क्रोध के बदले क्रोध और प्रेम के बदले प्रेम ही मिलता है, पढ़ें ये कहानी

नई दिल्ली। हमारे देश में एक कहावत आम है- जो बोओगे, वही काटोगे। इसका सीधा सा अर्थ यह है कि अपना भविष्य तय करना मनुष्य के ही हाथों में होता है। मनुष्य अपने पूरे जीवन में जिस तरह का आचरण करता है, आगे चलकर वही उसके पास लौटता है। यदि कोई मनुष्य जीवन भर सबसे प्रेमपूर्ण व्यवहार करता है, तो बदले में संसार भर का प्रेम उसके हिस्से आता है। इसके विपरीत यदि कोई व्यक्ति हर किसी से क्रोध, हिंसा, चिढ़, भय की भावना से व्यवहार करता है, वह केवल घृणा ही पाता है।

क्रोध के बदले क्रोध और प्रेम के बदले प्रेम ही मिलता है

आज इस संदर्भ में भगवान महावीर स्वामी की कथा का आनंद लेते हैं...

यह उस समय की बात है, जब महावीर स्वामी देशाटन करते हुए ध्यान और भक्ति में लीन थे। एक बार वे भ्रमण करते हुए नदी किनारे बसे गांव में पहुंचे। पूरा गांव सूनसान पड़ा था। हर जगह कंकालों के ढेर पड़े थे। महावीर स्वामी एक मंदिर देखकर उसी स्थान पर ध्यान लगाने लगे, तब वहां से गुज़र रहे कुछ राहगीरों ने उन्हें चेताया। वास्तव में उस स्थान पर शूलपाणि नाम के एक दैत्य ने अधिकार जमा रखा था। वहाँ रहने वाले सब मनुष्यों को वह मारकर खा गया था। लोगों के मना करने के बाद भी महावीर वहीं कंकालों के बीच स्थान बनाकर ध्यानस्थ हो गए।

हाथी ने महावीर स्वामी को सूंड में उठा लिया

शाम गहराने पर वहाँ भयंकर आवाज़ें आने लगीं। दैत्य शूलपाणि आ पहुँचा था। शूलपाणि अपने इलाके में एक ऐसे सन्यासी को देखकर हैरान रह गया, जो उससे तनिक भी भयभीत नहीं हो रहा था। उसने अपनी मायावी शक्तियों का प्रयोग कर महावीर स्वामी पर पागल हाथी छोड़ दिया। हाथी ने महावीर स्वामी को सूंड में उठा लिया और घुमाने लगा, पर उनका ध्यान न टूटा। शूलपाणि ने उन पर भालों से प्रहार किया और अपने बल से उस मंदिर के हर हिस्से को चकनाचूर कर दिया। इस पर भी स्वामी निश्छल खड़े रहे। इसके बाद शूलपाणि ने प्रभु पर एक विषधर छोड़ दिया, पर वे यथावत ध्यानमग्न रहे।

शूलपाणि उद्दंडता छोड़कर महावीर के समक्ष नतमस्तक हो गया

आखिरकार शूलपाणि की समझ में आ गया कि यह कोई साधारण प्राणी नहीं हो सकता। इस व्यक्ति में अवश्य ही कोई दिव्य शक्ति है और यह मेरा संहार करने आया है। इस विचार मात्र से शूलपाणि कांप उठा। उसके भय को तीर्थंकर ने अनुभूत किया। इसके साथ ही उनके शरीर से एक दिव्य ज्योति प्रकट हुई और शूलपाणि में समा गई। उस दिव्य ज्योति के प्रभाव से शूलपाणि अपनी उद्दंडता छोड़कर महावीर के समक्ष नतमस्तक हो गया। तब वे समाधि से बाहर आकर बोले- पुत्र शूलपाणि! क्रोध से क्रोध और प्रेम से प्रेम की उत्पत्ति होती है। तुमने जीवनभर वही बांटा है, इसीलिए आज तुम भयभीत हो रहे हो। भय, क्रोध, घृणा जैसे समस्त विकारों का त्याग करो, शांति और अहिंसा की शरण में आओ और सबसे प्रेम करो। शूलपाणि ने स्वामी जी की बात मान कर हिंसा छोड़ दी और उसका जीवन बदल गया।

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