New Zealand छोड़ मछली पालक बने युवा अर्नव ने दिखाई कामयाबी की राह, जानिए बिहार के सासाराम की सक्सेस स्टोरी
इंजीनियरिंग की पढ़ाई के बाद क्या कोई मछली पालन का व्यवसाय कर सकता है ? सुनने में यह भले ही अजीब लगे लेकिन ऐसे कई युवा हैं जो खेती-किसानी और मत्स्यपालन में करियर बना रहे हैं। बिहार के रोहतास जिले में ऐसे ही युवा हैं अर्नव
रोहतास, 10 मई : ग्रामीण भारत में आज भी कई ऐसे विकल्प मौजूद हैं, जिसे पेशेवर तरीके अपनाकर आर्थिक समृद्धि हासिल की जा सकती है। इंजीनियरिंग की नौकरी छोड़ने के बाद मछली पालन कर रहे बिहार के युवा अर्नव वत्स फिश फार्मिंग के क्षेत्र में इनोवेटिव तरीकों से सफलता हासिल कर रहे हैं। अर्नव वत्स बताते हैं कि फिश फार्मिंग का रास्ता इतना भी आसान नहीं रहा। शुरुआत में नौकरी छोड़ने के बाद घर वालों को काफी आश्चर्य हुआ था, लेकिन बाद में उन्होंने न्यूजीलैंड की नौकरी छोड़ने का फैसला स्वीकार कर लिया। लाखों रुपये की नौकरी छोड़ने के बाद बिहार में मछलीपालन (Bihar Fish Farming) कर रहे युवा मत्स्यपालक अर्नव वत्स (Arnav Vatsa) न्यूजीलैंड के ऑकलैंड शहर में रहते थे।
बिहार के रोहतास जिले में रहने वाले अर्नव विदेश की आकर्षक नौकरी छोड़ भारत लौटने के कारण पर कहते हैं कि गांव से जुड़ाव के कारण उन्होंने रोहतास में फिश फार्मिंग करने का फैसला लिया। बता दें कि अर्नव वत्स सासाराम के सोनबरसा में रहते हैं। अपनी शुरुआती लाइफ के बारे में अर्नव बताते हैं कि उन्होंने 2004 में बनारस से स्कूलिंग की। बीटेक (मैकेनिकल) की पढ़ाई करने तमिलनाडु के वीआईटी वेल्लोर गए। बैचलर डिग्री के बाद दो-ढाई साल तक चेन्नई, बेंगलुरु और हैदराबाद की कुछ कंपनियों में काम किया। उन्होंने नौकरी छोड़ने के फैसले पर कहा कि किसी भी बॉस के अंडर काम करना पसंद नहीं आया, इसलिए रोहतास लौट आए। अर्नव ने कहा कि राइस मिल में कुछ दिन काम करने के बाद उन्होंने न्यूजीलैंड में मास्टर्स डिग्री के कोर्स का आवेदन किया। न्यूजीलैंड में भी लगभग एक साल नौकरी की, लेकिन गांव से जुड़ाव के कारण 2018 में पॉल्ट्री (चिकेन / ब्रॉयलर) का बिजनेस शुरू करने की योजना के साथ रोहतास लौट आया। अभी गत लगभग 4 साल से मत्स्यपालन कर लाखों का मुनाफा कमा रहे हैं।

कम पैसों का निवेश, रिटर्न भी अच्छा
अर्नव वत्स ने बताया कि मास्टर्स की पढ़ाई के लिए उन्होंने न्यूजीलैंड जाने का फैसला लिया। पढ़ाई के बाद नौकरी की लेकिन मजा नहीं आया। गांव से जुड़ाव के बारे में अर्नव वत्स बताते हैं कि उन्हें माता-पिता का साथ छूटने को लेकर चिंता हो रही थी, ऐसे में उन्होंने रोहतास के सोनबरसा में पॉल्ट्री का बिजनेस करने का फैसला लिया। उन्होंने कहा कि पहले 20 हजार मुर्गियों के साथ ब्रॉयलर फार्म बनाने की योजना थी, लेकिन फिशरीज से जुड़े दो लोगों के संपर्क में आने के बाद मछलीपालन की शुरुआत की। अर्नव वत्स बताते हैं कि मुर्गीपालन से तुलना करने पर मत्स्यपालन में निवेश कम है और रिटर्न भी अच्छा मिलता है।

कोलकाता से मंगवाते हैं मछली
मत्स्यपालन में अन्य लोगों के योगदान के संबंध में अर्नव बताते हैं कि रोहतास में मछलियों के लिए चारा मुहैया करा रहे वीर बहादुर सिंह और फिशरीज डिपार्टमेंट के डिप्टी डायरेक्टर फारूकी से मुलाकात के बाद वे फिशरीज से जुड़ने के लिए प्रेरित हुए। अर्नव ने बताया कि वे जमीन पर बनवाए 14 तालाबों में मत्स्यपालन कर रहे हैं। पहले स्टेप के बारे में उन्होंने कहा कि मछलियों के छोटे बच्चों को कोलकाता से मंगवाते हैं, जिसे मछली का बीज भी कहा जाता है। शुरुआत में छोटे तालाब में रखी जाने वाली मछली का वजन 1-2 ग्राम होता है। वजन 10 ग्राम हो जाने के बाद इन मछलियों को थोड़े बड़े तालाब में डाला जाता है।

शुरुआत में मुफ्त में खिलाई मछली
मछलियों के प्रकार के बारे में अर्नव बताते हैं कि दुनिया में सबसे अधिक तिलापिया मछली खाई जाती है, लेकिन बिहार में इतनी लोकप्रिय नहीं है। उन्होंने कहा कि वे छत्तीसगढ़ से तिलापिया मछली मंगवाकर फिश फार्मिंग कर रहे हैं। शुरुआत में उन्होंने तिलापिया मछली लोगों को मुफ्त में खिलाई, जिससे उनका टेस्ट डेवलप किया जा सके। फिश कल्चर के बारे में अर्नव ने बताया कि आम तौर से फिश फार्मिंग भी कहा जाता है लेकिन छोटी मछलियों के वयस्क होने की प्रक्रिया को कल्चर कहा जाता है।

पहले ही साल में 30 लाख का मुनाफा !
निवेश के बारे में अर्नव बताते हैं कि उन्होंने काफी बड़े इलाके में मछली पालन का पेशा शुरू किया है। 6 बीघा जमीन में तालाब बनाने का कंस्ट्रक्शन कॉस्ट लगभग 7 लाख रुपये आया। मशीनों को लगाने की लागत के बारे में अर्नव ने बताया कि उन्हें लगभग तीन लाख रुपये इक्विपमेंट पर खर्च करने पड़े। पहली बार फिश की सीड कॉस्ट (मछली का बच्चा) के बारे में अर्नव ने बताया कि एक 1-1.5 रुपये में एक बच्चा मिलता था, उन्होंने 25 हजार मछली के बच्चे मंगवाए थे। इनके खाने पर लगभग 12-13 लाख का खर्च हुआ। छह बीघा जमीन पर फिश फार्मिंग के बाद पहली बार तीन कल्चर किया। उन्होंने बताया कि पहले साल में 21-22 लाख रुपये के निवेश के बाद उन्होंने लगभग 30 लाख रुपये का मुनाफा कमाया।

शुरुआत में करीब 21-22 लाख का निवेश
न्यूजीलैंड के ऑकलैंड शहर में रहने के दौरान होने वाली आमदनी और बचत के बारे में अर्नव वत्स बताते हैं कि शहर काफी महंगा होने के कारण वे 1-1.5 लाख रुपये प्रतिमाह की बचत कर पाते थे। हालांकि, उन्होंने कहा कि महंगाई के लिहाज से ये रकम पर्याप्त नहीं थी। लाखों की नौकरी छोड़ने के बाद मछली पालन से जुड़ने की चाह और आर्थिक जोखिम के बारे में अर्नव वत्स ने बताया कि जिनके पास अपनी जमीन नहीं है, वैसे लोग लीज पर जमीन लेकर भी मछली पालन का व्यवसाय कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि छह बीघा (चार एकड़) के आधार के अनुमान के मुताबिक वे बता सकते हैं कि पहली बार में 20 लाख का खर्च करने के बाद हर साल 15-16 लाख रुपये का खर्च आया। उन्होंने अपनी पद्धति के बारे में बताया कि बड़े-छोटे मछली के बच्चों की कल्चर साथ-साथ करते हैं, इसलिए उनका खर्च अधिक होता है, लेकिन छोटे पैमाने पर कम लागत में भी शुरुआत की जा सकती है।

पैसों की चिंता नहीं, सरकार से मिलती है सब्सिडी
बिहार के आधार पर मछलीपालन की प्रक्रिया शुरू करने का पूरा प्रोसेस समझाते हुए अर्नव ने बताया कि कम से कम 10 साल की लीज होने पर सरकार सब्सिडी भी देती है। अपनी जमीन होने पर, इलाके का नक्शा, अपनी जमीन का नक्शा और लैंड पॉजेशन सर्टिफिकेट के साथ फिशरीज डिपार्टमेंट में आवेदन देना होता है। आवेदन की समीक्षा के बाद मत्स्यपालन विभाग की ओर से तलाब बनाने का आदेश जारी होता है। आर्थिक पहलू के बारे में उन्होंने बताया कि सरकार 40 फीसद सब्सिडी देती है। तालाब खुदवाने के बाद सरकार की ओर से पैसे मिलते हैं। उन्होंने बताया कि एक हेक्टेयर का प्रोजेक्ट 7 लाख रुपये का है, इसका 40 फीसदी सरकार की फिशरीज डिपार्टमेंट से मिलता है।
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