अदम जगायेव्स्की की कुछ कविताएं

॥ आत्मा॥
हमें पता हैं कि हमें तुम्हारा नाम लेने की इजाज़त नहीं हैं
हम जानते हैं कि तुम्हें व्यक्त नहीं किया जा सकता
थके हुए, जर्जर और संदिग्ध
बच्चे के किसी रहस्यपूर्ण अपराध की तरह
हम जानते हैं कि तुम्हें अब जिंदा रहने की इजाज़त नहीं है
सूर्यास्त के भी समय संगीत में या पेडों में
हमे पता है , या कम से कम हमें ऐसा बताया गया है कि
अब तुम्हारा अस्तित्व नहीं है, कहीं भी, किसी भी जगह
लेकिन हम तब भी सुनते रहते हैं लगातार हर रोज़ तुम्हारी थकी हुई पुरानी आवाज़
किसी गूंज में , किसी विरोध के स्वर में
यूनान के रेगिस्तान में एन्टिगनी से भेजी गई उन चिट्ठियों में
जो हम तक आज भी पहुंचती रहती हैं
॥ अमरता॥
ये बेचारे उन्नीसवीं सदी के कवि
लाज से लाल लाल गालों वाले स्वप्नदर्शी
प्रेरणाओं की मशाल हमारे महान बिरादर
जिन्होंने पेरिस में अपने पोर्ट्रेट बनाने की अनुमति दी
और जो आज स्कूल की तमाम पाठ्यपुस्तकों में चम चम चमक रहे हैं
हमारे ही बिरादर
उन उद्धरणों और सूक्तियों के लेखक
जो हर अन्याय को न्यायसंगत ठहराने में इस्तेमाल हुआ करते हैं।
॥ आग॥
शायद मैं एक साधारण मध्यवर्गीय व्यक्ति हूँ
व्यक्ति के अधिकारों पर विश्वास रखने वाला,
यह शब्द 'आज़ादी' मेरे लिए बिल्कुल सरल और साधारण है
इसका मतलब किसी ख़ास वर्ग की आज़ादी नहीं
मैं , राजनीतिक तौर पर अधकचरा , नासमझ, एक मामूली औसत शिक्षा प्राप्त
(साफ समझ के छोटे-मोटे एकाध पल ही इसकी खुराक हैं) , मुझे याद है
उस आग के आकर्षण की , जो अनगिनत प्यासे लोगों के होठों को एक दिन झुलसा देती है और तमाम किताबें जला डालती है और जो शहरों की त्वचा को भून डालती है ...... मैं उसी आग के गीत गाया करता था
और मैं जानता हूँ कि दूसरे दूसरे अनगिनत लोगों के साथ भागना और चलना कितना महान होता है , बाद में, अपने आप,
अपने मुँह में भरी राख के स्वाद के साथ मैंने झूठ की विडम्बना भरी डरावनी आवाजें सुनीं और वह गीत गाने वालों का रोना सुना
और फिर जब मैंने अपने माथे को छुआ तो महसूस कर सका
अपने प्यारे देश की मेहराबदार कटावदार खोपडी
और इसके दुखते तीखे किनारे।
॥ पियानोवादक की मृत्यु॥
(यह अनुवाद अद्भुत कबाड़ी अशोक पांडे के लिए )
जब दूसरों ने युद्ध किए
या शांति के लिए चिरौरियाँ कीं मुकदमे किए
या तम्बुओं अस्पतालों के संकरे बिस्तरों पर सोते रहे
लंबे समय तक
उसने बीथोवन के सोनाटा का अभ्यास किया
और अपनी पतली उंगलियों से , जैसे वे किसी कंजूस की उंगलियाँ हों
अथाह दौलत के उन महान खज़ानों को छुआ
जो उसकी नहीं थीं ।
उदय प्रकाश के ब्लाग से साभार












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