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अब गधा, गधा नहीं रहा बैल बन गया

Donkey working with farmer in field
हिसार (रविंद्र सिंह)। कोई काम नहीं कर पाने या कुछ समझ नहीं आने पर सीधी झिड़कियां मिलती हैं- "गधे हो क्‍या, गधे कहीं के, गधों जैसा काम मत करो...।" शायद भविष्‍य में लोग ऐसा बोलना बंद कर देंगे, क्‍योंकि हरियाणा के गधों ने अब अपना लाइफस्‍टाइल बदल दिया है। असल में अब ये मेहनतकश बैल के समान काम करने लगे हैं। हम कोई मजाक नहीं कर रहे, यह बात सत्‍य है।

हिसार में गधा अब अपने काम से न केवल किसानों को संतुष्ट करेगा, बल्कि कृषि कार्य में होने वाला अपव्यय भी काफी हद तक बचा सकेगा। देसी गधे खेतों में बैलों की तरह ही किसानों के लिए बहुपयोगी साबित हो सकते हैं जिससे किसानों को कम लागत में अधिक आर्थिक लाभ होगा।

यह सामने आया है भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) से सम्बद्ध राष्ट्रीय अश्व अनुसंधान केन्द्र हिसार के बीकानेर क्षेत्रीय केंद्र के वैज्ञानिकों द्वारा देसी गधों की क्षमता पर किए गए शोध से। केंद्र के वैज्ञानिकों का मानना है कि गधों में बोझ उठाने की क्षमता, बिना रुके काम करने की क्षमता, एक-एक घंटे के अंतराल में खेत जोतने की क्षमता तथा सामान से लदी गाड़ी को बखूबी खींचने की क्षमता है।

ऐसे में छोटे किसानों के लिए ये बेहद लाभकारी साबित हो सकते हैं। गुजरात के सीमावर्ती इलाकों व राजस्थान के किसानों ने इस तकनीक को अपनाया है जिसके वहां सकारात्मक परिणाम देखने को मिले हैं। शोध के तहत वैज्ञानिकों का कहना है कि इस केन्द्र द्वारा विकसित तकनीक से किसानों को यह मदद मिलेगी कि गधों पर पडऩे वाला अतिरिक्त बोझ कम किया जाएगा, जिससे उनकी जिन्दगी ज्यादा लम्बी होगी और वे घातक चोटों से भी बच सकेंगे।

गधों को दिया जाएगा प्रशिक्षण

गधों की खेत जोतने की क्षमता को देखते हुए अकेले खेत में जोते जाने के लिए उपयुक्त हल तैयार कर देसी गधों को खेत जोतने का प्रशिक्षण दिया गया। उन्हें दो घंटे के काम के बाद दो घंटे का आराम दिया गया। गधों ने इन चार घंटों में औसतन 0.146 हेक्टेयर खेत जोता। जिससे उनकी औसत रफ्तार 1.835 किलो मीटर प्रति घंटे की रही।

शोध के अनुसार वैज्ञानिकों ने औसत स्वास्थ्य वाले गधों के वजन, ऊंचाई और क्षमता के मानक निर्धारित किए हैं और किसानों को सुझाव दिया है कि वे गधों से कितना काम लें जिससे उनकी वजन उठाने, गाड़ी खींचने और खेत जोतने की उपयुक्त क्षमता के उपयोग के साथ ही वे दीर्घजीवी होकर किसान को अधिक आर्थिक लाभ दे सकें।

इससे बहुपयोगी गधे छोटे किसानों के लिए बहुत उपयोगी व लाभदायक हो सकते हैं जिनसे उनकी मांग और अंतत: आबादी भी बढ़ेगी। शोध के तहत वैज्ञानिक गधों के लिए विशेष हल, जीन और गाडिय़ां डिजाइन कर रहे हैं ताकि उनकी क्षमता का ठीक से उपयोग हो सके। वैज्ञानिकों के अनुसार बैल अपने कंधों के बल पर खेत जोतते हैं या गाड़ी खींचते हैं परन्तु गधे अपनी छाती से वजन खींचते हैं। इसलिए ऐसे उपकरण बनाए जा रहे हैं जिनसे गधे ज्यादा दक्षता से काम कर किसानों को अधिक लाभ दे सकें।

गुजरात के सीमावर्ती इलाकों में गधे खेत की जुताई में इस्तेमाल किए जाते हैं और राजस्थान में वे गाड़ी भी खींचते हैं, परन्तु उनके हल और गाडिय़ां पुराने डिजाइन की हैं जिनसे पशु पर अनावश्यक बोझ पड़ता है। गधों पर किए गए प्रयोगों के संबंध में केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. यशपाल के अनुसार पशु पर उसके वजन के 20 से 30 प्रतिशत तक ही भार डालना ही बेहतर है जिससे वह छह घंटे तक काम कर सकता है।

प्रयोगों के आधार पर वे अपने भार के 50 प्रतिशत हिस्से तक का भार उठा सकते हैं परन्तु सिर्फ 2-3 घंटों तक। उसके बाद उन्हें एक घंटे के विश्राम की जरूरत होती है। पीठ पर बोझा उठाने वाले गधों के लिए एक घंटे के काम के बाद एक घंटे के विश्राम और फिर काम व विश्राम का यह क्रम 10 घंटों तक जारी रखा जा सकता है। यह भार उसकी पीठ के दोनों तरफ बराबर वितरित किया जाना चाहिए।

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