Success Story: बैंक की नौकरी छोड़ खेत में पसीना बहा रहे युवा अमित, 3000 महिलाओं को भी मिली ताकत
Banker Turned Farmer सुनने में भले ही चौंकाने वाली बात लगे, लेकिन इसे हकीकत में बदलने का पराक्रम 33 साल के युवा अमित किशन ने कर दिखाया है। इतना ही नहीं इस पहल से 3000 महिलाओं का सशक्तिकरण भी हुआ है।
बैंक की मोटी तन्ख्वाह और एसी चैंबर की सुविधा ठुकराकर खेतों में उतरने का फैसला करने वाले अमित ने बॉलीवुड फिल्म के बहुचर्चित डायलॉग- 'कामयाबी झक मारकर पीछे आएगी।' को चरितार्थ कर दिखाया है।

आंध्र प्रदेश के Penukonda में नैचुरल फार्मिंग कर रहे अमित किशन पशुपालन भी करते हैं। उन्होंने Hebbevu नाम की फार्मलैंड मैनेजमेंट फर्म की शुरुआत भी की है। 21 करोड़ के टर्नओवर वाली फर्म से कमाई के साथ-साथ अमित ने हजारों महिलाओं को भी जोड़ा है।
अमित किशन ने प्राकृतिक खेती करने के लिए अपना बैंकिंग करियर छोड़ दिया और हेब्बुवु फार्म शुरू किया। यहां किसान केवल स्वदेशी बीज बोते हैं। खेती को व्यवसाय बना चुके अमित बताते हैं कि उनके फर्म का सालाना टर्नओवर लगभग 21 करोड़ रुपये है। साथ ही हजारों महिलाओं को आजीविका भी मिल रही है।
स्वदेशी खेती के क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव के अगुआ अमित पारंपरिक खेती की तरह खेतों की जुताई के लिए बैलों का इस्तेमाल करते हैं। खेती के साथ पशुपालन कर रहे अमित बताते हैं कि उनके फार्म पर गायें प्रदूषण मुक्त माहौल और खुले घास के मैदानों में चरती हैं।
ग्रामीण महिलाएं गर्म मिट्टी के बर्तन में शुद्ध घी तैयार करती हैं। रसायन युक्त भोजन से तंग आकर 33 वर्षीय अमित ने खेती के पारंपरिक तरीकों की ओर रुख किया। प्राकृतिक खेती में क्रांति लाने के लिए उन्होंने बेंगलुरु में बैंकिंग सेक्टर की कॉर्पोरेट जॉब छोड़ दी।
अमित ग्राहकों को ऑर्गेनिक और ताजी सब्जियों के साथ-साथ दालें और डेयरी उत्पाद उपलब्ध करा रहे हैं। पारंपरिक खेती के तरीकों पर भरोसा करते हुए अमित अपने खेतों में प्लास्टिक, रसायनों और ट्रैक्टरों के इस्तेमाल से बचते हैं।
आंध्र प्रदेश के पेनुकोंडा निवासी अमित अपने आइडिया के बारे में कहते हैं कि खेती ऐसे तरीके से होनी चाहिए जिसमें पर्यावरण को कम से कम नुकसान हो। द बेटर इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, अमित पिछले चार साल से जीरो बजट खेती कर रहे हैं। सब कुछ प्राकृतिक तरीके से उगाने में कामयाबी भी मिली है।
साथ ही रासायनिक उर्वरकों का उपयोग नहीं करने के कारण मिट्टी की पैदावार क्षमता लंबे समय तक सुरक्षित रहती है। अमित के खेतों में देसी गाय के गोबर और गोमूत्र का इस्तेमाल होता है। जुताई और तेल उत्पादन के लिए बैल का उपयोग किया जाता है।
बैंगन और मूंगफली की देशी किस्मों से लेकर गंगाभवानी नारियल, सफेद चने और तूर (अरहर), मूंग (हरा चना), उड़द (काला चना) जैसी दालों की खेती अमित किशन के खेतों की खासियत है। डेयरी उत्पादों और सब्जियों के अलावा अमित लगभग 40 प्रकार के खाद्यान्न और सब्जियां उगाते हैं।
हर दिन लगभग छह टन सब्जियां और 1,500 लीटर दूध बेचने वाले अमित ने बेंगलुरु में एक स्टोर ओपन किया है। अपनी वेबसाइट के माध्यम से 3 लाख से अधिक ग्राहकों तक पहुंच चुके अमित प्रतिदिन लगभग 1,800 ग्राहकों को सेवाएं प्रदान करते हैं।
3,000 ग्रामीण महिलाओं को स्वावलंबी बना रहे अमित बताते हैं कि 120 लोगों की कोर टीम के अलावा, ग्रामीण महिलाएं उनके फर्म का अहम हिस्सा हैं। अब तक, उन्होंने चिन्नामंथूर, मावुतुर, पेद्दामंथुरु, रोड्डम और मदाकासिरा सहित आसपास के 18 गांवों की 3,000 से अधिक महिलाओं को रोजगार प्रदान किया है।
उन्होंने बताया कि घी, पनीर और अन्य डेयरी उत्पाद बनाने के लिए प्रत्येक महिला को हर दिन 25 लीटर दूध दिया जाता है। A2 देसी गाय के दूध से बिलोना घी तैयार होता है। प्रत्येक किलोग्राम उत्पाद से गांव की महिला को सीधे रोजगार का अवसर मिलता है।
मावातुरू गांव की गोविंदम्मा पिछले तीन साल से अमित के साथ काम कर रही हैं। 48 वर्षीय विधवा माँ गोविंदम्मा पहले दिहाड़ी मजदूर के रूप में संघर्ष कर रही थीं। महीने में केवल 12 दिन काम मिलता था, जिससे 200-300 रुपये रोज की कमाई होती थी।
पति की मृत्यु के बाद अमित के फर्म से जुड़ीं गोविंदम्मा प्रति माह 15,000 रुपये तक की नियमित आय अर्जित कर रही हैं। इससे चार लोगों का परिवार चल रहा है। इतना ही नहीं उन्होंने खुद का एक घर भी बना डाला।
ग्रामीण महिलाओं के सशक्तिकरण पर अमित का मानना है कि किसान बनने का उनका निर्णय सबसे अच्छा रहा है। इंडिया की सिलिकॉन वैली कहे जाने वाले बेंगलुरु में सुबह 8 बजे काम के लिए निकलना होता था। प्रदूषण में भाग दौड़ और 12 घंटों की मशक्कत के बाद शाम 8 बजे तक वापस लौटना। भोजन में अधिकांश बर्गर खाते थे।
बेंगलुरु की लाइफ की तुलना में अब आंध्र प्रदेश के गांव में स्लो लेकिन शांतिपूर्ण जीवन और अपने परिवार के साथ क्वालिटी टाइम बिताना अमित को सुकून देता है। उन्होंने कहा, अब जब खाने की इच्छा होती है, हम सीधे पेड़ से फल तोड़ते हैं। बेंगलुरु में दूसरों के लिए काम करना पड़ता था। खुद को थकाता था। आंध्र प्रदेश लौटने पर अपने और अपने गांव के लिए काम करने की खुशी है।
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