Bankipur Upchunav: BJP कैंडिडेट अभिषेक सिन्हा के माता-पिता का चारा घोटाला में क्या था रोल? 3 साल की हुई थी सजा
Bankipur Upchunav: बिहार की बांकीपुर विधानसभा सीट पर हो रहे उपचुनाव में BJP प्रत्याशी अभिषेक सिन्हा के नामांकन वापस लेने के बाद राजनीतिक पारा चढ़ गया है। बीजेपी कैंडिडेट अभिषेक ने इसकी वजह पारिवारिक कारण बताई, लेकिन विपक्ष इसे चर्चित चारा घोटाले से जोड़कर बीजेपी पर निशाना साध रहा है।
हालांकि, बीजेपी ने भी देर किए बिना अभिषेक की जगह नीरज कुमार सिन्हा को उम्मीदवार घोषित कर दिया। ऐसे में हर किसी के मन में सवाल है कि आखिर चारा घोटाले का वह मामला क्या है, जिसमें अभिषेक सिन्हा के माता-पिता को सजा हुई थी और जिसकी गूंज अब बांकीपुर उपचुनाव तक पहुंच गई है।

बांकीपुर में अचानक क्यों बदलना पड़ा BJP का उम्मीदवार?
बांकीपुर सीट से बीजेपी ने पहले अभिषेक सिन्हा (Abhishek Bunty Bankipur) को मैदान में उतारा था। उन्होंने नामांकन भी दाखिल कर दिया, लेकिन कुछ ही घंटों बाद चुनाव लड़ने से पीछे हट गए। अभिषेक ने मीडिया के सामने कहा कि वह पारिवारिक कारणों से चुनाव नहीं लड़ेंगे। इसके तुरंत बाद बीजेपी ने नीरज कुमार सिन्हा को नया उम्मीदवार घोषित कर दिया। ये सब इतनी तेजी से बदला कि विपक्ष को हमला बोलने का मौका मिल गया। विपक्ष का दावा है कि अभिषेक के परिवार का नाम चारा घोटाले से जुड़े मामलों में सामने आने के बाद बीजेपी ने नुकसान से बचने के लिए उम्मीदवार बदलने का फैसला किया।
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चारा घोटाले में क्या थी अभिषेक सिन्हा के पिता की भूमिका?
अभिषेक सिन्हा के पिता रविन्द्र प्रसाद सिन्हा (Ravindra Prasad Sinha fodder scam) पटना की मेसर्स मगध केमिकल्स कॉर्पोरेशन में मैनेजर थे। जांच में इस कंपनी का नाम चारा घोटाले से जुड़े सप्लायरों में सामने आया था। आरोप था कि पशुपालन विभाग के अधिकारियों के साथ मिलकर फर्जी बिल बनाए गए और बिना सामान की आपूर्ति किए सरकारी खजाने से करोड़ों रुपये निकाले गए। सीबीआई की विशेष अदालत ने रविन्द्र प्रसाद को दोषी मानते हुए तीन साल की जेल और 50 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी। उनका नाम उन निजी सप्लायरों में शामिल था, जिन पर फर्जी भुगतान लेने का आरोप साबित हुआ था।
अभिषेक सिन्हा की मां को किस मामले में मिली थी सजा?
अभिषेक सिन्हा की मां चंचला सिन्हा को चाईबासा ट्रेजरी से जुड़े चारा घोटाले के एक मामले में दोषी ठहराया गया था। जांच में सामने आया कि 1992-93 के दौरान फर्जी अलॉटमेंट लेटर, सप्लाई ऑर्डर और बिलों के जरिए करीब 37.62 करोड़ रुपये सरकारी खजाने से निकाले गए थे। सीबीआई की जांच के बाद मामला कोर्ट पहुंचा, जहां चंचला सिन्हा को तीन साल की जेल और 80 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई गई। इस केस में कई सरकारी अधिकारियों और निजी सप्लायरों को भी दोषी पाया गया था।
डोरंडा ट्रेजरी केस में आखिर क्या हुआ था?
चंचला सिन्हा का नाम रांची के डोरंडा कोषागार से 36.59 करोड़ रुपये की अवैध निकासी वाले मामले में भी आया था। इस केस में कुल 125 लोगों को आरोपी बनाया गया था। आरोप था कि फर्जी दस्तावेजों के आधार पर सरकारी खजाने से करोड़ों रुपये निकाले गए। हालांकि अगस्त 2023 में सीबीआई की विशेष अदालत ने इस मामले में 90 आरोपियों को दोषी ठहराया, जबकि चंचला सिन्हा समेत 35 लोगों को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया। यानी इस मामले में उन्हें राहत मिल गई थी।
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क्या है देश का चर्चित चारा घोटाला?
चारा घोटाला देश के सबसे बड़े घोटालों में गिना जाता है। यह मामला लालू यादव के बिहार के सीएम रहते 1992 से 1995 के बीच बिहार के पशुपालन विभाग से फर्जी बिलों के जरिए करीब 950 करोड़ रुपये की अवैध निकासी से जुड़ा है। चारा, दवाइयों और पशुपालन उपकरणों की खरीद के नाम पर सरकारी खजाने से पैसा निकाला गया, जबकि कई मामलों में सामान की आपूर्ति हुई ही नहीं थी। जांच में नेताओं, अधिकारियों, ट्रेजरी कर्मचारियों और निजी सप्लायरों की मिलीभगत सामने आई। बिहार के विभाजन के बाद इस घोटाले से जुड़े कई मामले झारखंड ट्रांसफर कर दिए गए।
कैसे खुला चारा घोटाले का पूरा खेल?
चारा घोटाले की परतें दिसंबर 1995 में तब खुलनी शुरू हुईं, जब नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्ट सामने आई। इसके बाद CBI ने अलग-अलग मामलों की जांच शुरू की। जांच की जद में तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव, पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. जगन्नाथ मिश्रा, कई वरिष्ठ अधिकारी और निजी सप्लायर आए। वर्षों तक चली सुनवाई के बाद अलग-अलग मामलों में कई आरोपियों को सजा मिली, कुछ बरी हुए और कई मामलों में न्यायिक प्रक्रिया लंबे समय तक चलती रही।
बांकीपुर उपचुनाव में क्यों बन गया बड़ा चुनावी मुद्दा?
अभिषेक सिन्हा के नाम वापस लेने के बाद विपक्ष ने इसे चुनावी हथियार बना लिया है। जन सुराज के प्रशांत किशोर समेत विपक्षी दलों का आरोप है कि बीजेपी ने ऐसे व्यक्ति को टिकट दिया, जिसके परिवार का नाम चर्चित भ्रष्टाचार के मामले से जुड़ा रहा है। वहीं बीजेपी ने तुरंत नया उम्मीदवार उतारकर विवाद को बढ़ने से रोकने की कोशिश की। अब बांकीपुर का उपचुनाव सिर्फ स्थानीय मुद्दों तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि उम्मीदवारों की पृष्ठभूमि और राजनीतिक नैतिकता भी चुनावी बहस के केंद्र में आ गई है।












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