Vat Purnima Vrat ( 16 June 2019) : इस व्रत से पाएं सुख-सौभाग्य
नई दिल्ली। ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को व्रत वट सावित्री पूर्णिमा व्रत किया जाता है। यह व्रत सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु और परिवार की सुख समृद्धि की कामना से करती हैं। यह व्रत 16 जून को आ रहा है। इस व्रत की पूर्णिमा 16 जून को और स्नान-दान आदि की पूर्णिमा 17 जून को मानी जाएगी। मान्यता है कि इस दिन सावित्री अपने पति सत्यवान के प्राण यमराज से वापस लेकर आई थी। इसके बाद उन्हें सती सावित्री कहा जाने लगा। यह व्रत ज्येष्ठ माह में दो बार आता है। अमावस्या और पूर्णिमा को। स्कंद और भविष्य पुराण के अनुसार यह व्रत ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन किया जाता है, जबकि निर्णयामृतादि के अनुसार अमावस्या को किया जाता है।

कैसे करें व्रत
वट सावित्री पूर्णिमा व्रत के दिन सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नानादि से निवृत होकर व्रत का संकल्प लें। नियमानुसार यह व्रत तीन दिन का होता है। त्रयोदशी से लेकर पूर्णिमा तक वट सावित्री व्रत किया जाता है। पूर्णिमा के दिन वट वृक्ष के समीप बैठकर बांस की एक टोकरी में सात प्रकार के धान भरकर उसे दो वस्त्रों से ढंक दिया जाता है। दूसरे पात्र में ब्रह्ासावित्री तथा सत्य सावित्री की मूर्ति या चित्र स्थापित करके पूजन करें। इसके बाद वटवृक्ष को जल अर्पित कर सात बार उसकी परिक्रमा करते हुए वट वृक्ष के तने से सूत लपेटा जाता है। इसके बाद वट सावित्री तथा धर्मराज की पूजा कर व्रत कथा सुनना चाहिए।

व्रत के लाभ
- यह व्रत केवल सुहागिन स्त्रियां ही कर सकती हैं। व्रत के प्रभाव से उनके पति दीर्घायु होते हैं।
- व्रत के प्रभाव से संपूर्ण परिवार की सुरक्षा होती है।
- परिवार के सुख-समृद्धि में वृद्धि होती है। घर में धन-धान्य के भंडार भर जाते हैं।
- वट वृक्ष के नीचे बैठकर भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की पूजा करने से धन, वैभव की प्राप्ति होती है।
- सुखद दांपत्य जीवन के लिए यह व्रत पति-पत्नी दोनों का साथ में करना चाहिए।
वट सावित्री व्रत कथा
पौराणिक कथा के अनुसार भद्र देश के राजा अश्वपति को कोई संतान नहीं थी। उन्होंने संतान की प्राप्ति के लिए अनेक वर्षों तक तप किया जिससे प्रसन्न होकर देवी सावित्री ने उन्हें पुत्री का वरदान दिया। तप के प्रभाव से जो पुत्री उत्पन्न हुई उसका नाम सावित्री रखा गया। सावित्री सभी गुणों से संपन्न कन्या थी, जिसके लिए योग्य वर न मिलने के कारण राजा अश्वपति काफी दुखी रहने लगे। एक बार उन्होंने स्वयं पुत्री को वर तलाशने भेजा। इस खोज में सावित्री एक वन में जा पहुंची जहां उसकी भेंट साल्व देश के राजा द्युमत्सेन से हुई। द्युमत्सेन उसी तपोवन में रहते थे क्योंकि उनका राज्य किसी क्रूर राजा ने छीन लिया था। सावित्री ने उनके पुत्र सत्यवान को देखकर उन्हें पति के रूप में वरण करने का निर्णय लिया।

सत्यवान गुणवान तथा धर्मात्मा अवश्य है लेकिन अल्पायु है...
उधर यह बात जब नारदमुनि को ज्ञात हुई तो वे अश्वपति के पास पहुंचे और कहने लगे आपकी कन्या ने वर खोजने में भारी भूल कर दी है। सत्यवान गुणवान तथा धर्मात्मा अवश्य है लेकिन अल्पायु है। एक वर्ष बाद उसकी मृत्यु हो जाएगी। नारदजी की बात सुनकर राजा अश्वपति अति विचलित हो गए। उन्होंने पुत्री को समझाया, लेकिन सावित्री ने यह कहते हुए पिता को इनकार कर दिया कि आर्य कन्याएं जीवन में एक ही बार पति का वरण करती हैं। मैं सत्यवान को अपने पति के रूप में स्वीकार कर चुकी हूं। इसके बाद सावित्री और सत्यवान का विवाह संपन्न हुआ। उधर धीरे-धीरे एक वर्ष बीतने लगा और सावित्री को चिंता सताने लगी कि पति की मृत्यु का समय निकट आ रहा है तो उसने तीन दिन पूर्व ही व्रत रखना प्रारंभ कर दिया।
सत्यवान लकड़ी काटने के लिए जैसे ही पेड़ पर चढ़ा...
नारदजी के कहे अनुसार वह दिन आ गया। नित्य की भांति उस दिन भी सत्यवान अपने समय पर लकड़ी काटने के लिए चला गया तो सावित्री भी सास-ससुर की आज्ञा से अपने पति के साथ जंगल में जाने को तैयार हो गई। सत्यवान लकड़ी काटने के लिए जैसे ही पेड़ पर चढ़ा, तो उसके सिर में भयानक पीड़ा होने लगी। वह व्याकुल होकर वृक्ष से नीचे उतर आया। सावित्री को समझ में आ गया कि अब वक्त नहीं बचा है। उसने अपनी गोद में पति का सिर रखकर लिटा लिया। उसी समय दक्षिण दिशा से यमराज आए और सत्यवान के प्राण लेकर जाने लगे तो सावित्री भी उनके पीछे-पीछे चल पड़ी। पहले तो यमराज ने उसे दैवीय विधान समझाया, लेकिन फिर उसकी पति निष्ठा देखकर उन्होंने वर मांगने को कहा।

'मेरे सास-ससुर वनवासी तथा नेत्र ज्योति विहीन'
सावित्री ने कहा- मेरे सास-ससुर वनवासी तथा नेत्र ज्योति विहीन हैं। उन्हें आप दिव्य ज्योति प्रदान करें। यमराज ने कहा ऐसा ही होगा अब तुम लौट जाओ। यमराज की बात सुनकर सावित्री ने कहा- धर्मराज मुझे अपने पति के पीछे-पीछे चलने में कोई परेशानी नहीं है। पति के पीछे चलना मेरा कर्तव्य है। यह सुनकर उन्होंने फिर से उसे एक वर मांगने को कहा। सावित्री बोली मेरे ससुर का राज्य छिन गया है उसे वे पुनः प्राप्त कर सकें। धर्मराज ने उसे तथास्तु कहकर लौट जाने को कहा। किंतु वह फिर भी नहीं मानी।
यमराज सावित्री की मंशा जान गए
यमराज सावित्री की मंशा जान गए और बोले कि अब पति के प्राणों के अलावा जो भी मांगना है मांग लो। इस बार सावित्री ने अपने को सत्यवान के सौ पुत्रों की माता बनने का वरदान मांगा। तथास्तु कहकर यमराज पुनः आगे बढ़ने लगे तो सावित्री ने कहा कि आपने मुझे सत्यवान के सौ पुत्रों की माता बनने का वरदान तो दे दिया लेकिन बिना पति के मैं किस प्रकार मां बन सकती हूं। सावित्री की बात से धर्मराज स्वयं धर्म संकट में फंस गए और उन्होंने सावित्री से देर तक तर्क करने के बाद सत्यवान के प्राण को अपने पाश से मुक्त कर दिया। इस प्रकार सत्यवान और सावित्री कई वर्षों तक सुखी-दांपत्य जीवन का भोग करते रहे।
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