों को सवार कर उसमें गजरा सजाना जितान खूबसूरत हैं उसके पीछे कारण ये है कि जब तक बालों में सुगंध नहीं होगी तब तक आपका घर नहीं महकेगा। फूलों की सुंगध मन को तरोताजा और ठंडा रखती है। भले ही आज महिलाएं फैशन परस्त होकर बालों को खोलकर रखती हों लेकिन बालों का खोलना अपशकुन माना जाता है। दुल्हन वो ही अच्छी मानी जाती है जिसके बाल पूरी तरह से व्यवस्थित होते हैं।

बाजूबंद

बाजूबंद

कुछ इतिहासकारों ने बाजूबंद मुगलकाल की देन माना है लेकिन पौराणिक कथाओं में इसकी खूब चर्चा है। यह बड़ी उम्र में पेशियों में खिंचाव और हड्डियों में दर्द को नियंत्रित करता है। भारत में शहरी क्षेत्र में इसका चलन बहुत कम हो गया है। लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी इसकी महत्ता बरकरार है। दक्षिण भारत में इसका चलन उत्तर भारत की अपेक्षा काफी है। यहां बाजूबंद दुल्हन को पहनाने के लिए वर पक्ष की ओर से आता है। महंगाई ने भले ही आभूषणों का संख्या कम कर दी हो लेकिन महत्व आज भी बरकरार है। अब तो बाजार में सोने के अलावा,चांदी और मोतियों से बने बाजूबंद भारी संख्या में उपलब्द्ध हैं।

'अंगुठी'

'अंगुठी'

हम आपको बताते हैं श्रृंगार नंबर 12 यानी 'अंगुठी' के बारें में। वैसे 11 वां श्रृंगार 'आरसी' के रूप में जाना जाता है। आरसी आइने को कहते हैं लेकिन यहां ये भाव नहीं है। आरसी एक सीसा लगी हुई अंगुठी होती है जो कि दायें हाथ की अनामिका में पहनीं जाती हैं। अंगुठी में लगे सीसे से दुल्हन जब चाहे अपनी सूरत निहार सकती है। इससे उसके मन अपने पति की छवि बनीं रहती है। आजकल बाजारों में अंगुठी के नये नये डिजायन मौजूद हैं। जिन्हें आप अपनी पसंद और क्षमता के आधार पर खरीद सकते हैं।

कमरबंद

कमरबंद

कमरबंद को तगड़ी भी कहते हैं। काम में उत्साह और शरीर में स्फूर्ति का संचार बना रहे। उत्तम स्वास्थ्य के लिए कमरबंद स्वास्थ्य कारकों से भी आवश्यक और उत्तम माना जाता है। यह बड़ी उम्र में पेशियों में खिंचाव और हड्डियों में दर्द को नियंत्रित करता है। भारत में शहरी क्षेत्र में इसका चलन बहुत कम हो गया है। लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी इसकी महत्ता बरकरार है।

पायल या पाजेब

पायल या पाजेब

श्रृंगार में 14 वां नंबर है पायल या पाजेब का। दुल्हन अपने घर की गृहलक्ष्मी होती है। उसका संचारण और सुभागमन बहुत शुभ माना जाता है। पायल मूल रूप से चांदी की होती है। चांदी चंद्रमा की धातु है, चंद्रमा शरीर में मन का कारक होता है। पाजेब में बजने वाले घुंघरू मन को भटकने से रोकते हैं। और पूरे परिवार को शांति औऱ घूंघरू की तरह एक में पिरोकर रखने की शक्ति देते हैं। इसलिए पायलों की छम-छम को बहुत सुंदर माना जाता है।

बिछिया

बिछिया

पांवो में अंतिम आभूषण के रूप में बिछिया पहनी जाती है। दोनों पांवों की बीच की तीन उंगलियो में बिछिया पहनने का रिवाज है। वास्तव में सारे श्रृंगार बिछिया और टीका के बीच होते हैं। सोने का टीका और चांदी की बिछिया का भाव ये होता है कि आत्म कारक सूर्य और मन कारण चंद्रमा दोनों की कृपा जीवनभर निरन्तर बनी रहे। बिछिया एक्यूप्रेशर का भी काम करती है। जिससे तलवे से लेकर नाभि तक की सभी नाड़िया और पेशियां व्यवस्थित होती हैं। भारत में शहरी क्षेत्र में इसका चलन बहुत कम हो गया है। लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी इसकी महत्ता बरकरार है।

परिधान यानी कपड़ा

परिधान यानी कपड़ा

अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण श्रृंगार होता है परिधान। शारीरिक आकार प्रकार के अनुसार परिधान में रंगो का चयन स्त्री के तंत्रिका तंत्र को मजबूत और व्यवस्थित करता है। इसलिए परिधान चयन में पसंद ना पसंद का विचार जरूर होना चाहिए। हमने देखा कि श्रृंगार का मतलब केलव सजावट नहीं होता ये सोच, कर्म, भावना, विचार को भी प्रभावित करता है। क्योंकि स्त्री एक जीवन को जन्म देती है इसलिए जब तक स्त्री ही संतुलित नहीं होगी तो वो परिवार को कैसे खुशहाल रखेगी। इसलिए नारी का सजना-संवरना काफी जरूरी है।

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