जब स्वामी विवेकानंद की छाती पर रामकृष्ण परमहंस ने रख दिया पैर!
Short Story: यह बात उस समय की है, जब नरेंद्र दत्ता उर्फ स्वामी विवेकानंद 19 वर्ष के थे। एक दिन वे अपने गुरु राम कृष्ण परमहंस के पास गये और उनसे सवाल किया, "आप भगवान की बात कर रहे हैं, हमेशा भगवान-भगवान करते हैं, भगवान हैं कहां और अगर हैं, तो क्या प्रमाण है आपके पास? मुझे प्रमाण दिखाईये।"
रामकृष्ण, जो पढ़ेलिखे नहीं थे, उनके पास कोई डिग्री नहीं थी, उन्होंने बहुत ही सरलता से जवाब दिया, "मैं स्वयं प्रमाण हूं।"
विवेकानंद के पास कहने को कुछ नहीं था, वे हंसे और वहां से निकल गये। असल में वे राम कृष्ण से कोई बौद्धिक उत्तर की तलाश में थे। लेकिन भगवान हैं, इसका क्या प्रमाण है? यह सवाल विवेकानंद के दिमाग में घूमने लगा। दो दिन तक विवेकानंद ठीक से सो नहीं पाये। बस सोचते रहे, भगवान कहां हैं?
तीन दिन बाद वे रामकृष्ण के पास फिर से पहुंचे और बोले, "ठीक है, दिखाईये भगवान कहां हैं, मैं देखना चाहता हूं अभी।" रामकृष्ण ने पूछा, "तुम्हारे अंदर भगवान को देखने का साहस है?" विवेकानंद बोले, "हां, मैं एक बहादुर लड़का हूं।"
राम कृष्ण खड़े हुए और विवेकानंद को जमीन पर गिरा दिया और अपना पैर विवेकानंद की छाती पर रख दिया। और विवेकानंद कुछ समय के लिये समाधि में चले गये। उस वक्त उनका दिमाग अनंत की ओर चला गया। वे शांत पड़ गये। और करीब 12 घंटे तक उस मंजर से बाहर नहीं निकल पाये। और उसके बाद से विवेकानंद में एक बड़ा परिवर्तन आया और उन्होंने फिर यह सवाल कभी नहीं किया।
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