ईरान में UP के लखीमपुर खीरी वाले केले की डिमांड, गन्ने की जगह Banana Farming कर रहे किसान
उत्तर प्रदेश में गन्ना किसान अब केले की खेती का ऑप्शन चुन रहे हैं। इन गन्ना किसानों के सामने परेशानी फसल के बाद की कमाई का है। किसानों का कहना है कि गन्ने की फसल के बाद भुगतान में देरी के कारण बनाना फार्मिंग शुरू की है।
लखीमपुर खीरी (उत्तर प्रदेश), 16 मई : किसानों की भूमिका को कम आंकने वाले लोगों के लिए लखीमपुर खीरी के अन्नदाता प्रतिकार का शानदार उदाहरण हैं। गन्ना उपजाने वाले इन किसानों की जेब कभी भी समय से नहीं भरी गई। ऐसे में इन किसानों ने गन्ने के बदले केले की खेती शुरू कर दी। लखीमपुर खीरी के केले की लोकप्रियता का आलम ऐसा कि पिछले साल अक्टूबर महीने में लखीमपुर खीरी से 20 मीट्रिक टन केले ईरान भेजे गए थे। अब जबकि किसानों ने खुद की आर्थिक स्थिति सुधारने की पहल की है, यह भी दिलचस्प है कि गन्ना मिलों की ओर से गन्ना किसानों के लंबे समय से लंबित बकाया राशि का भुगतान करना शुरू कर दिया है।
स्टोरी ऑफ चेंज बनकर उभरे किसान
हालांकि, केले के बागानों से हो रही आमदनी और तत्काल लाभ का जिक्र कर किसानों का कहना है कि आने वाले दिनों में लगभग 100 गांवों में केले की खेती शुरू हो जाएगी। लखीमपुर खीरी के किसानों का यह फैसला तेजी से हो रहे सकारात्मक बदलाव का प्रमाण है। इन किसानों ने उस कथन को चरितार्थ कर दिया कि जो बदलाव आप देखना चाहते हैं, उसके मुताबिक खुद को बदल डालिए। पढ़िए स्टोरी ऑफ पॉजिटिव चेंज...

केले की दो वेराइटी का उत्पादन
उत्तर प्रदेश में कई गन्ना किसान केले के बागान लगाना शुरू कर चुके हैं। भुगतान में देरी और गन्ने की खेती में बढ़ती लागत लागत का सामना कर रहे ये किसान केले की खेती की ओर रूख करने के बाद लाभ के मार्जिन पर संतोष व्यक्त किया है। लखीमपुर खीरी में लगभग 1,000 एकड़ (405 हेक्टेयर) भूमि में केले की खेती होती है। इसमें दो प्रकार के केले- G9 और कैडिला की पैदावार होती है।

यूपी में 35 लाख किसान करते हैं गन्ने की खेती
एक अनुमान के मुताबिक लगभग 35 लाख से अधिक किसान यूपी में गन्ने की खेती से जुड़े हुए हैं। किसानों के मुताबिक गन्ने की खेती के दौरान उर्वरक की लागत लगभग 5,000 रुपये प्रति एकड़ है। केले के पौधे की खेती की लागत 15,000 रुपये प्रति वर्ष है, लेकिन लाभ बहुत अधिक है।

30 मीट्रिक टन से अधिक केले का उत्पादन
केले की खेती का विकल्प चुनने के बाद किसानों ने बताया है कि उत्तर प्रदेश में लगभग 68,000 हेक्टेयर से अधिक भूमि पर केले की खेती हो रही है। हर साल 30 मीट्रिक टन से अधिक केले का उत्पादन होता है। केले के उत्पादन में लखीमपुर खीरी सबसे आगे है, जिसके बाद कुशीनगर, महाराजगंज, इलाहाबाद और कौशाम्बी का नंबर आता है।

कर्ज लेकर गन्ने की खेती, भुगतान के लिए लंबा इंतजार
लखीमपुर खीरी के गन्ना किसानों के मुताबिक खेती के लिए बैंकों से लोन लिया या किसी और तरीके से पैसों की व्यवस्था की। समाचार एजेंसी एएनआई की रिपोर्ट के मुताबिक किसानों को 25,000 रुपये के भुगतान के लिए एक साल या उससे भी अधिक समय तक का इंतजार करना पड़ा। ऐसे में दैनिक खर्चों में भी परेशानी का सामना करना पड़ा। इन किसानों का कहना है कि मुश्किल हालात के कारण उन्हें केले की खेती करनी पड़ी। इसमें परिणाम और लाभ तत्काल होता है।

किसानों के अस्तित्व पर सवाल, महीनों से नहीं हुआ भुगतान
लखीमपुर खीरी में बनाना फार्मिंग शुरू कर चुके किसान भुवन कुमार बताते हैं कि खेती की लगातार बढ़ती लागत के कारण उनका जीवित रहना मुश्किल होता जा रहा है। उन्होंने कहा का तमाम संघर्षों और महीनों के इंतजार के बावजूद उन्हें 35,000 रुपये की राशि का भुगतान नहीं किया गया है। भुगतान के इंतजार में हमारे अस्तित्व पर सवाल खड़े हो गए हैं।

100 गांवों में केले की खेती संभव, लाभ तत्काल
लंबित भुगतानों के कारण गन्ना उत्पादन छोड़कर केले की खेती शुरू करने के संबंध में किसान सोने लाल बताया, गन्ना का एकमात्र मुद्दा भुगतान में देरी है। इसलिए, केले की खेती हमारे लिए एकमात्र विकल्प है। इसमें लाभ तत्काल मिलता है। गौरतलब है कि लखीमपुर खीरी में कई गांवों के किसान केले की खेती से जुड़ रहे हैं। समीसा, फारस, लखुन, अमितिया, बेहटा जैसे गांव केले के पौधे की खेती के केंद्र के रूप में पॉपुलर हो रहे हैं। साथ ही सेसैया, शंकरपुर जैसे लगभग 35 से अधिक गांव गन्ना उत्पादन छोड़ केले की खेती शुरू कर चुके हैं। एएनआई की रिपोर्ट के मुताबिक किसानों ने बताया कि एक साल के भीतर 100 से अधिक गांवों में केले की खेती शुरू हो जाएगी और इन गांवों के पूरी तरह केले के बागान में बदल जाने की संभावना है।

केले से बनते हैं कई उत्पाद, मार्केट में अच्छी डिमांड
केले की खेती लोकप्रिय होने का एक अन्य प्रमुख कारण है इशसे बनने वाले उत्पादों की मांग। केले के फल के अलावा मार्केट में केले के पत्तों की भी अच्छी डिमांड है। केले के चिप्स भी स्नैक्स के रूप में काफी पॉपुलर हैं। ऐसे में किसानों के पास अपने उत्पाद बेचने के कई विकल्प मौजूद होते हैं। एएनआई के मुताबिक लखीमपुर के समीसा गांव में प्रमोद कुमार पहले गन्ना किसान थे, जिन्होंने केले के फाइबर का स्टार्ट-अप शुरू किया। उन्होंने बताया कि 2021 में केले के फाइबर का स्टार्टअप शुरू किया। ब्लॉक डेवलपमेंट ऑफिसर (बीडीओ) अरुण कुमार सिंह ने गुजरात से मशीनें हासिल करने में मदद की। मशीन की कीमत लगभग दो लाख रुपए थी।

केले की खेती से महिलाओं की भी आमदनी
लखीमपुर के किसान प्रमोद केले के पौधे से बनने वाले प्रोडक्ट के काम में समीसा गांव की महिलाओं को भी जोड़ रहे हैं। उन्होंने केले के तने से रेशा (बनाना फाइबर-banana fibre) बनाने के काम से कई महिलाओं को जोड़ा है। इसमें महिलाओं को आर्थिक लाभ का हिस्सा दिया जाता है। बकौल प्रमोद, महिलाओं को 300 रुपये मिलते हैं। कई बार महिलाओं के साथ बिजनेस के लाभ का हिस्सा भी शेयर किया जाता है जो लगभग 400 से 500 रुपये प्रति किलो तक होता है। इस काम में 'माँ सरस्वती स्वयं सहायता समूह (SHG)' की भी उल्लेखनीय भूमिका है। हस्तशिल्प उत्पाद बनाने के काम से महिलाओं को रोजगार का शानदार विकल्प मिला है। कुशीनगर में 25-35 साल आयुवर्ग की कई महिलाएं, बनाना फाइबर से फूलदान और रस्सियां बनाती हैं।

20 हजार रुपये प्रति क्विंटल तक दाम
गौरतलब है कि बनाना फाइबर उत्पादन की लागत 100 से 110 रुपये प्रति किलो होती है। इसे 180 से 200 रुपये प्रति किलो के हिसाब से बेचा जाता है। बनाना फाइबर की 20,000 रुपये प्रति क्विंटल तक बिकता है। किसान प्रमोद कुमार बताते हैं कि बनाना फाइबर के लिए उन्हें पूरे भारत से ऑनलाइन ऑर्डर मिलते हैं। प्रत्येक केले के पेड़ से लगभग 100 ग्राम फाइबर मिलता। मशीन की मदद से केले का रेशा 20 मिनट में निकाला जा सकता है। उत्तर प्रदेश के लखीमपुर के अलावा कुशीनगर जिले में भी केले के रेशे का काम होता है। रेशे से हस्तशिल्प का काम किया जाता है।
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