Religion: पंचक क्या है और क्यों रहता है इसे लेकर लोगों के मन में संशय?
नई दिल्ली। हिंदू संस्कृति में प्रत्येक कार्य मुहूर्त देखकर करने का विधान है। इसमें सबसे महत्वपूर्ण है पंचक। जब भी कोई कार्य प्रारंभ किया जाता है तो उसमें शुभ मुहूर्त के साथ पंचक का भी विचार किया जाता है। आखिर यह पंचक होता क्या है और इसको लेकर लोगों के मन में संशय, भय और भ्रम की स्थिति क्यों रहती है। खासकर किसी अशुभ कार्य के समय पंचक होने या न होने का इतना विचार क्यों किया जाता है। दरअसल नक्षत्र चक्र में कुल 27 नक्षत्र होते हैं। इनमें अंतिम के पांच नक्षत्र दूषित माने गए हैं, ये नक्षत्र धनिष्ठा, शतभिषा, पूर्वा भाद्रपद, उत्तरा भाद्रपद और रेवती होते हैं। प्रत्येक नक्षत्र चार चरणों में विभाजित रहता है। पंचक धनिष्ठा नक्षत्र के तृतीय चरण से प्रारंभ होकर रेवती नक्षत्र के अंतिम चरण तक रहता है। हर दिन एक नक्षत्र होता है इस लिहाज से धनिष्ठा से रेवती तक पांच दिन हुए। ये पांच दिन पंचक लगा रहता है।

पंचक से ज्ञात होता है संख्या पांच।
जैसा कि शब्द पंचक से ज्ञात होता है संख्या पांच। यानी पंचक के दौरान यदि कोई अशुभ कार्य हो तो उनकी पांच बार आवृत्ति होती है। इसलिए उसका निवारण करना आवश्यक होता है। पंचक का विचार खासतौर पर किसी की मृत्यु के समय किया जाता है। माना जाता है कि यदि किसी व्यक्ति की मृत्यु पंचक के दौरान हो तो घर-परिवार में पांच लोगों पर संकट रहता है। इसलिए जिस व्यक्ति की मृत्यु पंचक में होती है उसके दाह संस्कार के समय आटे-चावल के पांच पुतले बनाकर साथ में उनका भी दाह कर दिया जाता है। इससे परिवार पर से पंचक दोष समाप्त हो जाता है।

पंचक में यह कार्य नहीं करना चाहिए
धनिष्ठा पंचकं त्याज्यं तृणकाष्ठादिसंग्रहे।
त्याज्या दक्षिणदिग्यात्रा गृहाणां छादनं तथा।।
शास्त्रों में वर्णित है कि पंचक सर्वाधिक दूषित दिन होते हैं इसलिए पंचक के दौरान दक्षिण दिशा की ओर यात्रा नहीं करना चाहिए। घर का निर्माण हो रहा है तो पंचक में छत नहीं डालना चाहिए। घास, लकड़ी, कंडे या अन्य प्रकार के ईंधन का भंडारण पंचक के समय नहीं किया जाता है। शय्या निर्माण यानी पलंग बनवाना, पलंग खरीदना, बिस्तर खरीदना, बिस्तर का दान करना पंचक के दौरान वर्जित रहता है। इनके अतिरिक्त किसी भी प्रकार के कार्य वर्जित नहीं है।

पंचक को लेकर भ्रम
पंचक को लेकर अधिकांश लोगों के मन में भ्रम की स्थिति रहती है। उनका मानना है कि पंचक में कोई भी कार्य नहीं करना चाहिए। जबकि कहीं-कहीं शास्त्रों में वर्णन है कि शुभ कार्य में पंचक देखने की आवश्यकता नहीं है। पंचक का अर्थ पांच आवृत्ति। उदाहरण के लिए यदि पंचक के दौरान नया घर या वाहन खरीदा जाता है तो संभव है आप पांच घरों या पंाच वाहनों के मालिक बनें। यह स्थान, समय और मतभिन्नता के अनुसार अलग-अलग तरीके से तय होता है। कुछ लोग शुभ कार्यों में भी पंचक विचार करते हैं।

अधिकांश लोगों के मन में भ्रम
प्रत्येक 27 दिन बाद नक्षत्र की पुनरावृत्ति होती है इस लिहाज से पंचक हर माह या कहें प्रत्येक 27 दिन बाद आता है। यहां आगामी महीनों में आने वाले पंचकों की जानकारी दी जा रही है।

तिथियां
- 19 जनवरी दोपहर 2.18 से 24 जनवरी प्रातः 8.34 तक
- 15 फरवरी रात्रि 8.40 से 20 फरवरी दोप. 2.30 तक
- 14 मार्च रात्रि 4.11 से 19 मार्च रात्रि 8.09 तक
- 11 अप्रैल दोपहर 12.35 से 15 अप्रैल रात्रि 4.50 तक
- 8 मई रात्रि 8.59 से 13 मई दोपहर 1.31 तक
- 4 जून रात्रि 4.34 से 9 जून रात्रि 11.11 तक
- 2 जुलाई प्रातः 11.07 से 7 जुलाई प्रातः 7.39 तक
- 29 जुलाई सायं 5.06 से 3 अगस्त दोप. 2.25 तक
- 25 अगस्त रात्रि 11.15 से 30 अगस्त रात्रि 8.02 तक
- 22 सितंबर प्रातः 8.11 से 26 सितंबर रात्रि 1.55 तक
- 19 अक्टूबर प्रातः 12.16 से 24 अक्टूबर प्रातः 9.37 तक
- 15 नवंबर रात्रि 10.09 से 20 नवंबर सायं 6.34 तक
- 13 दिसंबर प्रातः 6.10 से 17 दिसंबर रात्रि 4.18 तक

नोट:
पंचक प्रारंभ और पूर्ण होने का समय उज्जैन मप्र. की सिद्धविजय पंचांग के अनुसार है। देशभर में प्रचलित पंचांगों में स्थानीय सूर्यादय, सूर्यास्त के अनुसार इन समयों में परिवर्तन संभव है। अतः पंचक का विचार करते समय स्थानीय ज्योतिषीयों की सलाह लेना उचित रहेगा।
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