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DSP Santosh Patel: कौन हैं DSP संतोष पटेल? जिस सफाईकर्मी के खून से बची जान, अब उसकी बेटी का करेंगे कन्यादान

DSP Santosh Patel: वर्दी केवल कानून लागू करने का प्रतीक नहीं होती, बल्कि संवेदनशीलता और इंसानियत का भी चेहरा होती है इस बात को मध्य प्रदेश पुलिस के DSP संतोष पटेल ने एक बार फिर साबित कर दिया है। अक्सर अपनी अनूठी इंसानियत और जमीन से जुड़ाव के लिए सोशल मीडिया पर छाए रहते हैं।

एक बार फिर DSP साहब अपने 26 साल पहले के एक दोस्त और उनके परिवार के लिए महिसा बनकर सामने आए हैं। दरअसल, एक बार जिस सफाईकर्मी ने अपनी जान जोखिम में डालकर डीएसपी पटेल का जीवन बचाया था, आज उसी परिवार के लिए DSP संतोष पटेल देवदूत बनकर सामने आए हैं।

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कौन हैं DSP संतोष पटेल?

संतोष पटेल का जन्म मध्य प्रदेश के एक ग्रामीण इलाके में हुआ। बचपन बेहद अभावों में बीता। पिता खेतों में मजदूरी और कभी-कभी राजमिस्त्री का काम कर परिवार पालते थे, मां घर और बच्चों को संभालती थीं। कच्चे घर की टपकती छत, बरसात में भीगती किताबें और रात में लालटेन की रोशनी में पढ़ाई-यही संतोष की दुनिया थी। कई बार हालात ऐसे बने कि खाने में सिर्फ दलिया या दोस्तों से उधार ली गई रोटियां नसीब हुईं। लेकिन इन मुश्किलों ने उनके हौसले को कभी नहीं तोड़ा।

बीमारी ने परिवार को और तोड़ दिया, लेकिन संतोष ने तय कर लिया कि पढ़ाई ही उनका रास्ता है। तमाम मुश्किलों के बावजूद वे जिले के टॉपर बने। आर्थिक मजबूरियों के बीच भी उन्होंने हार नहीं मानी और MPPSC परीक्षा पास कर पुलिस सेवा में चयनित हुए। DSP के रूप में ग्वालियर के घाटीगांव सहित कई जगहों पर तैनाती के दौरान उन्होंने संवेदनशील और जनप्रिय अधिकारी की पहचान बनाई।

क्यों चर्चा में हैं DSP संतोष पटेल?

अफसर बनने के बाद भी संतोष पटेल के मन में एक नाम गूंजता रहा-संतु मास्टर। जब वे सतना पहुंचे, तो सबसे पहले उसी अस्पताल गए। वहां पता चला कि संतु मास्टर का निधन हो चुका है और उनका परिवार झुग्गी बस्ती में रहता है। यह सुनते ही DSP की आंखें नम हो गईं।

जिसने जान बचाई, उसकी बेटी का कन्यादान करेंगे DSP

पता मिलते ही संतोष पटेल झुग्गी बस्ती पहुंचे। वहां का दृश्य हर किसी को भावुक कर देने वाला था। एक वर्दीधारी DSP जमीन पर झुककर संतु मास्टर की बेटियों के पैर छू रहा था। उन्होंने कहा मैं संतु मास्टर का चेहरा नहीं देख पाया, लेकिन उनका खून मेरी रगों में दौड़ रहा है। DSP संतोष पटेल ने छोटी बेटी की शादी कराने और खुद कन्यादान करने का संकल्प लिया। शादी का पूरा खर्च उठाने की जिम्मेदारी भी उन्होंने अपने ऊपर ली।

जब खून पानी बन गया: मौत से सामना

साल 1999, संतोष की जिंदगी का सबसे भयावह दौर लेकर आया। तब वे महज 8-9 साल के थे। एक गंभीर बीमारी ने उन्हें जकड़ लिया। शरीर का खून मवाद में बदलने लगा। परिवार झाड़-फूंक और देसी इलाज में करीब छह महीने गंवा बैठा। हालत बिगड़ने पर पहले पन्ना जिला अस्पताल और फिर सतना के एक निजी अस्पताल ले जाया गया। डॉक्टरों ने साफ कह दिया-ऑपरेशन जरूरी है और तुरंत खून चाहिए। लेकिन उस दौर में रक्तदान को लेकर डर था, कोई आगे नहीं आ रहा था।

एक डांट से शुरू हुई दोस्ती, जिसने जिंदगी बचा ली

इसी अस्पताल में एक छोटी-सी घटना जिंदगी बदल देने वाली साबित हुई। संतोष के पिता से गलती से परिसर में थूक गिर गया। वहां काम करने वाले सफाईकर्मी ने उन्हें डांट दिया। बात बढ़ी, फिर बातचीत में बदली और दोस्ती हो गई। जब संतोष की हालत नाजुक हो गई और पिता टूट चुके थे, तभी वही सफाईकर्मी-संतु मास्टर-आगे आए। उन्होंने कंधे पर हाथ रखकर बस इतना कहा,तुम्हारा बेटा जिंदा रहेगा। बिना किसी लालच, बिना किसी पहचान के, संतु मास्टर ने अपना खून दे दिया। उसी खून से ऑपरेशन सफल हुआ और संतोष पटेल को नया जीवन मिला।

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