Papmochani Ekadashi 2021: पाप मोचिनी एकादशी आज, जानिए पूजा-विधि, कथा और महत्व
नई दिल्ली। चैत्र माह के कृष्ण पक्ष में आने वाली एकादशी को पापमोचिनी एकादशी कहा जाता है। इस एकादशी के बारें में यह कथन सत्य है किइसका व्रत करने से अनजाने में किया गया भयंकर से भयंकर पाप भी नष्ट हो जाता है। इस पृथ्वीलोक में रहने पर मनुष्य संपूर्ण सुखों का भोग करता है और मृत्य के पश्चात बैकुंठ लोक का वासी बनता है। पाप मोचिनी एकादशी 7 अप्रैल 2021 बुधवार को आ रही है। मतमतांतर से 8 अप्रैल को भी लोग एकादशी का व्रत रखेंगे।

पूजा विधि
पापमोचिनी एकादशी व्रत की पूजा विधि भी अन्य एकादशियों की तरह ही है। प्रात:काल स्नानादि नित्य कर्मो से निवृत होकर पूजा स्थान में पूर्वाभिमुख होकर आसन बिछाकर बैठें। भगवान विष्णु के सामने हाथ में अक्षत, सिक्का, पुष्प, पूजा की सुपारी लेकर एकादशी व्रत का संकल्प लें। यदि आप अपनी किसी विशेष कामना की पूर्ति के लिए यह व्रत रख रहे हैं तो उस कामना का मन ही मन उच्चारण करें। इसके बाद भगवान विष्णु की पंचोपचार पूजा करें और व्रत कथा सुनें। दिनभर निराहार रहें। फलाहार ले सकते हैं। अगले दिन व्रत का पारणा करते हुए ब्राह्मण दंपती को भोजन करवाकर यथाशक्ति दान-दक्षिणा देकर विदा करें और स्वयं भोजन करें। इस एकादशी व्रत में चारोली का फलाहार करने का विधान है।
पापमोचिनी एकादशी व्रत कथा
प्राचीन समय में चित्ररथ नामक एक रमणीक वन था। इस वन में देवराज इंद्र गंधर्व कन्याओं तथा देवताओं सहित स्वच्छंद विहार करते रहते थे। मेधावी नामक ऋषि भी उस वन में तपस्या कर रहे थे। ऋषि शिव उपासक तथा अप्सराएं शिव द्रोहिणी व अनंग अनुचरी थी। एक बार कामदेव ने मेधावी ऋषि का तप भंग करने के लिए उनके पास मंजुघोषा नामक अप्सरा को भेजा। युवावस्था वाले मुनि अप्सरा के हाव भाव, नृत्य, गीत तथा कटाक्षों पर मोहित हो गए और मंजुघोषा के साथ ही नित निवास करने लगे। मुनि को रति क्रीड़ा करते हुए 57 वर्ष व्यतीत हो गए। एक दिन मंजुघोषा ने देवलोक जाने की आज्ञा मांगी। तभी मुनि को ज्ञान हुआ किवे इतने वर्ष तक एक अप्सरा के साथ काम क्रीड़ा करते रहे और अपनी तपस्या और शिव भक्ति से विमुख रहे। उन्हें आत्मज्ञान हुआ किमुझे रसातल में पहुंचाने का एकमात्र कारण अप्सरा मंजुघोषा ही है। उन्होंने मंजुघोषा को पिशाचिनी होने का श्राप दे दिया। मंजुघोषा ने कांपते हुए मुक्ति का उपाय पूछा। तब मुनि ने पापमोचिनी एकादशी का व्रत रखने को कहा। वह मुक्ति का उपाय बताकर पिता च्यवन के आश्रम में चले गए। श्राप की बात सुनकर च्यवन ऋषि ने पुत्र की घोर निंदा की। उन्होंने कहा किपाप की भागीदारी अकेली मंजुघोषा नहीं है, तुम भी उसके साथ इतने वर्षो तक काम क्रीड़ा में रत रहे तो तुम भी पाप में बराबर के भागीदार हो। इसलिए तुम भी चैत्र माह की पापमोचिनी एकादशी का व्रत रखो तभी तुम्हारी साधनाएं फलीभूत होंगी। पिता की आज्ञा से मेधारी ऋषि ने इस एकादशी का व्रत रखा। व्रत के प्रभाव से मुनि पाप मुक्त हुए और मंजुघोषा भी पिशाचिनी देह से मुक्त होकर देवलोक चली गई।
एकादशी तिथि काल
- एकादशी तिथि प्रारंभ 6 अप्रैल रात्रि 2.09 बजे से
- एकादशी तिथि पूर्ण 7 अप्रैल रात्रि 2.28 बजे तक
- व्रत का पारणा 8 अप्रैल को प्रात: 8.40 से 8.43 बजे तक












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