जानिए क्या रिश्ता है पूतना-वध और मां के प्रेम में?

नई दिल्ली। भगवान कृष्ण भारतीय पुराणों के ऐसे नायक हैं, जिनकी कथाओं और लीलाओं में जीवन का हर रस रचा बसा है। यही वजह है कि कृष्ण जन नायक कहे जाते हैं, उनसे जुड़ी हर कथा मनमोहक है। इनमें शिशु कृष्ण द्वारा राक्षसी पूतना के वध की कथा से शायद ही कोई अपरिचित हो।

जानिए क्या रिश्ता है पूतना-वध और मां के प्रेम में?

सभी जानते हैं कि पूतना, मथुरा नरेश कंस के कहनेे पर कृष्ण का वध करने आई थी, पर इस कथा का एक ऐतिहासिक रहस्य भी है, जिससे कम ही लोग परिचित हैं। कहा जाता है कि कृष्ण का जन्म सतयुग और त्रेतायुग में किए गए कई संकल्पों, वरदानों और अभिशापों को सत्यापित करने के लिए हुआ था। पौराणिक कथाओं के अनुसार श्री कृष्ण, भगवान विष्णु का अवतार हैं। इसी संदर्भ में भगवान विष्णु के वामन अवतार की एक कथा आकर जुड़ती है।

दोनों कथाओं का आपस में क्या संबंध है, कैसे ये आपस में जुड़ती हैं, आइए देखते हैं-

बात उस समय की है जब असुर राज बलि का पराक्रम, वैभव और ऐश्वर्य संसार में सबसे प्रचंड था। पृथ्वी और पाताल के अलावा स्वर्ग पर भी उसी का अधिकार था। जन्म से असुर होते हुए भी राजा बलि में हर दैवीय गुण था, यही कारण था कि देवता उससे पार पाने में असमर्थ हो गए थे। ऐसे समय में असुरों के सामर्थ्य को क्षीण करने के लिए भगवान विष्णु ने धरती पर वामन अवतार लिया।

जानिए क्या रिश्ता है पूतना-वध और मां के प्रेम में?

राजा बलि के दान कर्म का कोेई अंत नहीं था। कहा जाता था कि उसने अपने जीवन में किसी भी याचक को खाली हाथ नहीं लौटाया। इसी क्रम में एक बार बलि ने महान यज्ञ का आयोजन किया। यज्ञ के समापन पर एक बार पुनः उसने दान मांगने के लिए समस्त मनुष्य जाति को आमंत्रित किया। जब बलि याचकों को इच्छित दान सामग्री वितरित कर रहे थे, तब उनकी बहन उनके पास ही सहायता के लिए खड़ी थी।

बहन के तो प्राण ही अपने भाई में बसते थे

बलि को अपनी यह बहन अतिप्रिय थी और बहन के तो प्राण ही अपने भाई में बसते थे। दानकर्म में सुबह से शाम हो गई और सारे याचक संतुष्ट होकर जा चुके थे। ऐसे में अचानक एक छोटे से ब्राह्मण ने राजा बलि की यज्ञशाला में प्रवेश किया और पूछा कि क्या वह भी अपना इच्छित वर पा सकता है?

सौम्य, सुंदर और मासूम

वह ब्राह्मण बालक इतना सौम्य, सुंदर और मासूम था कि यज्ञशाला में उपस्थित सभी जन उस पर मोहित हो गए और उनमें ममत्व जाग उठा। इसी क्रम में ममता से भरी बलि की बहन के मन में विचार उत्पन्न हुआ कि अगर यह उसका बालक होता, तो उसे जी भर के दुग्धपान कराती और ममता का आनंद लेती। वामन अवतार में आए विष्णु जी ने उसके मन का भाव जान लिया और तथास्तु कह दिया।

इच्छित वर मांगने को कहा

राजा बलि भी बालक की सरल, मनमोहक छवि पर मोहित हो उठे और उसे प्यार से बुलाकर इच्छित वर मांगने को कहा। ब्राह्मण ने उनसे अपने तीन पग बराबर भूमि दान में पाने की इच्छा व्यक्त की। अपने ऐश्वर्य के अहंकार में डूबे राजा बलि ब्राह्मण की इच्छा सुन हंस पड़े और बोले, ब्राह्मण देवता, आप अपनी इच्छानुसार जहां चाहें, वहां की भूमि नाप लें। वह भूमि मैं आपको दान में देने का संकल्प लेता हूं।

ब्राह्मण का आकार बढ़ने लगा

राजा बलि के इतना कहते ही वामन ब्राह्मण का आकार बढ़ने लगा और पल भर में उसने एक पग में स्वर्ग और दूसरे पग में पृथ्वी एवं पाताल नाप लिए। इसके बाद उसने बलि से पूछा कि मैं तीसरा पग कहां रखूं? राजा बलि तुरंत ही समझ गए कि स्वयं जगन्नाथ पधारे हैं।

जानिए क्या रिश्ता है पूतना-वध और मां के प्रेम में?

उन्होंने वामन के चरणों में सिर झुकाकर कहा कि तीसरा पग मेरे सर पर रख लीजिए प्रभु। इस तरह राजा बलि स्वयं भगवान की शरण में आ गए और मोक्ष पा गए, लेकिन यह घटना देख रही बहन अपने भाई का ऐसा अपमान सहन ना कर सकी। तुरंत ही उसके मन में आया कि अगर यह मेरा शिशु होता तो इसे अपने ही दूध में विष दे देती। भगवान विष्णु ने उसके मन का यह भाव भी पढ़ लिया और एक बार फिर तथास्तु कह दिया।

मरण के बंधन से मुक्त

युग परिवर्तन के साथ अपने कुभावों के परिणामस्वरूप बलि की बहन ने राक्षसी पूतना के रूप में जन्म लिया। अपनी इच्छा के अनुरूप उसे भगवान कृष्ण को दुग्धपान कराने और दूध में विष दे देने का अवसर मिला। इस तरह विष्णु भगवान के दोनों वरदान कृष्णावतार में फलीभूत हुए और स्वयं भगवान के हाथों मोक्ष पाकर राक्षसी पूतना जन्म मरण के बंधन से मुक्त हो गई।

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