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कविता: इक रिश्ता नया बनाने में ...

इस नील गगन का पंक्षी हुं, करता हुं मैं सब अंजाने में |
निस दिन विचरण करता हुं, इक रिश्ता नया बनाने में ||
बस चाह यही है मेरी इक , कुछ कर दिखलाऊ जमाने में।
प्रतिदिन चलता रहता हुं मै, कुछ खोने कुछ पाने में ॥

खत वो यार तक नही पहुंचा,
दोस्ताना प्यार तक नही पहुंचा।
फूल तो देखे है जीवन भर ,
फिर भी बहार तक पहुंचा ॥

इक रिश्ता नया बनाने में -------इक रिश्ता नया बनाने में

'जो मित्र है उन्हे हम उदास नही करते,
गैरो पे कभी हम विश्वास नही करते !
मा कि ममता से ही पिघलता है ये पत्थर दिल,
वरना हम किसी के बाप से नहीं डरते !!'

'किसी-किसी कि नजरो का प्यारा हुं,
किसी-किसी कि नजरो मे अवारा हुं !
चाहे दुनिया वाले समझे जैसा ,
फिर भी अपनों का दुलारा हुं !!'

फिर भी अपनों का दुलारा हू------

इक रिश्ता नया बनाने मे-----2

'ये हाथ् बद्दाकर आया हुं,
इक रिश्ता नया बनाने को !
बस चाह मेरी है यही इक,
अब करके कुछ दिखलाने को !!'

इक रिश्ता नया-------

'दुनिया को है इतना वक्त कहा ,
जो मेरी कहानी सुन लेवे !
है बून्द जो मेरी आंखो में,
उनसे है ये मोती चुन लेवे !!'

इक रिश्ता नया........

'हर इक आंशू मेरा इसका गवाह है ,
दुनिया बडी कट्ठिन है दर्गम हर राह है !
चलिये सम्हल सम्हल के हो जिसमे चाह है,
हुश्न वालो के पीछे तो हर दिल फनाह है !!'खर

इक रिश्ता नया..------------

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