China Wheat Crop : गेहूं की फसल इतिहास में सबसे खराब ! वैश्विक भूख संकट की आशंका
चीन में खेती की नीतियों को विनाशकारी बताया जाता है। 1960 के दशक की शुरुआत में लाखों लोग अकाल से मर गए थे। अब एक बार फिर चीन के गेहूं को लेकर आशंका गहरा रही है। पढ़िए रिपोर्ट
नई दिल्ली, 19 मई : रूस और यूक्रेन की लड़ाई विगत 24 फरवरी को शुरू हुई थी। इसके 74 दिनों के बाद भारत ने गेहूं एक्सपोर्ट पर बैन लगाया तो कई देशों की ओर से चिंता जताई गई। हालांकि, एक चौंकाने वाले रिएक्शन में चीन ने भारत के फैसले का समर्थन किया। इसी बीच एक रिपोर्ट में कहा जा रहा है कि कोरोना महामारी से जूझ रही ग्लोबल इकोनॉमी के लिए चीन में गेहूं उत्पादन पर मंडराते अनिश्चितता के बादल बड़ी चिंता का कारण बन सकते हैं। ऐसा क्या है जिसके कारण चीन में उपजने वाले गेहूं के कारण वैश्विक अर्थव्यवस्था को चिंता करने की जरूरत है। इस रिपोर्ट में जानिए

दरअसल, कृषि और उपभोक्ता मामलों के जानकारों की राय में यूक्रेन में रूस की विशेष सैन्य कार्रवाई के बीच खाद्यान्न संकट गहरा रहा है। इसके अलावा कई अन्य कारक भी हैं, जिसके कारण खाने-पीने की चीजें, मसलन तेल और गेहूं-चावल जैसे अनाज महंगे होते जा रहे हैं। रूस और यूक्रेन का असर इसलिए हो रहा है क्योंकि ग्लोबल गेहूं व्यापार का लगभग 30 फीसद इन्हीं दोनों देशों से होता है। यूक्रेन में रूस के मिलिट्री ऑपरेशन के कारण गेहूं की कीमतें आसमान छू रही हैं। खाद्य तेल की कीमतों में भी आग लगी है। गौरतलब है कि रूस में बड़ी मात्रा में उर्वरक का उत्पादन होता है, जो फसलों की खेती में जरूरी हैं। ऐसे में महंगाई का एक कारण रूस पर लगाई गई पाबंदियां और अन्य देशों की सख्ती भी है।
गेहूं चीन में बाढ़ के कारण प्रभावित ?
इन सबके बीच न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक चीन में जाड़े के मौसम में बोई गई गेहूं की फसल खराब होने की आशंका है। चीन में आई बाढ़ के कारण कई इलाकों में पानी भरा है। जलमग्न खेतों के कारण गेहूं की पैदावार प्रभावित होगी। न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के अलावा चीन में खेतीबाड़ी से जुड़े 45 वर्षीय रेन रुइक्सिया (Ren Ruixia) ने भी माना है कि चीन में गेहूं की पैदावार प्रभावित हो सकती है। कारण बताते हुए रेन कहते हैं कि चीनी सरकार ने कोरोना वायरस का प्रसार रोकने के लिए लॉकडाउन लगाया। इस कारण उर्वरकों के आने में देरी हुई है।
इसके अलावा चीन में कई कड़े नियमों ने भी कहर बरपाया है। इनमें एक नियम खेती के लिए कई एकड़ जमीन का राष्ट्रीय लक्ष्य बनाना था। इन नियमों के तहत चीन के क्षेत्रफल का बड़ा हिस्सा खेती के लिए रिजर्व रखा जाता है। जितनी जमीन पर खेती का नियम है उसका क्षेत्रफर अमेरिकी शहर टेक्सास से भी बड़ा है। 4,63,000 वर्ग मील में खेती के राष्ट्रीय लक्ष्य वाले इस नियम के कारण ग्रामीण इलाकों में कई बार बुलडोजर चलाए जाते हैं।
गेहूं का खराब भंडारण, अनाज उपलब्धता पर संकट
खेती को लेकर चीन की पॉलिसी के संबंध में जोसेफ डब्ल्यू ग्लौबर (Joseph W. Glauber) का मानना है कि चीन के पास आपात स्थिति के लिए गेहूं का बड़ा भंडार है, लेकिन खराब भंडारण के कारण कुछ गेहूं केवल जानवरों के लिए इस्तेमाल होंगे। ग्लौबर अमेरिका के वॉशिंगटन स्थित अंतरराष्ट्रीय खाद्य नीति अनुसंधान संस्थान में सीनियर रिसर्च फेलो हैं।
दुनियाभर से गेहूं खरीद सकता है चीन
चीन के जिलिन प्रांत में लगाए गए कोविड-19 लॉकडाउन ने आग में घी का काम किया। परिवारों को खाने-पीने के सामान खरीदने के लिए अपार्टमेंट से निकलने नहीं दिया जा रहा। लोग पर्याप्त भोजन के लिए संघर्ष कर रहे हैं। ऐसे में चीन की अपने खाद्य भंडार के बारे में घबराहट वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में भी हड़कंप मचा सकती है। न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक चीन के पास दुनिया का सबसे बड़ा विदेशी मुद्रा भंडार है। ऐसे में दुनिया के बाजारों में उपलब्ध गेहूं चीन आसानी से खरीद सकता है, लेकिन चीन के ऐसा करने पर गेहूं की कीमत बढ़ने की आशंका है। कई गरीब देशों की इकोनॉमी देखते हुए कहना गलत नहीं होगा कि गेहूं की कीमतें बढ़ाना जनहित में नहीं है। युद्धग्रस्त यूक्रेन में बंदरगाहों पर आवाजाही बंद होने के कारण अनाज की खेप एक्सपोर्ट नहीं हो रही। यूक्रेन को यूरोप के 'ब्रेडबास्केट' के रूप में जाना जाता है। ऐसे में गेहूं जैसे जरूरी अनाज की कमी के कारण "वैश्विक भूख संकट" जैसी गंभीर चिंता पैदा हो रही है।
पूंजी बाजार में खिलाड़ियों का खेल
दैनिक ट्रिब्यून में छपे कृषि मामलों के जानकार देविंदर शर्मा के आलेख के मुताबिक फूड सिक्योरिटी को विश्वसनीय बनाने के लिए गरीब देशों को खुद का अनाज उपजाने की तैयारी करनी होगी। उन्होंने दो टूक कहा कि बड़ी पूंजी के खिलाड़ी बाजार में वर्चस्व बनाने की ताक में हैं। देविंदर शर्मा ने अमेरिकी टीवी चैनल की रिपोर्ट के हवाले से बताया कि ऐसे समय, जब दुनिया में करोड़ों लोग भूखे सोने पर मजबूर हैं, सट्टेबाजी के कारण कृषि उत्पाद कंपनियां जमकर मुनाफा कमा रही हैं। वैश्विक खाद्य उत्पाद में कोई कमी नहीं आई है। फिर भी महंगाई बढ़ रही है, खाद्य कंपनियां प्रॉफिट में हैं। शर्मा की इस बात पर भारत से रिकॉर्ड गेहूं एक्सपोर्ट का प्रमाण देना गलत नहीं होगा। भारत में हुई शानदार फसल के बाद जमकर निर्यात किया गया।
चीन पर निर्भर देशों में गंभीर खाद्य संकट !
खाद्य और कृषि मामलों के जानकार देविंदर शर्मा के मुताबिक खाने-पीने की चीजों का महंगा होना युद्ध, पर्यावरण में बदलाव और गरीबी के अलावा सट्टेबाजों के वायदा व्यापार से प्रभावित होता है, लेकिन एक फैक्टर को नजरअंदाज किया जाता है। ये फैक्टर पर इंपोर्ट पर निर्भर होना। शर्मा कहते हैं कि गरीब देश आयात पर डिपेंड रहने के कारण गरीब देशों में गंभीर संकट है। उन्होंने उदाहरण के लिए 30 देशों में भेजे जाने वाले रूस और यूक्रेन के गेहूं का जिक्र कर कहा कि कई देश खुद को अनाज उत्पादन के मामले में आत्मनिर्भर बना सकते थे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ और वर्तमाना हालात से सबक सीखने की जरूरत है। शर्मा के अनुभव के आधार पर कहना गलत नहीं होगा कि गेहूं के मामले में चीन पर निर्भर देशों में गंभीर खाद्य संकट पैदा हो सकता है।
क्यों इतना जरूरी है गेहूं
दुनिया भर में गेहूं की खेती बड़े पैमाने पर होती है। मुख्य भोजन के रूप में इस्तेमाल होने वाला ये अनाज करोड़ों घरों में उपभोग किया जाता है। गेहूं की खेती नकदी फसल (cash crop) के रूप में होती है। ऐसा इसलिए क्योंकि बड़े भूभाग पर गेहूं की रोपाई के बाद किसानों को अच्छी उपज मिलती है। गेहूं के आटे के अलावा इससे ब्रेड, पास्ता, दलिया, पेस्ट्री, कुकीज़,मफिन, टॉर्टिला जैसे उत्पाद बनाए जाते हैं। दुनियाभर में बड़ी आबादी इन चीजों को खाना पसंद करती है।
कैसी जमीन पर होती है गेहूं की खेती
गेहूं को अलग-अलग जमीन और जलवायु में उगाया जा सकता है। गेहूं फसल को प्रोसेसिंग की भी जरूरत होती है। पिसे हुए गेहूं का लगभग तीन-चौथाई आटा बनता है। गेहूं का उपयोग स्टार्च, माल्ट, डेक्सट्रोज, ग्लूटेन, अल्कोहल और अन्य चीजों के उत्पादन में भी होता है। गेहूं में प्रोटीन लगभग 13 फीसद होता है। हम इंसानों के भोजन में वनस्पति प्रोटीन का प्रमुख स्रोत होने के अलावा गेहूं कार्बोहाइड्रेट का भी अहम सोर्स है। साबुत अनाज के रूप में गेहूं फाइबर (dietary fiber) और अन्य पोषक तत्वों का भी स्रोत है।
गेहूं खाने से परेशानी !
गेहूं में ग्लूटेन (gluten) नाम का प्रोटीन भी होता है। इससे वैसे लोगों की छोटी आंतों को नुकसान होने की आशंका होती है, जिन्हें सीलिएक (Celiac) रोग, जेनेटिक प्रतिरक्षा विकार (genetic immune disorder) की प्रॉब्लम हो। ग्लूटेन से एलर्जी के अलावा कई अन्य स्वास्थ्य संबंधी परेशानी भी हो सकती है।
गेहूं का ग्लोबल प्रोडक्शन
दुनियाभर में मक्का के बाद गेहूं सबसे पैदा होता है। दूसरे सभी फसलों की तुलना में गेहूं का बिजनेस अधिक है। स्वतंत्र संगठन- वर्ल्ड पॉपुलेशन रिव्यू (World Population Review) की रिपोर्ट के मुताबिक साल 2020 में गेहूं का कुल वैश्विक उत्पादन लगभग 760 मिलियन टन रहा था। चीन, भारत और रूस दुनिया के तीन सबसे बड़े गेहूं उत्पादक हैं। इन तीन देशों में दुनिया का लगभग 41 फीसद गेहूं पैदा होता है। अमेरिका दुनिया का चौथा सबसे बड़ा गेहूं उत्पादक है। चीन के बाद भारत, रूस, अमेरिका और कनाडा का नंबर आता है। टॉप पांच गेहूं उत्पादकों पर एक नजर-
- चीन- 13,42,54,710 टन
- भारत- 10,75,90,000 टन
- रूस- 8,58,96,326 टन
- अमेरिका- 4,96,90,680 टन
- कनाडा- 3,51,83,000 टन
गेहूं पर UN की संस्था की रिपोर्ट
दुनिया की शीर्ष इकाई संयुक्त राष्ट्र की संस्था- फूड एंड एग्रीकल्चर ऑर्गनाइजेशन ऑफ यूनाइटेड नेशंस (UNFAO) की स्टैटिस्टिकल ईयर बुक 2021 में प्रकाशित आंकड़ों के मुताबिक साल 2019 में कुल वैश्विक उत्पादन का आधा हिस्सा चार प्राइमरी फसल रहे। FAO की प्राइमरी फसलों की कैटेगरी में गन्ना (21 प्रतिशत ) मक्का 12 फीसद, चावल 8 प्रतिशत, गेहूं 8 प्रतिशत पैदा हुआ। मात्रा के मामले में गन्ने का उत्पादन 1.9 बिलियन टन हुआ, जबकि मक्क 1.1 अरब टन पैदा हुआ। चावल 0.8 बिलियन टन और गेहूं 0.8 अरब टन पैदा हुआ।
रूस से गेहूं निर्यात सबसे अधिक
FAO की रिपोर्ट-वर्ल्ड फूड एंड एग्रीकल्चर 2021 के मुताबिक रूस गेहूं का सबसे बड़ा निर्यातक है जबकि अमेरिका और कनाडा दूसरे और तीसरे नंबर पर हैं। इस रिपोर्ट के मुताबिक साल 2019 में एशिया में 3,37,890 टन गेहूं का उत्पादन हुआ था, जबकि एशिया से 6 218.9 टन गेहूं एक्सपोर्ट हुआ।
गेहूं पर भारत के बैन का असर
भारत सरकार का अनुमान है कि चालू वित्त वर्ष में (अप्रैल 2022 से मार्च 2023 तक) लगभग 45 लाख मीट्रिक टन गेहूं का निर्यात होगा, क्योंकि कॉन्ट्रैक्ट पहले ही किया जा चुका है। अप्रैल 2022 में 14.63 लाख मीट्रिक टन गेहूं एक्सपोर्ट किया गया। गेहूं निर्यात पर भारत की पाबंदी के फैसले को लेकर सात देशों के समूह (जी-7) ने भी निराशा जाहिर की थी। भारत सरकार ने अपने फैसले का बचाव करते हुए कहा कि प्रतिबंध अनिवार्य रूप से मूल्य वृद्धि के मद्देनजर था। वहीं, रिसर्च एजेंसियों के मुताबिक, भारत सरकार द्वारा गेहूं निर्यात पर प्रतिबंध लगाने का सबसे ज्यादा असर विकासशील देशों पर होगा। प्रतिबंध के बाद एक नोट में नोमुरा ग्लोबल मार्केट्स रिसर्च ने बताया कि, भारत और ऑस्ट्रेलिया को छोड़कर, ज्यादातर एशियाई देश गेहूं इंपोर्ट करते हैं। वैश्विक स्तर पर गेहूं की ऊंची कीमतों के कारण बड़ी आबादी प्रभावित हो सकती है। नोमुरा के मुताबिक सबसे बड़े आयातक होने के कारण बांग्लादेश को अधिक खामियाजा भुगतना पड़ सकता है। जिन देशों को गेहूं खरीदना है, उन्हें सीधे भारत सरकार से संपर्क करना होगा, उन देशों में बिजनेस कर रही प्राइवेट कंपनियों पर अंकुश लगेगा। सरकार का मानना है कि इससे जरूरतमंद देशों तक गेहूं पहुंचाया जा सकेगा और महंगाई पर भी लगाम लगेगी।
भारत को चीन का समर्थन !
गेहूं की उपलब्धता को लेकर आशंकाओं से घिरे चीन ने भारत से गेहूं एक्सपोर्ट बैन पर कहा था कि भारत को दोष देने से खाद्य समस्या का समाधान नहीं होगा। ग्लोबल टाइम्स में छपे बयान के मुताबिक चीन ने सवाल किया था कि जी-7 देशों का समूह अपने एक्सपोर्ट को बढ़ाने पर विचार क्यों नहीं करते ? चीन के बयान के मुताबिक वैश्विक खाद्य संकट से निपटने में जी-7 देशों का प्रयास सराहनीय है, लेकिन उन्हें भारत या किसी अन्य विकासशील देश की आलोचना नहीं करनी चाहिए।












Click it and Unblock the Notifications