Mangrove Forest इंसानी हवस की भेंट चढ़े, 97 फीसद जंगल नष्ट ! 40 साल से पेड़ लगा रहे राजन ने बदली तस्वीर
Mangrove Forest का संरक्षण पर्यावरण के लिहाज से काफी अहम है। केरल में राजन ने मिसाल कायम की है। Mangrove Forest rajan in kerala planting mangrove since 40 years
Mangrove Forest का संरक्षण पर्यावरण के लिए बहुत जरूरी है। दुष्यंत कुमार का एक बहुत ही प्यारा शेर है; 'कौन कहता है आसमां में सुराख नहीं हो सकता एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारो।' इस शेर में दुष्यंत कुमार ने किसी लक्ष्य को हासिल करने की में एफर्ट की इंटेंसिटी पर बात की है। उन्होंने बताया है कि अगर कोई इंसान सही दिशा में और पूरी शिद्दत से कोशिश करे तो हर टारगेट अचीव किया जा सकता है। भले ही हिंदी भाषाई प्रदेश से मीलों दूर मलयालम भाषा वाले प्रदेश केरल में रहने वाले राजन ने इस शेर को न सुना हो, लेकिन वे मेहनत की महत्ता जानते हैं। उन्होंने अपनी कड़ी मेहनत से दुष्यंत कुमार के शेर को चरितार्थ कर दिखाया है। Mangrove Forest का संरक्षण कर रहे राजन पेशे से मछुआरे हैं। जानिए, इनके पर्यावरण प्रेम और मैंग्रोव की कहानी।

लोगों ने मैंग्रोव राजन रख दिया नाम
केरल के कन्नूर जिले में रहने वाले राजन पर्यावरण संरक्षण के मिशन पर हैं। राजन ने पिछले 40 साल में हजारों मैंग्रोव उगाए हैं। लोगों को जागरूक कर रहे राजन मैंग्रोव से कुछ इस तरीके से जुड़ चुके हैं कि लोगों ने उनका नाम ही मैंग्रोव राजन रख दिया है। मछुआरे के पेशे में होने के कारण राजन नाव से घूमते हैं और आश्चर्यजनक बात ये कि नाव से नाम से घूम-घूम कर उन्होंने पिछले 40 साल में हजारों मैंग्रोव पेड़ उगाए हैं।

मछली पकड़ने के साथ-साथ मैंग्रोव पर भी ध्यान
Mangrove का संरक्षण कर रहे राजन स्थानीय लोगों को भी मैंग्रोव संरक्षण के प्रति जागरूक करते हैं। राजन अपनी दिनचर्या के बारे में बताते हैं कि पयंगड़ी नदी में वे अपनी छोटी सी नाव लेकर निकलते हैं और मछली पकड़ते हैं। बीच-बीच में थोड़ा समय निकालकर मैंग्रोव के पेड़ों को देखते हैं जिन्हें पिछले कई सालों में उन्होंने खुद अपने हाथों से लगाया है। मैंग्रोव की देखभाल कर रहे राजन इसको प्रचारित भी कर रहे हैं।

क्यों जरूरी है मैंग्रोव
स्थानीय लोगों को मैंग्रोव संरक्षण के लिए प्रेरित कर रहे राजन बताते हैं कि मलयालम भाषा में मैंग्रोव को कंडल कहा जाता है। ऐसे में मैंग्रोव से जुड़े होने के कारण लोग उन्हें कंडल राजन भी पुकारते हैं। पर्यावरण संरक्षण के बारे में कहते हैं कि मछुआरा होने के नाते उन्हें हरियाली का महत्व भली-भांति पता है। पिछले कई वर्षों में तमाम लोगों ने पर्यावरण से खिलवाड़ किया है। हरियाली लगातार घटती जा रही है। राजन बताते हैं कि मैंग्रोव मछलियों के अलावा समुद्री और गैर समुद्री प्रजातियों के लिए ब्रीडिंग ग्राउंड भी होता है। यानी मैंग्रोव के होने के कारण मछलियां अच्छी मात्रा में जन्म लेती हैं। इनके अलावा कई और जलचर भी पानी में रिप्रोडक्शन करते हैं।

हवस की भेंट चढ़े मैंग्रोव
राजन बताते हैं कि केरल के कन्नूर में उन्होंने मैंग्रोव की लगभग दो दर्जन प्रजातियां देखी हैं, लेकिन अधिकांश मैंग्रोव इंसानों की हवस की भेंट चढ़ गए। हवस जैसा कठोर शब्द इसलिए क्योंकि तथाकथित तरक्की के नाम पर पर्यावरण से लगातार खिलवाड़ हो रहा है। प्राकृतिक रूप से जिन इलाकों में मैंग्रोव पाए जाते हैं वहां अब मैंग्रोव नहीं दिखाई देते। राजन बताते हैं कि झींगा या धान की खेती के लिए बड़े पैमाने पर मैंग्रोव की कटाई हो रही है।

700 वर्ग किलोमीटर से घटकर 21 पर पहुंचे
राजन की शानदार पहल को देखते हुए कन्नूर के मुख्य वन संरक्षक विनोद कुमार डीजे भी राजन के मुरीद हो चुके हैं। वे बताते हैं कि केरल राज्य में देश के बाकी क्षेत्रों की तुलना में एक छोटे इलाके (लगभग 700 वर्ग किलोमीटर) के दायरे में मैंग्रोव के पेड़ फैले हुए थे। इंसानों ने किस कदर खिलवाड़ किया है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अब Mangrove महज 21 वर्ग किलोमीटर में पाए जाते हैं।

97% मैंग्रोव के जंगल खत्म
बेहिचक कटाई का मतलब यह हुआ कि 97% मैंग्रोव के जंगल खत्म हो चुके हैं और महज 3 फीसद मैंग्रोव बाकी बचा है। विनोद कुमार डीके के मुताबिक पहले आधा हिस्सा सरकारी था और बाकी निजी निवेशकों की पूंजी थी, लेकिन अब केरल में मैंग्रोव की आबादी घटने का प्रमुख कारण अधिकांश हिस्सा निजी हाथों में होना है। संरक्षण मुश्किल बनता जा रहा है।

मैंग्रोव संरक्षण पर बचपन से काम
हालात की गंभीरता भांपते हुए राजन को लगा कि मैंग्रोव बचाने के लिए वे कम से कम इतना तो कर ही सकते हैं, कि जिन इलाकों में संभव हो वहां, घूम घूम कर मैंग्रोव लगाते रहते हैं। भले ही राजन का यह काम उस इलाके में बहुत लोकप्रिय नहीं है, लेकिन राजन बताते हैं कि लगातार घटते मैंग्रोव के संरक्षण के लिए उन्होंने बचपन से ही काम शुरू कर दिया था। वे कहते हैं कि अपनी आंखों के सामने मैंग्रोव के जंगल कम होता देख उन्हें बहुत दुख होता है। ऐसे में वह कोशिश करते हैं कि अधिक से अधिक मैंग्रोव लगा सकें। बकौल राजन अब तक 58 साल की उम्र के दौरान उन्होंने कितने मैंग्रोव लगाएं हैं इसकी गिनती नहीं।

मैंग्रोव से क्लाइमेट चेंज का मुकाबला
गौरतलब है कि इकोसिस्टम को संतुलित रखने में मैंगो काफी अहम भूमिका निभाते हैं। पर्यावरणविदों के मुताबिक क्लाइमेट चेंज का मुकाबला करने में मैंग्रोव बहुत मदद करते हैं। केरल में सदाबहार मैंग्रोव उत्तरी केरल यानी मालाबार में पाए जाते हैं। खास तौर पर मैंग्रोव कन्नूर जिले और कासरगोड जिले में पाए जाते हैं। 97 फीसद मैंग्रोव नष्ट होने के बावजूद तमाम चुनौतियां आईं, लेकिन राजन ने हार नहीं मानी और अपने हिस्से का योगदान करना जारी रखा। वे कहते हैं कि नुकसान रोकना उनके बस में नहीं है लेकिन वह इतना तो सुनिश्चित कर ही सकते हैं कि अधिक से अधिक पौधे लगाए जाएं इसलिए वे बीज या पौधे लगाने के लिए खाली जगहों की तलाश करते हैं।

कौन सा समय मैंग्रोव संरक्षण का
राजन नाव से घूम घूम कर जहां भी संभव होता है मैंग्रोव की रोपाई करते हैं। उनका पेशा मछली पकड़ना जरूर है लेकिन मैंग्रोव के बीज और दलदली जमीन के आसपास पौधे खोजना भी उनका पसंदीदा शौक बन गया है। राजन बताते हैं कि उन्हें जब भी कोई भी पौधा मिलता है तो उन्हें जिंदा रखने के लिए सुरक्षित और बेहतर जगह पर शिफ्ट कर देते हैं। पौधे विकसित हों इसके लिए वे निरंतर उसकी देखभाल करते हैं और मछली पकड़ने के बाद का समय मैंग्रोव संरक्षण का होता है।

मैंग्रोव के लाभ
बेटर इंडिया की रिपोर्ट में राजन के Mangroe Conservation पर एक स्थानीय निवासी रामचंद्रन पटेरी के मुताबिक मैंग्रोव की तलाश में राजन हमेशा घूमते रहते हैं। उसे बचाने के लिए शिद्दत से जुटे हैं। पटेपी बताते हैं कि राजन की कोशिशों का ही नतीजा है कि कन्नूर में बहुत सारे मैंग्रोव के यानी छोटे-छोटे इलाकों में मैंग्रोव देखे जा सकते हैं। मैंग्रोव के लाभ बताते हुए रामचंद्र बताते हैं कि नदी के चारों मैंग्रोव होने के कारण राजन विचलित नहीं हुए। मैंग्रोव की तलाश करते हुए राजन को देखकर ऐसा लगता है मानो उन्होंने अपनी लाइफ मैंग्रोव संरक्षण के लिए उन्होंने संकल्प ले रखा हो।

मैंग्रोव में कई औषधीय गुण भी
तटीय राज्यों में जमीन का कटाव रोकना बड़ी चुनौती होती है ऐसे में केरल जैसे तटवर्ती प्रदेश में मैंग्रोव मृदा अपरदन को रोकने में भी सहायक होते हैं। आंधी, चक्रवात, तूफान और सुनामी जैसी भयंकर प्राकृतिक आपदाओं के दौरान भी मैंग्रोव के पेड़ एक बांध के रूप में काम करते हैं। मिट्टी का कटाव रुकता है। मैंग्रोव में कई औषधीय गुण भी होते हैं, लेकिन कृषि, जलीय कृषि के अलावा निर्माण और विकास परियोजनाओं के नाम पर तमाम फायदों को दरकिनार कर मैंग्रोव का कटाव किया जा रहा है। हालांकि, निजी जमीन के मालिकों को मैंग्रोव बचाने में कोई दिलचस्पी नहीं है, क्योंकि इससे उन्हें प्रत्यक्ष आर्थिक फायदा नहीं दिखाई देता।

कानूनी कार्रवाई आसान नहीं
कन्नूर के मुख्य वन संरक्षक विनोद बताते हैं कि तटवर्ती इलाके के कुछ हिस्सों को कोस्टल रेगुलेटरी जोन यानी (सीआरजेड) के तहत आईडेंटिफाई किया गया है। ऐसे क्षेत्रों के मेंबरों के लिए भी देश में कानून भी है हालांकि इन कानूनों को लागू करना आसान नहीं होता। संरक्षण चुनौतीपूर्ण बताते हुए है वे बताते हैं कि झींगा और धान की खेती को बढ़ावा देने के लिए सरकारी सब्सिडी देती हैं। ऐसे में आर्थिक लाभ लेने की मंशा से जमींदार और खेती करने वाले लोग मैंग्रोव को काट कर फेंक देते हैं।

जंगलों की कटाई रोकने का प्रयास
अगर कोई कानून का उल्लंघन कर मैंग्रोव की सफाई करता है तो राजन आंखें मूंदने या इसकी बजाय सूचना वन विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों को जरूर देते हैं। कई लोग उनके काम पर सवाल भी उठाते हैं। कटाई की सूचना देने पर क्षेत्र के ही कई लोग उनका विरोध भी करते हैं। हालांकि, तमाम चुनौतियों से बेपरवाह राजन ने अपनी जिम्मेदारी भली-भांति समझी है और संरक्षण में लगातार जुटे हुए हैं। वन विभाग को जंगलों और मैंग्रोव कटाई की सूचना मिलती है तो तत्काल हस्तक्षेप कर कटाई रोकी जाती है।

14 साल पहले मिले अवॉर्ड
वन कटाई कर रहे अपराधियों पर पेड़ संरक्षण अधिनियम के तहत कार्रवाई भी होती है। मैंग्रोव और दूसरे पेड़ काटे जाने से भी उन्हें रोका जाता है। बकौल राजन स्कूल क्लब कॉलेज और संगठन से जुड़े कई लोग उनके पास मैंग्रोव के पौधे के लिए संपर्क करते हैं। ऐसे लोगों को पौधे देने के साथ राजन देखभाल की तकनीक भी शेयर करते हैं। उन्होंने वन विभाग के साथ मिलकर मैंग्रोव को लगाने की परियोजनाओं पर उल्लेखनीय काम किया है। हजारों पौधे दिए गए हैं।

असाधारण काम करने वाले राजन
स्कूल कॉलेजों में जाकर राजन मैंग्रोव के संरक्षण पर जागरूकता फैलाने का भागीरथी यत्न कर रहे हैं। बेमिसाल काम कर रहे राजन के प्रयासों के लिए उन्हें 14 साल पहले 2008 में पीवी थम्पी मेमोरियल अवार्ड से नवाजा जा चुका है। यह समाज में असाधारण काम करने वाले लोगों को दिया जाता है। राजन बताते हैं कि मैंग्रोव का संरक्षण उनके लिए कभी आसान नहीं रहा लेकिन अब उन्होंने इसे जीवन का मिशन बना लिया है।
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