Aromatic Farming : 21 हजार से अधिक किसानों ने शुरू की सुगंधित पौधों की खेती, मुनाफा भरपूर

उत्तराखंड के किसान बड़े पैमाने पर अरोमेटिक प्लांट यानी सगंध पौधों की खेती कर रहे हैं। लगभग 21 हजार से अधिक किसान सगंध पौधों की खेती से जुड़ चुके हैं। किसानों को पारंपरिक खेती की तुलना में अच्छा मुनाफा हो रहा है।

देहरादून, 12 जून : हिमालयी राज्य उत्तराखंड के लगभग 21 हजार से अधिक किसानों ने सगंध खेती यानी खुशबूदार पौधों की खेती की शुरुआत की है। इन किसानों ने अंग्रेजी में अरोमेटिक फार्मिंग कहे जाने वाले खेती के इस विकल्प को अपनाने के बाद मुनाफा कमाना भी शुरू कर दिया है। खास बात ये है कि इस खेती में जिन पौधों की रोपाई की जाती है, इन्हें अधिक मेंटेनेंस की जरूरत नहीं पड़ती। यानी कम सिंचाई में तैयार होने वाले ये खुशबूदार पौधे जानवरों से भी सुरक्षित रहते हैं।

aromatic plant

85 करोड़ रुपये से अधिक टर्नओवर

जागरण डॉटकॉम की रिपोर्ट के मुताबिक उत्तराखंड के 21 हजार से अधिक किसान सगंध खेती से जुड़े हैं। ऐसा करने से बंजर जमीनों पर भी हरियाली लौट रही है। अरोमेटिक फार्मिंग के तहत उपजाए जा रहे पौधों के व्यवसाय का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि महीने में 7 करोड़ रुपये से अधिक का कारोबार हो रहा है। सालाना टर्नओवर 85 करोड़ रुपये से अधिक का है।

खेती-किसानी में चुनौतियां

गौरतलब है कि उत्तराखंड पर्यावरण के लिहाज से संवेदनशील राज्य है। कई कारणों से यहां की खेती प्रभावित हुई है। किसान अपनी खेत और जमीन छोड़ कर पलायन कर रहे हैं। ऐसे में बड़ा भौगोलिक इलाका बंजर होता जा रहा है। जंगली जानवरों के खौफ और मौसम की बेरुखी के कारण भी खेती-किसानी के काम में चुनौतियां पेश आ रही हैं।

100 से अधिक अरोमा क्लस्टर, इन पौधों की खेती

किसानों की परेशानी का निदान करने के लिए राज्य सरकार ने प्रदेश में अरोमेटिक प्लांट सेंटर यानी सगंध पौधा केंद्र की शुरुआत की। इसके पॉजिटिव परिणाम भी सामने आ रहे हैं। बड़ी संख्या में किसान अब सगंध खेती की ओर रुख कर रहे हैं। जागरण डॉटकॉम की रिपोर्ट के मुताबिक प्रदेश में 100 से अधिक अरोमा कलस्टर चलाए जा रहे हैं। इनमें लेमनग्रास, मिंट और तेज पत्ते जैसे पौधों की खेती की जा रही है।

21 हजार से अधिक किसान जुड़े

बता दें कि कई सुगंधित पौधों से तेल निकाले जाते हैं। ऐसे में किसानों को अधिक परेशानी न झेलनी पड़े, इस मकसद से 180 से अधिक आसवन केंद्रों की स्थापना की गई है। 7600 हेक्टेयर से अधिक जमीन पर हो रही अरोमेटिक फार्मिंग से 21 हजार से अधिक किसान जुड़े हैं।

10 हजार रुपये में एक किलो तेल

खबर के मुताबिक किसानों को पारंपरिक खेती की तुलना में सगंध पौधों की उपज से अच्छी आमदनी हो रही है। फसलों का प्रोसेसिंग के बाद निकाले जाने वाले तेल हजारों रुपये में बिकते हैं। जम्मू-कश्मीर में अरोमेटिक फार्मिंग के तहत हो रही लैवेंडर फूलों की खेती के बारे में खबर आई थी कि लैवेंडर का खुशबूदार तेल 10 हजार रुपये प्रतिकिलो तक बिकता है।

केंद्र सरकार का अरोमा मिशन

गत 5 जून को केंद्रीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्री जितेंद्र सिंह गत 5 जून को ने कहा था कि अरोमेटिक पौधों के लिए उत्तराखंड की जलवायु अनुकूल है। केंद्र सरकार ने 'अरोमा मिशन' शुरू किया है। उन्होंने कहा, उत्तराखंड सहित दूसरे हिमालयी राज्यों में अरोमेटिक स्टार्ट-अप्स शुरू किए जाने की भरपूर संभावना है। उन्होंने कहा, इन राज्यों की भौगोलिक और जलवायु संबंधी परिस्थितियां एरोमैटिक (खुशबूदार) पौधों के साथ-साथ औषधीय पौधों की खेती के लिए भी अनुकूल हैं।

हिमाचल में अरोमेटिक फार्मिंग, किसानों की आय दोगुनी

इससे पहले मार्च, 2021 में विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय नेसुगंधित पौधों की खेती से किसानों की आमदनी दोगुनी होने का दावा किया था। मंत्रालय की ओर से जारी बयान में कहा गया कि हिमाचल प्रदेश के चंबा जिले में सुगंधित पौधों की खेती से किसानों को अतिरिक्त आमदनी हो रही है। यहां के किसान जंगली गेंदा (wild marigold (Tagetes minuta) की उन्नत किस्म की खेती कर रहे हैं। पारंपरिक मक्का, गेहूं और धान की फसलों की तुलना में किसान अब बेहतर पैसे कमा रहे हैं। इस फूल से तेल (essential oil) निकाला जाता है। जंगली गेंदे के फूल की खेती के बाद निकाले जाने वाले तेल से किसानों की आय दोगुनी हो गई है।

9500 रुपये में एक किलो तेल

40 किसानों को मिलाकर एक स्वयं सहायता समूह (SHG) का गठन किया गया है। गांव में ही फूल का तेल निकालने के लिए 250 किलोग्राम क्षमता की एक आसवन इकाई (distillation unit) स्थापित की गई। तेल निकालने, पैकिंग और तेल के भंडारण में प्रशिक्षित किसानों ने जंगली गेंदे के फूल की खेती शुरू कर दी है। तेल 9500 प्रति किलोग्राम तक बिकता है। इसका उपयोग दवा उद्योगों के अलावा इत्र और सुगंध तैयार करने में भी होता है। किसानों की आय बढ़ने के संबंध में विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय का कहना है कि प्रति हेक्टेयर परंपरागत फसलों से 40,000-50,000 रुपये की आमदनी होती थी। अब वाइल्ड मेरीगोल्ड यानी जंगली गेंदे के फूल की खेती और तेल निकालने से जुड़ने के बाद किसान प्रति हेक्टेयर एक लाख रुपये कमा रहे हैं।

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